ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers
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मंगलवार, 7 मई 2024

padam kalsarp yog। पद्म कालसर्प योग

पद्म कालसर्प योग । padam kalsarp yog

जन्मकुण्डली में जब राहु पंचम व केतु एकादश भाव में हों तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म नामक कालसर्प योग बनता है

पद्म कालसर्प योग padam kaal sarp yog in hindi

इस योग के फल स्वरूप जातक को जल्दी संतान सुख नहीं मिलता। पुत्र संतान की चिंता रहती है। यदि संतान हो भी जाये तो बृद्धावस्था में अलग हो जाती है अथवा दूर चली जाती है।विद्याध्ययन में कुछ व्यवधान उपस्थित होता है। परंतु कालान्तर में वह व्यवधान समाप्त हो जाता है। जातक का स्वास्थ्य कभी-कभी असामान्य हो जाता है। इस योग के कारण दाम्पत्य जीवन सामान्य होते हुए भी कभी-कभी अधिक तनावपूर्ण हो जाता है। परिवार में जातक को अपयश मिलने का भी भय बना रहता है। जातक के मित्रगण स्वार्थी होते हैं और वे सब उसका पतन कराने में सहायक होते हैं। जातक को तनावग्रस्त जीवन व्यतीत करना पड़ता है। इस योग के प्रभाव से जातक के गुप्त शत्रू भी होते हैं। वे सब उसे नुकसान पहुंचाते हैं। उसके लाभ मार्ग में भी आंशिक बाधा उत्पन्न होती रहती है एवं चिंता के कारण जातक का जीवन संघर्षमय बना रहता है। जातक द्वारा अर्जित सम्पत्ति को प्राय: दूसरे लोग हड़प लेते हैं।प्रायः व्याधियों के कारण इलाज में अधिक धन खर्च हो जाने के कारण आर्थिक संकट उपस्थित हो जाता है। जातक वृध्दावस्था को लेकर अधिक चिंतित रहता है एवं कभी-कभी उसके मन में संन्यास ग्रहण करने की भावना भी जागृत हो जाती है। लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी एक समय ऐसा आता है कि यह जातक आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत होता है, समाज में मान-सम्मान मिलता है और कारोबार भी ठीक रहता है यदि यह जातक अपना चाल-चलन ठीक रखें, मध्यपान न करें और अपने मित्र की सम्पत्ति को न हड़पे तो उपरोक्त कालसर्प प्रतिकूल प्रभाव लागू नहीं होते हैं।

पद्म कालसर्प योग का उपाय

घर के शयनकक्ष में मोर पंख लगाएं तथा प्रतिदिन कम से कम एक बार मोर पंख अपने पुरे शारीर पे फिराऐं।

* किसी शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से मिर्मित नाग चिपका दें।
* शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से व्रत प्रारंभ कर 18 शनिवारों तक व्रत करें और काला वस्त्र धारण कर 18 या 3 माला राहु के बीज मंत्र का जाप करें। फिर एक बर्तन में जल दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं।
* भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, समयानुसार रेवड़ी तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही वस्तुएं दान भी करें। रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें। नाग पंचमी का व्रत भी अवश्य करें।
* नित्य प्रति हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ करें और हर शनिवार को लाल कपड़े में आठ मुट्ठी भिंगोया चना व ग्यारह केले सामने रखकर हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और उन केलों को बंदरों को खिला दें और प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं और हनुमान जी की प्रतिमा पर चमेली के तेल में घुला सिंदूर चढ़ाएं और साथ ही श्री शनिदेव का तेलाभिषेक करें।
* श्रावण के महीने में प्रतिदिन स्नानोपरांत 11 माला ॐ नम: शिवाय' मंत्र का जप करने के उपरांत शिवजी को बेलपत्र व गाय का दूध तथा गंगाजल चढ़ाएं तथा सोमवार का व्रत करें।

