ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers
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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

ashok stambh ।अशोक स्तंभ

अशोक स्तंभ। ashok stambh

इस दुनिया के प्रत्येक देश का कोई ना कोई अपना प्रतीक चिह्न होता है जो उस देश के शौर्य, सत्ता, सभ्यता और वीर गाथा और संस्कृति को दर्शाता है।


इसी तरह भारत की आन बान और शान को दर्शाता है। अशोक चक्र यह चक्र भारत के आदिकाल के महत्व को दर्शाता है। वैसे चक्र को आदि काल से ही गति एवं जीवन का प्रतीक माना गया है। इसे ही विश्व का भचक्र कहा गया है और इस भवचक्र को ध्यान में रखते हुए ही प्राणमय जीवन को जीवन चक्र और विराट की स्थिति को ब्रह्मचक्र कहा जाता है तथा ब्रह्मा की शक्ति इस चक्र के पहिए की तरह घूमती रहती है। चक्र को अपने आप में पूर्ण माना गया है, इसलिए चक्र को अर्चना एवं दिव्य उपादानों में दानों में शामिल किया जाता है। यही नहीं, ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति भी चक्र चक्र से की जाती है। ब्रह्मांड एवं शून्य के रूप में चक्र की अभिव्यक्ति चिंतन के विराट एवं सूक्ष्म रूप में की जाती है।
अशोक चक्र 


इन्हीं प्रतीक चिन्हों में चक्र एक ऐसा प्रतीक चिन्ह है जिसे प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता रहा है। इसी की एक कड़ी है भारत का राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र। अशोक चक्र को धर्म चक्र भी कहते हैं क्योंकि संस्कृति में चक्र को पहिया कहा जाता है। जिसमें कुल 24 लकीरे हैं जो बुद्ध के बताए 14 प्रतीक हैं। इस चक्र का प्रयोग हमारे राष्ट्रिय ध्वज में भी किया गया है। और अशोक चक्र का निर्माण काल मौर्य वंश के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासक चक्रवर्ती अशोक के शासनकाल 273-232 ईसा पूर्व माना जाता है। परंतु, मुख्य रूप से अशोक चक्र की शुरुआत बौद्ध काल में ही हुई, जब सम्राट अशोक द्वारा सिंह एवं चक्र का प्रयोग किया गया इसलिए इसे अशोक चक्र कहा गया। वैसे सम्राट अशोक से पूर्व ही चक्र एवं सिंह का प्रयोग होता रहा है।

संभवत सिंह के आधार पर शासनाध्यक्षों के आसन को सिंहासन कहा गया। शक्ति का वाहन भी सिंह माना गया है। यदि सिंह में निहित अध्यात्मिक भावधारा को देखें तो अशोक चक्र में सिंह की 4 मूर्तियां हैं। लेकिन इसमें से तीन ही हमें दिखाई पड़ते हैं। इसलिए दिखने वाले त्रिमूर्ति सिंह में सत, रज एवं तन तीनों गुणों की सुंदर भावना का समावेश हुआ है। यही नहीं यह हिंसा और दया का भी प्रतीक है। यद्यपि सिंह हिंसक जीव है किंतु यह शक्ति शौर्य एवं पराक्रम को भी अपने में संजोए हुए हैं। यही कारण है कि सिंह को शासकीय पराक्रम शौर्य एवं शक्ति का भी घोतक माना जाता है। किंतु सम्राट अशोक ने सिंह के मस्तक पर धर्म चक्र को प्रतिष्ठापित कर के यह सिद्ध कर दिया कि सिंह सात्विक भावना का प्रतीक है। संभवतः इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए सिंह को श्रेष्ठता का सूचक माना जाता है। 


वैसे जहां तक चक्र की बात है तो चक्र का प्रयोग भी अति प्राचीन काल से प्रतीक रूप में भारत में होता चला आ रहा ह। चक्र भारतीय परंपरा के आध्यात्म समदर्शिता एवं जीवन की प्रगति का परिचायक है। चक्र का उपयोग शस्त्र के रूप में भी किया जाता है। ऋग्वैदिक ग्रंथों, महाभारत एवं पौराणिक ग्रंथों में भगवान विष्णु सहित अन्य देवगणों के आयुधों में भी चक्र का प्रयोग होता रहा। इस तरह चक्र की गतिशीलता निरंतर कायम रही और चक्र की इस निरंतर गतिशीलता को ही धर्म के रूप में विश्व का आधार माना गया। चक्र की पूजा अर्चना की जाने लगी तथा चक्र लोक मानस के दिव्यतम एवं पावन उपास्य के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। देवताओं के विभिन्न शारीरिक लक्षणों में चक्र को ही विशेष स्थान प्राप्त था। भगवान विष्णु, राम और कृष्ण के शारीरिक लक्षणों में भी चक्र ने विशिष्ट स्थान ग्रहण किया। इसी तरह भगवान बुध की हथेली और पैरों के तलवे पर चक्र के अंकन का उल्लेख बुद्धचरित ग्रंथ में किया गया है। भगवान महावीर के भी 1008 शारीरिक लक्षणों में से चक्र को प्रधानता मिली। महान रजा-महाराजा ही चक्रवर्ती सम्राट कहलाते थे, क्योंकि उनके शारीरिक लक्षणों में चक्र की ही प्रधानता होती थी।


