ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers
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सोमवार, 18 मई 2026

Ghar Ki Unchai Vastu मकान की दिशा नहीं, उसकी ऊँचाई तय करती है वास्तु का संतुलन

 मकान की दिशा नहीं, उसकी ऊँचाई तय करती है वास्तु का संतुलन


                 South West Direction Height Benefits


क्या केवल प्लॉट की दिशा ही वास्तु तय करती है?

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यदि प्लॉट पूर्वमुखी है तो मकान का ऊँचा भाग भी पूर्व दिशा में होना चाहिए, या यदि प्लॉट पश्चिममुखी है तो पश्चिम दिशा को अधिक ऊँचा बना देना चाहिए।
लेकिन वास्तुशास्त्र का सिद्धांत इससे बिल्कुल अलग है।

वास्तु के अनुसार प्लॉट किसी भी दिशा का क्यों न हो, भवन का सबसे स्थिर, भारी और ऊँचा भाग सदैव नैऋत्य दिशा (South-West / S/W) में होना चाहिए। यही दिशा भवन को स्थिरता, मजबूती और ऊर्जा संतुलन प्रदान करती है।


आधुनिक घरों में सबसे बड़ी भूल

आज के समय में लोग घर बनाते समय डिज़ाइन, फ्रंट एलिवेशन, कलर कॉम्बिनेशन और आधुनिक सुविधाओं पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं।
लेकिन भवन की ऊर्जा संरचना को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

जबकि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा संतुलन का विज्ञान है।

किसी भवन का प्रभाव केवल उसके लुक, पोर्च की भव्यता या मुख्य द्वार से तय नहीं होता, बल्कि उसकी ऊँचाई, भार, ढाल (Slope) और वेंटिलेशन अर्थात खुले स्थानों से निर्धारित होता है।


क्यों महत्वपूर्ण है नैऋत्य (S/W) दिशा?

वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को पृथ्वी तत्व की दिशा माना गया है।
पृथ्वी का स्वभाव स्थिरता, धारण शक्ति और मजबूती है।

इसी कारण वास्तु में घर का भारी निर्माण, मोटी दीवारें, ऊँचा स्तर या भारयुक्त भाग इस दिशा में रखना शुभ माना गया है।

जब भवन का भारी और ऊँचा भाग S/W दिशा में होता है, तब घर की ऊर्जा नियंत्रित और संतुलित रहती है। ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि स्थिर होकर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है।

इसीलिए वास्तु में नैऋत्य को घर की शक्ति और स्थिरता का केंद्र कहा गया है।


यदि S/W में ऊँचाई देना संभव न हो तो क्या करें?

कई बार प्लॉट की स्थिति, डिज़ाइन या अन्य व्यावहारिक कारणों से नैऋत्य दिशा में पूर्ण ऊँचाई देना संभव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में दक्षिण या पश्चिम दिशा में ऊँचाई दी जा सकती है।

  • यदि पश्चिम दिशा ऊँची होगी, तो भवन का ढाल स्वाभाविक रूप से पूर्व दिशा की ओर बनेगा।

  • यदि दक्षिण दिशा ऊँची होगी, तो ढाल उत्तर दिशा की ओर रहेगा।

वास्तु का उद्देश्य केवल भार निर्धारित करना नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखना भी है। और यह संतुलन भवन की ऊँचाई और ढाल से स्वतः निर्मित होता है।


प्रकृति भी यही सिद्धांत सिखाती है

यदि हम प्रकृति को ध्यान से देखें, तो वास्तु के सिद्धांत स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं।

पर्वत सदैव स्थिर और ऊँचे होते हैं, जबकि नदियाँ ढाल की ओर बहती हैं।
ठीक उसी प्रकार भवन में भी एक दिशा स्थिरता का केंद्र बनती है और दूसरी दिशा ऊर्जा प्रवाह का मार्ग।

जब यह संतुलन सही होता है, तब घर केवल रहने का स्थान नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।


वास्तु का वास्तविक संदेश

वास्तु का मूल संदेश यह नहीं कि केवल प्लॉट की दिशा शुभ या अशुभ है।
बल्कि वास्तविक महत्व भवन के ऊर्जा संतुलन का है।

प्लॉट की दिशा कुछ भी हो सकती है, लेकिन स्थिरता और ऊर्जा प्रवाह का सिद्धांत नहीं बदलता।

इसीलिए वास्तु में कहा गया है कि घर किसी भी दिशा का हो, उसका भार और ऊँचाई नैऋत्य (S/W) दिशा में ही श्रेष्ठ मानी जाती है।


अंत में एक आवश्यक बात

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में अनेक मत-मतांतर हैं।
अतः किसी भी विषय को पढ़ें, समझें, अनुभव करें और फिर अपने व्यवहार में उतारें।