कालसर्प को लेकर पं. उदय प्रकाश शर्मा की अपनी बात

मुझे कुछ पाठकों ने मैसेज में लिखा की गुरु जी यह कालसर्प योग तो होता ही नहीं, इसका किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता तो उन्हें मै इतना ही कहना चाहूँगा कि काफी समय से कालसर्प योग की सत्यता को लेकर गुरुजनों में मतभेद चल रहा है. कोई इसकी सत्यता पर ही सवाल उठा रहा है,कोई इसके पक्ष में खड़ा है.वास्तव में यह सही है की हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसे किसी योग का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु ऐसे कई तथ्य हैं की जिन चीजों की जानकारी हमें पहले नहीं थी तथा उनकी खोज बाद में हुई, अब आप उन तथ्यों को यह कहकर नकार नहीं सकते की पहले के ग्रंथों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, अब जैसे ब्लॉग पहले नहीं होता था, ईमेल पहले नहीं होती थी, लैपटॉप का पहले कहीं जिक्र नहीं मिलता, मगर आज यह मौजूद हैं उसी तरह युग युगांतर से हर विषय में शोध कार्य होता रहता है और जीवन में जो अनुभव में आता है, वह प्रतिपादित भी होता है तो उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद हमें स्वीकार्य करना ही पड़ता है।

कहने का तात्पर्य यह है की यदि विद्वान् गुरुजनों ने किसी तथ्य की खोज बाद के काल में की है तो उस पर पूर्ण अध्ययन किये बिना उसे नकार देना हठधर्मिता ही कही जाएगी। कालसर्प योग पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है. कई अवस्थाओं में यह योग कुंडली में मौजूद होते हुए भी निष्क्रिय होता है, कई बार इसके दुष्परिणाम भी दिखाई पड़ते हैं । इसे एकदम से नकार देना भी उचित न होगा।


यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे ज्योतिष शास्त्र में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है। यहाँ हम यह कहना चाहेंगे कि अपने जीवन में मिलने वाले सारे अच्छे या बुरे फल अपने निजकृत कर्मो के आधार पर ही है, इसलिए ग्रहों को इसका दोष नहीं देना चाहिए बल्कि अपने शुभ कर्मों को बढ़ाना चाहिये व अशुभ कर्मों में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए तथा इश्वर पे भरोषा कर, हमेशा सकारात्मक विचार के साथ रहना चाहिये।

मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। मेरा यह प्रयास, कालसर्प को लेकर अपना अनुभव और जानकारी साझा करना है। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

रविवार, 21 मार्च 2021

Mangal Dosh Rectification मंगली योग का परिहार

 

मंगली योग का परिहार । mangal Dosh Rectification

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mangal dosh, mangal dosha remedies


ज्योतिष शास्त्र के लगभग सभी ग्रन्थों में मंगली योग के परिहार का उल्लेख मिलता है। परिहार भी आत्म कुण्डलिगत एवं पर कुण्डलिगत भेद से दो प्रकार के होते हैं । वर या कन्या की कुंडली में मंगली योग होने पर उसी की कुण्डली को जो योग मंगली दोष को निष्फल कर देता है, वह परिहार योग आत्म कुण्डलिगत कहलाता है। तथा वर या कन्या इन दोनों में से किसी एक की कुण्डली में मंगल योग का दुष्प्रभाव दूसरे की कुण्डली के जिस योग से दूर हो जाता है, वह पर कुण्डलिगत परिहार योग कहा जाता है। इस आलेख मे 10 ऐसे सूत्र दिए हैं जिनके कुंडली मे होने से मंगल दोष भंग या उसका परिहार हो जाता है। 

मंगल दोष पे सम्पूर्ण जानकारी 


(1) वर कन्या में से किसी एक की कुंडली में मंगली योग हो तथा दूसरे की कुण्डली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में शनि हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है।

(2) जिस कुण्डली में मंगली योग हो यदि उसमे शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण में तथा शेष पाप ग्रह त्रिषडाय में हो तथा सप्तमेश सप्तम स्थान में हो तो भी मंगली योग प्रभावहीन हो जाता है।

(3) यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो तो मंगल दोष प्रभावहीन हो जाता है।

(4) कुण्डली में लग्न आदि 5 भावों में से जिस भाव में भौमादि ग्रह के बैठने से मंगली योग बनता हो, यदि उस भाव का स्वामी बलवान् हो तथा उस भाव में बैठा हो या देखता हो साथ ही सप्तमेश या शुक्र त्रिक स्थान में न हों तो मंगली योग का अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है।