हमारे इस भारतीय प्रतीक चिन्ह अशोक चक्र को देखने मात्र से हमे  गर्व की अनुभूति होती है। इसमे हमारी सुरक्षा, शौर्य, सत्ता तथा सभ्यता के भाव दृष्टिगोचर होते हैं तथा मन में देश के प्रति अपने कर्तव्य की भावना प्रगट होती है।

अशोक स्तंभ का वास्तुशास्त्र में प्रयोग

वशतुषास्त्र के अनुसार इस अशोकचक्र स्तंभ का प्रतीक लकड़ी अथवा ब्रास धातु में घर के विशेष स्थानों में रखने से ऊर्जा में वृद्धि, बीमारियों से छुटकारा, कोर्ट केस में अशानुकूलित विजय मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि आज के आधुनिक वास्तुशास्त्री विशेष वास्तु दोषों को दूर करने में इसका प्रयोग करते रहते हैं।

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बुधवार, 29 अप्रैल 2020

sahasrara chakra । सहस्त्रार चक्र एक परिचय

sahasrara chakra । सहस्त्रार चक्र एक परिचय 

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सहस्त्रार चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में सातवाँ चक्र है।

सहस्त्रार चक्र को शीर्ष, मुकुट, केंद्र चक्र भी कहते हैं। इसके देवता भगवान शंकर कहे गए हैं। कैलाश पर्वत, शेषनाग, छीरसागर जैसे पवित्र व दिव्य संबोधन इसी चक्र के लिए प्रयोग किये जाते हैं। इस चक्र का तत्व सर्व तत्व ( आत्म तत्व ) आकाश है। इसका रंग जामुनी है। और इसका मन्त्र ॐ है।

मतान्तर से कुछ विद्वान इसे चक्र मानते ही नहीं उनका कहना है की इस चक्र पर इडा और पिंगला नाड़ियों का कोई प्रभाव नहीं है, यह दोनों नाड़ियां मूलाधार चक्र से सुरु होकर क्रमशः दायें और बाएं भाग से होते हुए आज्ञा चक्र पर मिल जाती हैं और यह जहाँ जहाँ भी एक दुसरे से मिलती हैं वहां वहां एक चक्र अवस्थित है। उनके अनुसार यह चक्र एक पूर्ण खिले हुए कमल की तरह है।

आज के युग के नई विचारधारा के उर्जावान वैज्ञानिकों के द्वारा शरीर में छुपे हुए रहस्यों को जानने के लिए निरंतर अनेकों शोध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों मे अपार, आश्चर्य जनक शक्तियों का भंडार है जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी इस केंद्र से आवश्यकता के अनुरूप शक्ति प्राप्त करती है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मुलाधार तथा सहस्त्रार चक्रों मे भी आश्चर्यजनक उर्जा शक्तियों का भंडार है। जिसके उचित प्रयोग से वह खुद का व संसार का कल्याण कर सकता है। यह स्वयं शिद्ध है कि अन्तरिक्ष में सदा ब्रह्म चेतना का सतत प्रवाह होता रहता है जिसको उत्तरीय सहस्त्रार चक्र ही ग्राह्य कर के दक्षिणी मूलाधार तक पहुंचाता है। यह वो चक्र है जो व्यक्ति की बुद्धि और परमात्मा से अध्यात्मिक मिलाप का प्रतिनिधित्व करता है।

सहस्त्रार चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव 

यह सहस्रार चक्र सिर के शिखर पर स्थित है। इसे ब्रह्म रन्ध्र (ईश्वर का दरबार) या लक्ष किरणों का केंद्र भी कहा जाता है इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देती है। इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियाँ और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियाँ सुशोभित रहती है। इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं।इसका चिन्ह खुला हुआ कमल का फूल है जो असीम आनन्द का केंद्र होता है। इस चक्र में इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं। लेकिन प्रमुख रंग बैगनी होता है। इस चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है। यह आत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है।

सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है, उसे आत्म अनुभति, और ईश्वर की अनुभूति होने लगती है, ब्रह्मांड की चेतना से उसकी आत्मा का जुडाव हो जाता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है। और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है उस का संपादन करता है। इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है। अगर यह चक्र जागृत हो गया तो सभी अन्य चक्र खुलते चले जाते हैं।

सहस्त्रार चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां 

इस चक्र के दूषित होने पर शरीर में निम्न बीमारियां उत्पन्न होने की सम्भावना होती है। जैसे सिरदर्द, मानसिक रोग, नाडीशूल, मिर्गी, मस्तिष्क रोग, एल्झाइमर, त्वचा में चकत्ते आदि रोग व वृद्धावस्था, उदासी, मनोभ्रंश जैसी भवनात्मक स्थिति उत्पन्न होने की प्रबल सम्भवना होती है।