कृपया कुतर्क और अनावश्यक बहस से बचें। यदि आपके कुछ सुझाव हों तो मर्यादित शब्दों में अवश्य लिखें।
सोशल मीडिया पर मर्यादा बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

पूरा आलेख ध्यानपूर्वक पढ़ने हेतु आपका हृदय से धन्यवाद।

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो एक लाइक और प्यारा सा कमेंट अवश्य करें, जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु संबंधी पोस्ट लिखने की प्रेरणा मिलती रहे।

।। इति शुभम् ।।

रविवार, 10 जनवरी 2021

toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा

 toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा 

​"लाख कोशिशों के बाद भी घर में पैसा नहीं टिक रहा या कोई न कोई बीमार रहता है? वास्तु शास्त्र के अनुसार, इसका कारण आपके शौचालय की गलत स्थिति हो सकती है। जानिए कौन सी दिशा आपके लिए वरदान है और कौन सी अभिशाप।"

आज के समय में बन रहे ज्यादातर घरों में स्थान की कमी अथवा शहरी संस्कृति और शास्त्रों की अनभिज्ञता के कारण शौचालय का निर्माण गलत दिशा में हो जाता है जिससे उस घर मे रहने वाले परिवार को स्वास्थ्य और धन संबंधी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः जब भी घर में शौचालय का निर्माण कराया जाए तो उसे वास्तु के अनुसार ही करना चाहिए, नहीं तो ये घर में यही शौचालय negative energy नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का कारण बनते हैं। इनकी गलत दिशा के कारण परिवार के लोगों का स्वास्थ्य खराब बना रह सकता है। तो आइए मित्रों जानते हैं कि शौचालय निर्माण में किन मुख्य बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है?


शौचालय के उपयुक्त दिशा 

सर्वप्रथम वस्तुशात्र के अनुसार घर में शौचालय के लिए सबसे अच्छा स्थान SSW अथवा WNW एवं ESE का होता है। घर के मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए यह घर (भवन) का ब्रह्म स्थल होता है यहां वास्तु पुरुष की नाभि होती है, यहां बना शौचालय स्वास्थ्य के साथ जीवन में संघर्ष की शक्ति को समाप्त करता है। ईशान अथवा नैऋत्य कोण में शौचालय का निर्माण निषिद्ध किया गया है। ईशान कोण में शौचालय होने से गृह-क्लेश में वृद्धि होती है साथ ही कैंसर जैसा भयंकर रोग होने कि संभावना रहिती है, घर के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, नए और शुभ विचार नहीं आते, घर को आर्थिक संकटों का सामना निरंतर करना पड़ता है तथा सारे घर में negative energy अपवित्रता का वातावरण हमेशा बना रहता है। वहीं नैऋत्य कोण में शौचालय बनाने से मानसिक अस्थिरता, संबंधों में खटास, प्रगति में बाधा, नजर दोष तथा शारीरिक कष्टों में वृद्धि होती है।

शौचालय के अंदर की व्यवस्था 

यदि शौचालय कमरे के साथ ही बनाना हो तो इसे कमरे के वायव्य कोण में बनाना चाहिए। नैऋत्य कोण में शौचालय निर्माण सर्वथा निषिद्ध है। शौचालय में ताजी हवा तथा प्रकाश के आगमन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय का दरवाजा पूर्व अथवा अग्नि कोण में होना चाहिए तथा टॉयलेट सीट इस प्रकार फिट होनी चाहिए कि सीट पर बैठते समय व्यक्ति का मुख दक्षिण अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे, भूलकर भी मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर नहीं करना चाहिए।

शौचालय में पानी की व्यवस्था पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होनी चाहिए, अगर वाशबेसिन भी शौचालय में लगाए जाने हैं तो वह भी पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाने चाहिए। वैसे शौचालय में दर्पण का प्रयोग वर्जित है फिर भी अगर लगाना है तो उसे भी उत्तरी और पूर्वी दीवाल पर ही लगाएं। 

वेंटिलेशन, एग्जॉस्ट एवं ड्रेनेज की व्यवस्था 

शौचालय में शुद्ध वायु के आवागमन के लिए खिड़की या वेंटिलेशन उत्तर या पूर्व दिशा में होना उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इन दिशाओं से प्राकृतिक प्रकाश एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता है।

एग्जॉस्ट फैन लगाने के लिए वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह दिशा वायु तत्व की होती है और दूषित वायु को बाहर निकालने में सहायक होती है। वैकल्पिक रूप में, यदि वायव्य कोण उपलब्ध न हो, तो एग्जॉस्ट फैन उत्तर या पूर्व दिशा में भी लगाया जा सकता है।

जल निकासी (ड्रेनेज) का ढाल इस प्रकार रखा जाए कि पानी का प्रवाह उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। इससे जल का उचित प्रवाह बना रहता है तथा स्थान स्वच्छ बना रहता है।