एक यही चक्र ऐसा है जो अगर अगर ज्यादा खुला हो अर्थात उच्च गती पर कार्य करता हो तो व्यक्ति के शरीर के भीतर अत्यधिक शुभ ब्रह्मांडीय उर्जा का संचार करता है। जिससे व्यक्ति के अन्य असंतुलित चक्रों को यह अन्तरिक्ष की शुभ उर्जा उपचारात्मक रूप से कार्य कर के ठीक करने में सहायक होती है। हाँ यह भी सत्य है की ऐसे व्यक्ति आध्यात्मिकता के लिए ज्यादा आसक्त हो जाते हैं और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं। ये लोग सर्वोच्च शक्ति से मार्गदर्शन का अनुभव करते हैं। इनके अंतर्ज्ञान (Intuition) की शक्ति बहोत बढ़ जाती है, जिस भी ज्योतिषी (भविष्यवक्ता) का यह चक्र उच्च गती पर कार्य करता है उसका भविष्य कथन अक्षरशः सत्य होता है।

इस चक्र का कम गती पे कार्य करना व्यक्ति के लिए अशांति का कारण बनता है , उसे जीवन में अपनी किसी भी समस्या से बाहर निकलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वह ईश्वरीय शक्ति का बल नहीं प्राप्त कर पाता है I ध्यान नहीं लगता , उसे सदा उदासी घेरे रहती है।

विशेष- मित्रों क्यूँ की मै एक वास्तु शास्त्री भी हूँ तो आप को इतना बताता चलूँ की हमारे घर की ईशान दिशा अर्थात north east का इस चक्र से बहुत गहरा सम्बन्ध होता है। घर का यह स्थान भगवान ईश का है यहाँ गुरु वृहस्पति का भी प्रभाव होता है। प्रायः हर वास्तु शास्त्री घर में इसी स्थान पे मंदिर बनाने की सलाह देता है तथा वह यह भी सलाह देता है की इस स्थान को खुला और साफ-सुथरा रखना चाहिये। इससे घर में शुभ उर्जा अत्यधिक आती है पूजा अथवा ध्यान करते हुए ध्यान अच्छे से लगता है। अगर गलती से भी घर में यह दिशा बंद हो या दूषित हो यहाँ शौचालय हो तो उस घर में रहने वालों को कोई ईश्वरीय कृपा नहीं मिल पाती और लगभग सभी सदस्यों का सहस्त्रार चक्र दूषित होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
अगर आप वास्तु पुरुष की तस्वीर देखेंगे तो पाएंगे की इसी स्थान पे वास्तु देवता का मस्तक आता है।

सहस्त्रार चक्र जागने की सरल विधि 

सर्व प्रथम मन को शांत रखते हुए किसी खुले हुए स्थान जैसे खुली छत या किसी पिरामिड आकार या मंदिर के गुम्बद के निचे शुद्ध होकर शुद्ध आसन पे सुखासन में बैठ जाये और शीर्ष अर्थात शिर के उपरी भाग पे अतरिक्ष से आती हुई की स्वेत नीली रौशनी की कल्पना करते हुए अपनी आती और जाती हुई श्वास पे ध्यान केन्द्रित कर के ॐ मन्त्र का नित्य उच्चारण करने से यह चक्र जागृत होने लगता है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है की Amethyst Stone कि अगुठी, पेंडेंट, माला अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है। अगर आप की कुंडली में शनि योगकारक और शुभ हों तो आप नीलम भी धारण कर सकते हैं। पर इसके लिए अपने ज्योतिषी से सलाह लेना अवश्यक है ।

सहस्त्रार चक्र का जीवन में शुभ प्रभाव 

इसका प्रभाव यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा संपूर्ण परमात्मा और आत्मा है। जो व्यक्ति सहस्रार चक्र का जागरण करने में सफल हो जाते हैं, वे जीवन मृत्यु पर नियंत्रण कर लेते हैं सभी लोगों में अंतिम दो चक्र सोई हुई अवस्था में रहते हैं। अतः इस चक्र का जागरण सभी के बस में नहीं होता है। इसके लिए कठिन साधना व किसी योग्य गुरु के सानिध्य में लंबे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है।
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।। इति शुभम्।।

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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

ajna chakra । अजना चक्र एक परिचय

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अजना चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में छठवां चक्र है।

अजना अर्थात आज्ञा चक्र इस चक्र को तीसरी आंख भी कहते हैं तथा इसे छठी इन्द्रीय भी मानते हैं I यहाँ शिव और शक्ति का संयुक्त रूप से वास है अर्थात इस चक्र में चेतना और प्रकृति शक्ति संयुक्त है I इसका तत्व मन का तत्व ( अनुपद तत्व ) है और इसका रंग हलके जमुनी रंग की सफेद आभा सा है।  इसका बीज मंत्र  ॐ है। 

आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में भौहों के बीच स्थित है। इसे गुरुचक्र भी कहते है। ज्योतिष में आज्ञाचक्र बृहस्पति का केन्द्र है। यह चक्र मन और बुद्धि का मिलन स्थान है। इसी लिए इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केंद्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है। यह प्रमुख तीन नाड़ियों 1- इड़ा - चन्द्र नाड़ी २- पिंगला - सूर्य नाड़ी ३- सुषुम्ना - केंद्रीय, मध्य नाड़ी के मिलन का स्थान है। जब तीनो नाडियों की ऊर्जा यहाँ मिलती है और आगे उठती है, तब समाधी प्राप्त होती है, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है। व्यक्ति अलौकिक हो जाता है। बौद्धिक रूप से सम्पन्नता प्राप्त होती है।

आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में ९६ पंखुरी हैं जो दो मुख्य पंखुड़ियों में विभाजित एक कमल सी है यह दो पंखुरियां मानवीय चेतना ( धारणा, ज्ञान और स्पष्टता ) और परमात्मा के बीच की विभाजन रेखा है। आज्ञा चक्र आंतरिक गुरु का पीठ (स्थान) है। यह परिचायक है बुद्धि और ज्ञान का, जो आत्म चिंतन तथा आत्मिक जागरूकता का, सामान्य तौर पर कहा जाये तो जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहाँ ज्यादा सक्रिय है उसे देव शक्ति का अनुभव होने लगता है। । तथा उसे दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है । 

अजना चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव 

आज्ञा  चक्र का शरीर में दोनों  भौहों के मध्य का स्थान है। जहाँ सामान्य तौर पे स्त्रियाँ बिंदी लगाती हैं।  जब यह चक्र कम गति पे कार्य करता है तब व्यक्ति की याद करने की शक्ति कमजोर होती है, उसे कुछ नया सिखने में समस्या आती है, कल्पना शक्ति कमजोर होती है वह किसी चीज का अनुमान ठीक से नहीं लगा पाता, लोगों के प्रति कम संवेदनशील होता हैं, सहज ज्ञान का आभाव होता है, ज्यादा दिमांक पे जोर नहीं डाल पाता तथा नींद ज्यादा आती है । विद्या अध्यन करने वाले जातक का यह चक्र शुद्ध होना चाहिये।

और जब यह चक्र दूषित व असामान्य गती पर कार्य करने लगता है तो व्यक्ति कल्पना की दुनियां में जीने लगता है भले उनकी काल्पना वास्तविकता से कितनी भी दूर क्यों न हो, वह पूर्वाग्रही हो जाता हैं, मानसिकता सख्त हो हो जाती है, यह अति आलोचनात्मक हो सकता हैं, किसी के प्रति सहानुभूति नहीं दर्शा पाता, जल्दी ही विचलित भी हो जाता हैं, किसी भी स्थिति में तुरंत चिंताग्रस्त हो जाता हैं, बुरे स्वप्नों से परेसान रहता हैं, आदेश देने की प्रवित्ति बढ़ जाती है, एसे व्यक्तियों को अत्यधिक गुस्सा भी अता हैं तथा अत्यधिक जिद्दी भी होता हैं व मतिभ्रम की स्थिति होती हैं I

अजना चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां

इस चक्र के दूषित होने पर शरीर में निम्न बीमारियां उत्पन्न होने की सम्भावना होती है।  आधा सीसी का दर्द, मतिभ्रम, जुकाम हमेशा नाक का असमान्य रूप से भरी रहना, ज्वर, हार्मोनल विकार, मनोदशा विकार, आँखं का अस्वस्थ्य रहना, तंत्रिका तंत्र (Nervous System) तथा पिट्यूटरी ग्रंथि (Pituitary Gland) व शीर्ष ग्रंथि (Pineal Gland) का अनियंत्रित होना, साइनस (साइनोसाइटिस), व माथा सम्बंधित अनेक रोग होने कि प्रबल सम्भावना होती है। 

अजना चक्र जगाने की साधरण विधि

सर्व प्रथम शांत मन से तथा शुद्ध होकर शांत कमरे में किसी आसन पे सुखासन में बैठ जाये और भृकुटि के मध्य ( भौहों के बीच ) ध्यान लगाते हुए वहां हल्के नीले रंग की आभा की कल्पना करते हुए अपने रिश्तों और उनसे जुडी खुशियों पर सकारात्मक विचार मन में रखते हुए ॐ मन्त्र का उच्चारण नित्य करते रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। तथा माथे पर केशर का टिका नित्य लगाने से भी लाभ होता है। तथा इस  चक्र में लाभ के लिए गंगा जल का टिका भी लाभदायक है अथवा बहते हुए निर्मल जल को निहारना भी एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है की Lapis Lazuli Stone कि अगुठी, पेंडेंट, माला, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है।

अजना चक्र का जीवन पे शुभ प्रभाव 

इसका चक्र के जागरण का प्रभाव यहाँ अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं। व्यक्ति आकर्षक तथा अंतर्ज्ञानी हो जाता है स्मरण शक्ति अच्छी हो जाती है वह दिव्य दृष्टा हो जाता है अर्थात वह सिद्धपुरुष बन जाता है। चक्र विज्ञान में इड़ा´ नाड़ी को गंगा और ´पिंगला´ नाड़ी को यमुना और इन दोनों नाड़ियों के बीच बहने वाली सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहते हैं। इन तीनों नाड़ियों का जहां मिलन होता है, उसे त्रिवेणी कहते हैं। अपने मन को इस त्रिवेणी में जो स्नान कराता है अर्थात इस चक्र पर ध्यान करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

vishuddha chakra । विशुद्ध चक्र एक परिचय

vishuddha chakra । विशुद्ध चक्र एक परिचय

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विशुद्ध चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में पांचवा चक्र है।

विशुद्ध चक्र को कंठ चक्र भी कहा जाता है। इस शब्द का अभिप्राय संस्कृत में अशुद्ध्ता को शुद्ध करने को लेकर हैं। अब सायद चक्र में शुद्धि का अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, आत्मिक व मन की शुद्धि से है जैसे आत्मा की सत्यता व्यक्त करना व श्वसन के समय शरीर के विषैले तत्व को बाहर निकाल कर प्राण वायु को भीतर प्रवेश करवाना है। विशुध्द चक्र के देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं जो व्यक्ति की चेतना के प्रतीक हैं। जब व्यक्ति ध्यान लगाता है और उसकी चेतना आकाश में समाहित हो जाती है तब उसे आत्मानुभूति से ज्ञान और बुद्धि प्राप्त होती है।  इस चक्र में एक हाथी व चन्द्रमा दर्शाया गया है जो विशाल मन का प्रतीक है।  इस चक्र का रंग बैगनी है तथा इसका तत्व आकाश है व बीज मंत्र हं है।

विशुद्ध चक्र कंठ में स्थित गले के उभरे हुए भाग के ठीक नीचे स्थित होता है। योग शास्त्र के अनुसार यह कंठ स्थान देवी सरस्वती का माना गया है। यह चक्र सोलह पंखुडियों वाला कमल का फूल प्रतीत होता है क्योंकि यहाँ 16 नाड़ियाँ आपस में मिलती हैं (ये उन 16 शक्तिशाली कलाओं की प्रतीक भी हैं जीनके होने से व्यक्ति विकाश कर सकता है) I इनके मिलने से कमल की आकृति बनती है इस चक्र में 'अ' से 'अः  तक सोलह ध्वनियां (स्वर) निकलती हैं। इस चक्र को हमेशा उर्जा से भरा होना चाहिये यह चक्र मनुष्य जीवन में बहोत ही महत्वपूर्ण होता है।

अनाहत चक्र एक परिचय 

विशुद्ध चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव 

इस चक्र का शरीर के गले भाग पर पूर्ण प्रभाव होता है। इस चक्र के जागृत होते ही व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है वह जो बोलता है वह सत्य हो जाता है। और ऐसा माता सरस्वती की कृपा होता है। व्यक्ति के आयु की वृद्धि होती है, संगीत विद्या की सिद्धि प्राप्त होती है, शब्द का ज्ञान होता है व्यक्ति विद्वान होता है। यह चक्र अपने अनुभवों के बारे में बोलने की तीव्र इच्छा शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र श्रवण का भी केंद्र है और मनुष्य के सुनने की शक्ति इतनी विकसित कर देता है कि वह कानो से ही नहीं मन से भी सुनने लगता है।

यह चक्र व्यक्ति की प्रसन्नता की अनगिनत भावनाओं व स्वतंत्रता को दर्शाता है उसे यह ख़ुशी अपने योग्यता व कुशलता द्वारा प्राप्त होती है जो वाणी, गायन, स्पष्ट भाषण कला जो साफ सुथरी लय में होती है जो व्यक्ति के  संतुलित विचार से ही संभव होती है।

मूलाधार चक्र एक परिचय

विशुद्ध चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियाँ 

इस चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां जैसे - थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर संक्रमण मुंह व मसुढ़ों की तकलीफ , पीड़ा दायक गला, जबड़ा, जिह्वा, कन्धा, कान, और गर्दन सम्बन्धी रोग, उग्रता, हार्मोनल विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग, आदि होने की प्रबल सम्भावना होती है।


कमजोर चक्र फल स्वरूप - कमजोर संवाद, धीरे-धीरे बोलना, डरते हुए बोलना, बातों में हकलाहट होना कमजोर आवाज़ होती है। बात की सुरुवात करने में कठिनाई, बातचीत में शब्द का सही उपयोग न कर पाना तथा वह दुर्बल श्रोता भी हो सकता है ।

अति सक्रिय - विशुध्द चक्र की वजह से व्यक्ति बातें करते वक्त चिल्लाता है व उसके मुह से थूक के छीटे निकल सकते हैं। वह जब किसी से बात करता है तो सामने वाले को ठीक से न बोलने देता है न उसको ठीक से सुनता है बल्कि उसपर अधिकारपूर्ण वाणी से बातचीत करता है। आवाज ऊँची व कर्कश होती है जो कानो को चुभने वाली हो सकती है।  वह आलोचनात्मक हो जाता हैं। और छोटी बात का अति विश्लेष्ण कर के प्रायः तिल का ताड बना देने जैसी भवनात्मक परेशानियाँ से युक्त हो जाता है।