अन्य महत्वपूर्ण निर्देश 

शौचालय कभी भी रसोई घर के सामने ना बनाएं अगर शौचालय एवं स्नानघर इकट्ठा बनाना है तो यह पश्चिम वायव्य अथवा पूर्व आग्नेय दिशा में होना चाहिए इसमें लगे शावर व नल आदि ईशान कोण में तथा टॉयलेट की सीट वायव्य कोण में होनी चाहिए यह पश्चिम दिशा में भी सुविधा अनुसार रखी जा सकती है वाशबेसिन की स्थिति पश्चिम में होनी चाहिए।

शौचालय के लिए वास्तु टिप्स toilet vastu remedies

अगर किसी कारण वश शौचालय का निर्माण गलत हुआ है तो निम्नलिखित कुछ उपाय करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा को आने से रोका जा सकता है।

*अगर पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा के मध्य स्थान तक शौचालय की खिड़की खुलती हो तो उस खिड़की में 3 क्रिस्टल की बॉल लाल रिबन में बांधकर लटका दें जब सूर्य की रश्मियां उस क्रिस्टल बॉल से टकराकर शौचालय में पड़ेंगी तो वहां की नकारात्मक ऊर्जा जल जाएगी।

* शौचालय की दुर्गंध घर में बिल्कुल न फैले इसका विशेष ध्यान रखें, इसके लिए सुगंधित चीजों का छिड़काव आदि करें।

* शौचालय में किसी सूखे स्थान पर समुद्री नमक किसी कांच की कटोरी आदि में भरकर रखे और सप्ताह में एक बार उसी कमोड में डालकर फ्लश कर दें तथा वापस नया नमक रख दें।

नोट- इस तरह के कुछ उपाय करने से बहोत हद तक सकारात्मक लाभ उठाया जा सकता है, अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार की मदत लें।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद 

नोट — उक्त उपाय करने से बहुत हद तक सकारात्मक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार का मार्गदर्शन प्राप्त करें।

रविवार, 27 दिसंबर 2020

paschim disha vastu shastra । पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र

पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र । paschim disha

पश्चिम दिशा के स्वामी ग्रह शनि हैं तथा देवता वरुण है। यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है। शनि को ज्योतिष में भगवान शंकर द्वारा न्यायाधीश की पदवी प्राप्त हुई है। यह हमारे कर्मो के आधार पर फला-फल की न्यायोचित व्यवस्था करते हैं। 

paschim disha vastu shastra ।  पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र



क्यों की आज कलयुग में बुरे कर्मों का बोलबाला है, सो अधिकांश लोग शनि देव को लेकर भय एवं भ्रम की स्थिति में रहते हैं। वास्तु में इस दिशा को कारोबार, गौरव, स्थायित्व, यश और सौभाग्य के लीये जाना जाता है।

इस दिशा में सूर्यास्त होता है, वहीँ आम जनमानस में डूबते हुए सूर्य को देखना शुभ नहीं माना जाता क्यों की सूर्य की ढलती हुई किरणे हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं इसलिए आवश्यक है कि हम भवन में पश्चिम दिशा में भारी और ऊँचा निर्माण करें। 

वास्तु अनुसार इस दिशा में डाइनिग रूम बनवाना शुभ होता है। यहाँ शयनकक्ष भी बनाना शुभ होता है।  वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा के अनुभव के अनुसार इस दिशा में बच्चों के लिए उनके पढ़ने का कमरा बनवाना उत्तम होता है क्यों की शनि ग्रह किसी भी विषय की गहराई में जाने की शक्ति प्रदान करते हैं सो यहाँ बच्चों में गंभीरता आती हैं और वह बुद्धिजीवी होते हैं। 

यह दिशा जल के देवता वरुण की है इसलिए यहाँ रसोईघर अच्छा नहीं माना गया है। रसोई में अग्नि की प्रधानता होती है और अग्नि एवं जल आपस में शत्रु होते हैं। वैसे इसके अलावां इस दिशा में लगभग सभी निर्माण किये जा सकते हैं।

।। इति शुभम् ।।


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गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen

 वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें ?


फैक्ट्री निर्माण में वास्तु सिद्धांतों व उनके सूत्रों का पालन करना चाहिए जिससे उस स्थान पे पंच तत्वों का ठीक से समन्वय हो और उस फैक्ट्री में जिस भी किसी चीज का निर्माण हो रहा है वह सही तथा फिट हो और जब वह वहां से निर्मित होकर बाजार में पहुंचे तो अपनी गुणवत्ता से उपभोक्ताओं का दिल जीत सके जिससे मालिक को उसका अच्छा मूल्य प्राप्त हो और वह लाभवन्तित हो सके।

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen


पाठकों मै वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा अपने अनेकों फैक्ट्री के वास्तु विजिट में पाया है की उस फैक्ट्री में अच्छी गुणवत्ता वाले तैयार सामान के आर्डर बिलकुल न के बराबर होते हैं, जिसका मुख्य कारण होता है वहां तैयार माल का गलत जोंन में रखा होना। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर फैक्ट्री ही सभी व्यवसाय का आधार होती है, जिनसे मालिक के साथ-साथ मैनेजमेंट टीम, तकनीशियन, लेबर, ट्रांसपोर्ट आदि सीधे जुड़े होते हैं और कंपनी में निर्माण होने वाली वस्तु और उसके लाभ से प्रभावित होते हैं। अब अगर फैक्ट्री में तैयार माल मार्किट में जायेगा ही नहीं अर्थात उस माल का आर्डर ही नहीं आयेगा तो फैक्ट्री मालिक के साथ-साथ फैक्ट्री से जुडा हर व्यक्ति इससे प्रभावित होगा, तो आइये जानते हैं कि इसके लिए फैक्ट्री का कौन सा जोंन वास्तु अनुसार अच्छा माना गया है।


चाहे किसी भी चीज का फैक्ट्री में निर्माण होता हो वहां तैयार सामान (finished goods) को हमेसा वायव्य कोण ( north weast) में रखना चाहिए। यह दिशा वायु प्रधान होने से वहां रखे तैयार सामान को जल्दी से जल्दी बिकने में सहायता करेगी अर्थात उस सामान का आर्डर डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से जल्दी आयेगा। वायव्य कोण चन्द्रमा की दिशा है और चंद्रमा का स्वभाव चंचलता भरा होता है उसकी इसी चंचलता के फल स्वरूप तैयार माल वहां टिककर रहता नहीं बल्कि वायु के वेग से अपने सही स्थान (मार्किट और ग्राहक) तक पहुंच जाता है, और नए आर्डर का श्रोत निरंतर खुला रहता है। अगर गलती से भी तैयार माल नैरित्य कोण अर्थात पृथ्वी दिशा में रखा गया है तो वह स्टेबल जोंन में आ जायेगा जिससे उसका आर्डर बिलकुल न के बराबर ही रहेगा, तथा मिला हुआ आर्डर भी बार-बार कैंसिल होने की सम्भावना बनेगी अतः फैक्ट्री मालिक को फैक्ट्री का निर्माण करते समय अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

अगर पहले से ही फैक्ट्री  स्थापित है जिसमे इस तरह की अथवा अन्य अनचाही अड़चने आ रही हैं तो मित्रों मैं आप का अपना /वास्तु सलाहकार/ पं. उदयप्रकाश शर्मा आप से इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने किस्मत को कोसने के बजाय हमे यह समझना चाहिए कि इस युग में मृत्यु को छोड़कर हर समस्या का समाधान होता है, बात है जागरूकता की। मैंने अपने वर्षों के अनुभव में छोटे बड़े कई उद्योगों का सफलता पूर्वक उपचार किया है जिससे बड़े अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं। 

आज विज्ञान का युग हैं। आज आधुनिक रूप से आधुनिक यंत्रो द्वारा सटीक रूप से Positive - Negative ऊर्जाओं का सोधन कर पाना संभव हुआ है अगर संबंधित स्थान पे नकारात्मक ऊर्जा है अथवा ऊर्जा का अभाव है अर्थात वहां शून्य ऊर्जा है तो वहां प्राण ऊर्जा का सामंजस्य स्थापित करने हेतु धरती के चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरी ध्रुव- दक्षिणी ध्रुव व अंतरिक्ष की शुभ ऊर्जाओं को आकर्षित करना पड़ता है जिसके लिए आवस्यकता अनुसार वैज्ञानिक यंत्र, पिरामिड, ऊर्जा प्लेट, क्रिस्टल एवं रत्न-उपरत्नों के कोणीय प्रभाव, तथा धातुवों से बनी विभिन्न कोणीय आकृतियों का प्रयोग करना होता है। कोई नकारात्मक दोष वहां पर है तो पूजा-हवन भी करवाना पड़ता है I अतः आप के औद्योगिक परिसर में फैक्ट्री-कारखाने में कोई वास्तु दोष हो तो निःसंकोच आप को किसी कुशल वास्तुशास्त्री से संपर्क कर उनसे परामर्श लेना चाहिए और संबंधित स्थान का पूरे वैज्ञानिक विधि से जांच करवानी चाहिए मित्रों अगर वहां ऐसा कुछ भी हो जिससे अनचाही पीड़ा और उद्योग में असफलता मिल रही हो तो अपने इष्टदेव को प्रणाम कर उनसे आज्ञा ले उस समस्या का उचित उपाय करवाना चाहिए। और अपने औद्योगिक विकाश को गति देनी चाहिए।

।। इति शुभम् ।।

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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

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