विशुद्ध चक्र जगाने की सरल विधि 

इस चक्र को संतुलित करने की लिए यह सरल उपाय है कि सर्व प्रथम शांत मन से शुद्ध होकर शांत कमरे में किसी आसन पे सुखासन में बैठ जाये और कंठ के पास बैगनी रंग की आभा की कल्पना करते हुए कंठ पे संयम करके गुन्जन (Vibration) से हं मन्त्र के नित्य जप से यह चक्र जागृत होने लगता है। और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर की ओर उठने लगती है। इस सधना को करने वाले व्यक्ति को सदा सत्य बोलना चाहिए एवं संभव हो तो गायन कला का अभ्यास करना चाहिए, अपने इष्ट का मन्त्र जप करना भी लाभकारी होता है I नित्य गुलाब के पुष्प को सूंघने से भी इस को संतुलित करने में सहायता मिलती है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है की Turquoise Stone कि अगुठी, पेंडेंट, माला जो गले को स्पर्श करे, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है। इसके अलावां फिरोजा व पन्ना रत्न भी धारण किया जा सकता है पर इन रत्नों को धारण करने से पूर्व अपने ज्योतिषी से सलाह ले लें

विशुद्ध चक्र का जीवन पर शुभ प्रभाव 

इस चक्र के जागृत होने पर व्यक्ति को सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । इसके जगृत होने से व्यक्ति अपने व्यवहार में अत्यन्त सत्यनिष्ठ, कुशल और मधुर हो जाता है और व्यर्थ के तर्क-वितर्क में नहीं फंसता, बिना अहम् को बढ़ावा दिए परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में वह अत्यन्त युक्ति कुशल हो जाता है। इस चक्र का ध्यान करने से दिव्य दृष्टि, दिव्य ज्ञान, तथा समाज के लिए कल्याणकारी भावना पैदा होती है।
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बुधवार, 22 अप्रैल 2020

anahata chakra । अनाहत चक्र एक परिचय

anahata chakra । अनाहत चक्र एक परिचय 


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अनाहत चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में चौथा चक्र है।

इस ह्रदय चक्र चक्र के देवता है भगवान ईश् व श्री जगदम्बा ( शिव-शक्ति) चक्र की देवी हैं काकनी सर्वजन हितकारी देवी का रंग पीला है I इस चक्र का रंग हरा हल्का नीला चमकदार, किरमिजी है, इस चक्र का तत्व वायु है, और इसका बीज मंत्र यं हैं।

इस चक्र का नाम अना+हत शब्द से बना है हत का अर्थ होता है समाप्त और अना का अर्थ है नही, मतलब जो कभी समाप्त न हो इसे दुसरे शब्दों में कहें तो जिसे घायल नहीं किया जा सके जो अजेय हो, जो हमेशा खुला हो, यह चक्र व्यक्ति के ह्रदय में स्थित होता है। और इसका गुण है प्रेम और हम सभी जानते हैं कि जीवन में एक निश्छल प्रेम ही है जो कभी समाप्त नहीं होता जितना प्रेम बांटा जायेगा यह उतना ही बढ़ता है।  यह व्यक्ति के जीवन में बिना शर्त प्यार करने की स्थिति को नियंत्रित करता है।  क्यूँ कि प्यार मनुष्य के जीवन में एक मरहम का कार्य करता है सायद इसी लिए इस चक्र को चिकित्सा का केंद्र भी कहा गया है। 

अनाहत चक्र का शरीर के अंग भाग पर प्रभाव 

अनाहत चक्र में  श्वेत रंग का कमल होता है जिसमे बारह पंखुरियाँ होती हैं जो संभवतः ह्रदय के सभी बारह गुणों की परिचायक हैं।  इस स्थान पर बारह नाड़ियाँ मिलती हैं। अनाहद चक्र में बारह ध्वनियां निकलती हैं। यह प्राण वायु का स्थान है। तथा यहीं से वायु नासिक द्वारा अंदर व बाहर होती रहती है। ( वायु के पञ्च प्रकार कहे गए हैं व्यान, सामान, अपान, उदान और प्राण वायु ) प्राण वायु शरीर की मुख्य क्रिया का संपादन करती है जैसे प्राण वायु को सभी अंगों में पहुँचाना अन्न-जल को पचाना, उसका रस बनाकर सभी अंगों में प्रवाहित करना, वीर्य बनाना, पसीने व मूत्र के द्वारा पानी को बहार निकलना प्राणवायु का कार्य है। वहीं अपान वायु ( एसिडिटी ) जिसे हम पेट में गैस बनना कहते है जब यह मणिपुर चक्र के दूषित होने पर ऊपर उठकर ह्रदय चक्र को खराब करती है तब दिल में ब्लोकेज जैसी स्थिति का कारण बनती है I यह चक्र ह्रदय समेत नाक के ऊपरी भाग में मौजूद है तथा ऊपर की इंद्रियों का काम इसके अधीन है। 

अगर व्यक्ति की ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो वह एक सृजनशील व्यक्ति होता है और हर क्षण कुछ न कुछ नया करने की सोचता है, वह कहानीकार, चित्रकार, कवि, शायर, इंजिनियर आदि हो सकता हैं । साथ ही परोपकार, छमा, करुणा, निष्कपट भवना से युक्त होता है।  

अनाहत चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियां - 

अनाहत चक्र के दूषित होने पर शरीर में निम्न प्रकार कि बिमारियां होने की सम्भावना बढ़ जाती है जैसे- ह्रदय एवं श्वास रोग ( Asthma), क्षय रोग टी.बी, छाती में खून जमना, दिल का जोर से धडकना फिर रुक जाना, स्तन कैंसर, छाती में दर्द, उच्च रक्तचाप तथा निम्न रक्तचाप, एलर्जी, बुखार आना, रक्षाप्रणाली विकार आदि।  

जब यह चक्र कम गति पर घूमता है तब व्याक्ति के अन्दर प्यार जैसी भवना कम हो जाती है और वह खुद से घृणा और खुद के लिए आलोचनात्मक हो जाता है, अपनी असफलता के लिए दूसरों पे दोष मढ़ता है, दुनियां की खूबसूरती उसे नजर नहीं आती वह सदा अनमना सा रहता है I ( शायद जब कोई लड़का या लड़की किसी से प्यार करते है तो उसे इजहार करने के लिए लाल गुलाब देते हैं लाल रंग जिवंतता का प्रतीक जो है ) ।

वहीँ जब यह चक्र तीव्र गति से घूमता है तब व्यक्ति भवनात्मक रूप से इर्ष्या, गुस्सा, ख़ुशी आदि में बेकाबू होने लगता है प्यार में शर्त रखने लगता है, पाने या हावी होने की कोशिस करता है जिसकी वजह से रिश्ता टूट भी जाता है पर उसे अपनी गलती समझ नहीं आती प्रायः ऐसे लोग गलत रिश्ते में भी रहते है । 

अनाहत चक्र जगाने ( संतुलित) की सरल विधि 

इस चक्र को जगाने का सबसे सरल मार्ग है सबसे पहले किसी हरे रंग के आसन पर बैठें (अगर किसी पार्क या हरी घास पे बैठे तो उत्तम) और ह्रदय पर संयम करे तथा ह्रदय स्थान पे हरे रंग की आभा की कल्पना करें और यं मन्त्र का गुंजन के साथ उच्चारण करें ऐसा नियमपूर्वक नित्य करने से यह चक्र धीरे धीरे जागृत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जागृत होने लगता है और शुष्मना इस चक्र को भेदकर ऊपर की ओर उठने लगती है। अगर रोज नंगे पावं हरी घास पर चला जाये तो भी यह चक्र संतुलित होने लगता है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है की Malachite या Jade Stone आदि कि अगुठी, पेंडेंट, माला जो ह्रदय को स्पर्श करे, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है। पन्ना भी लाभदायक रत्न हो सकता है पर इसे धारण करने से पहले अपने ज्योतिषी से सलाह ले लें। 

अनाहत चक्र जब संतुलित होकर सही ढंग से कार्य करने लगता है तब व्यक्ति में लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। तथा प्रेम और संवेदना मन में जाग्रत होती हैं व मन की इच्छा पूर्ण होती है। ज्ञान स्वतः ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित,चारित्रिक, रूप से जिम्मेदार, एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैसी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।
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रविवार, 19 अप्रैल 2020

manipura chakra । मणिपुर चक्र एक परिचय

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मणिपुर चक्र के लिए हमारे योग शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। यह शरीर के चक्र क्रम में तीसरा चक्र है।

मणिपुर चक्र को नाभि चक्र भी कहते हैं। इस चक्र के देवता भगवान रूद्र है तीन आँखों वाले शरीर में विभूति लगी हुई इनका सिंदूरी वर्ण है (मतान्तर से इस चक्र के अभीष्ट देवता ब्रह्मा जी हैं ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के नाभि-कमल से उत्पन्न हुए है और जिव-श्रृष्टि के निर्माता भी यही हैं ) यह चक्र मणि+पुर नामक शब्द से बना है मणि अर्थात मोती और पुर का अर्थ है शहर, इसे सौर जाल भी कहते हैं। यह स्वास्थ्य, सुरक्षा, ओज और तेज तत्व प्रदान करने वाला चक्र है। इसे सूर्य चक्र भी कहते हैं।  इस चक्र की देवी लाकिनी हैं जो सब का उपकार करने वाली है इनका रंग काला वस्त्र पिले हैं देवी आभूषण से सजी अमृतपान के कारण आनंदमय हैं। इस चक्र का तत्व है अग्नि और रंग है पीला. पिला रंग प्राण उर्जा, आत्मा तथा बुद्धि का प्रतीकात्मक रंग है। इस चक्र का बीज मंत्र है रं

यह चक्र कमल के दश पंखुडियों के प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया जाता है यह दश पंखुडियां दस अत्यावश्यक महत्वपूर्ण शक्तियाँ है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य को बनाये रखने में उसकी मदत करती हैं I यह चक्र आत्म विश्वास, आत्म आश्वासन, स्पष्ट विचार, ख़ुशी तथा ज्ञान-बुद्धि, स्वास्थ्य और व्यक्ति के उचित निर्णय लेने की शक्ति का है। यह चक्र नाभि मूल अर्थात नाभि से थोड़ा ऊपर स्थित होता है। यह चक्र शरीर का केंद्रबिंदु है और व्यक्ति की चेतना का भी केंद्रबिंदु है। और यही चक्र शरीर के अन्दर की उर्जा का संतुलन भी करता है।


जो साधक निरन्तर स्वांस-प्रस्वांस रूप साधना में लगा रहता है उसी की कुण्डलिनी-शक्ति मणिपूर चक्र तक पहुँच पाती है आलस्य में रहने वालों की नहीं। यही चक्र शरीर के सभी अंग तथा उप अगों को ऊर्जा का वितरण करता है। ऊपर हमने लिखा कि भगवान विष्णु के नाभि कमल पर ही ब्रह्मा का वास है। यह चक्र नाभि केंद्र के पास और रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित होता है। इसकी स्थिति मेरुदंड (Spinal Column) के भीतर समझनी चाहिए। यह चक्र नीलवर्ण वाले दस दलों के एक कमल के सामान है जिसमे प्रत्येक दल (पंखुरी) पर बीजाक्षर हैं चक्र के मध्य में उगते सूर्य की प्रभा के सामान तेजस्वी त्रिकोण रूप अग्नि छेत्र है जिनकी तीन भुजाओं पर स्वस्तिक है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहाँ एकत्रित है उसे काम करने की धुन सी सवार रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनियां का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

मणिपुर चक्र का शरीर के अंग भाग पर अधिकार 

यह चक्र मुख्य रूप से अग्नाश्य (Pancreas) तथा पाचन क्रिया (Digestive System) के कार्य प्रणाली को संचालित करता है जो जठराग्नि द्वारा भोजन को उर्जा में परिवर्तित करता है। यह पेट, यकृत (Liver) बड़ी आंत को नियंत्रित करता है I इस चक्र असंतुलित होने पर जठराग्नि की अग्नि मंद पड जाती है फिर भोजन पचने के बजाय सड़ता है जिससे धीरे धीरे बिमारियों का पदार्पण व्यक्ति के शरीर में होने लगता है I

मणिपुर चक्र के दूषित होने पर होने वाली बीमारियाँ 

जैसे - पाचन संबंधी रोग, अजीर्ण, मधुमेह (Sugar) उच्च रक्तचाप, पेस्टिक, अल्सर, अल्परक्तशर्करा, कब्ज, आंत्र-कृस्मृतिदोष, , थकान व पेट की लगभग सभी प्रकार की बीमारियाँ ।

अगर यह चक्र कम गतिशील है तो घबराहट, भय, डरपोकपन, आत्मविश्वास की कमी, अशांत, हमेशा अ सफलता का डर, निर्णय न ले पाने कमी, असुरक्षा की भवना, आत्महत्या के विचार आदि आना जैसे भावनात्मक मामले भी देखे जाते हैं।

वहीँ अगर यह चक्र असंतुलित होकर ज्यादा गति से कार्य करता है तो व्यक्ति में आक्रामकता, अधिक उर्जा जिसको नियंत्रित करने की आवस्यकता होती है येसे व्यक्ति आलोचनात्मक व तेज- मिजाज प्रवित्ति के हो जाते हैं। अगर यह प्रबंध आदि का कार्य देखते हैं तो जरुरत से अधिक कार्य में डूबे रहते हैं व अपने अधिनस्त कर्मचारियों को डरा धमकाकर रखने का निरंतर प्रयाश करते हैं।

मणिपुर चक्र जगाने की सरल विधि 

मणिपुर चक्र को जगाने की विधि है सबसे पहले आप पीले रंग के आसन पर अग्नि मुद्रा में बैठें (अनामिका ऊँगली को मोड़कर अंगुष्ठ के मूल में लगाने से अग्नि मुद्रा बन जाती है), अब इस चक्र पर ध्यान लगाएं, वहां पीले रंग की आभा की कल्पना करें संभव हो तो यह सूर्य की रौशनी में करें या ऐसा कमरा चुने जहाँ सूर्य की रोशनी आती हो, पेट से स्वास लें और गुंजन के साथ रं मन्त्र का उच्चारण करें निरंतर प्रयास से धीरे धीरे यह चक्र संतुलित होने लगता है।
मैंने अपने अनुभव में पाया है की टाइगर स्टोन नामक रत्न की अगुठी, पेंडेंट, अथवा ब्रेसलेट अदि पहनने से यह चक्र संतुलित करने में मदत मिलती है। citrine अथवा पुखराज भी लाभदायक रत्न होते हैं लेकिन इन्हें पहनने से पहले अपने ज्योतिषी से सलाह ले लें ।

मणिपुर चक्र जब संतुलित होकर सही ढंग से कार्य करने लगता है तब व्यक्ति के अन्दर से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि अवरोधक तत्व दूर हो जाते हैं। व्यक्ति खुद को तथा दूसरों को प्यार करता है तथा उनका सम्मान करने लगता है I यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना बहोत जरुरी है। आत्मवान होने के लिए आत्मशक्ति का अनुभव करना जरुरी है कि आप शरीर नहीं आत्मा हैं I
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