(5) वर कन्या में से किसी एक की कुण्डली में मंगली योग हो तथा दूसरे की कुण्डली में मंगली योगकारक भाव में कोई पाप ग्रह हो तो भी मंगली दोष प्रभावहीन हो जाता है।

(6) जिस कुण्डली में सप्तमेश या शुक्र बलवान हों तथा सप्तम भाव इनसे युत-दृष्ट हो उस कुंडली में मंगल दोष का प्रभाव न्यून हो जाता है।

(7) मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ स्थान में होने पर, कर्क या मकर का मंगल सप्तम स्थान में होने पर, मीन का मंगल अष्टम में होने पर, तथा मेष या कर्क का मंगल व्यय स्थान में होने पर मंगल दोष नहीं लगता।

(8) मेष लग्न में स्थित, मंगल, वृश्चिक राशि में चतुर्थ भाव में स्थित मंगल, वृषभ राशि में सप्तम स्थान में मंगल, कुम्भ राशि में अष्टम स्थान में स्थित मंगल तथा धनु राशि में व्यय स्थान में स्थित मंगल मंगली दोष नहीं करता।

(9) मंगली योग वाली कुंडली में बलवान् गुरु या शुक्र के लग्न या सप्तम में होने पर अथवा मंगल के निर्बल होने पर मंगली दोष का प्रभाव दूर हो जाता है।

(10) यदि मंगली योगकारक ग्रह स्वराशि मूलत्रिकोण राशि या उच्च राशि में हो तो मंगली दोष स्वयं समाप्त हो जाता है।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

रविवार, 10 जनवरी 2021

shankhpal kalsarp yog। शंखपाल कालसर्प योग और उपाय

शंखपाल कालसर्प योग और उपाय । shankhpal kalsarp yog

जन्मकुण्डली में जब राहु चौथे भाव में और केतु दशवें भाव में हो इनके बीच सारे ग्रह स्थित हों तो शंखपाल नामक कालसर्प योग बनता है।

                                       shankhpal kalsarp yog aur upay। शंखपाल कालसर्प योग और उपाय


जातक को घर, वाहन, माता का अपेक्षित सुख नहीं मिलता । कभी-कभी बेवजह चिंता घेर लेती है तथा विद्या प्राप्ति में भी उसे आंशिक रूप से तकलीफ उठानी पड़ती है। जातक को माता से कोई, न कोई किसी न किसी समय आंशिक रूप में तकलीफ मिलती है।अपने ही विश्वासघात करते हैं। सुख-संवृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति संबंधी अनेक परेसानी उठानी पड़ती है। नौकरों की वजह से भी कोई न कोई कष्ट होता ही रहता है। इसमें उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ता है। जातक का वैवाहिक जीवन सामान्य होते हुए भी वह कभी-कभी तनावग्रस्त हो जाता है। चंद्रमा के पीड़ित होने के कारण जातक समय-समय पर मानसिक संतुलन भी खोता रहता है। कार्य के क्षेत्रा में भी अनेक विघ्न आते हैं। पर वे सब विघ्न कालान्तर में स्वत: नष्ट हो जाते हैं। बहुत सारे कामों को एक साथ करने के कारण जातक का कोई भी काम प्राय: पूरा नहीं हो पाता है। इस योग के प्रभाव से जातक का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है, जिस कारण आर्थिक संकट भी उपस्थित हो जाता है। लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी जातक को व्यवसाय, नौकरी तथा राजनीति के क्षेत्रा में बहुत सफलताएं प्राप्त होती हैं एवं उसे सामाजिक पद प्रतिष्ठा भी मिलती है।


शंखपाल कालसर्प योग का उपाय 

राहु का मन्त्र जाप करने तथा नागपंचमी का व्रत करने व सर्पों को दूध पिलाने से इस योग के बुरे फलों में कमी आती है।

* शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।

* शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को जल में तीन बार प्रवाहित करें।

* 86 शनिवार का व्रत करें और राहु, केतु व शनि के साथ हनुमान की आराधना करें। और हनुमान जी को मंगलवार को चोला चढ़ायें और शनिवार को श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें।

* किसी शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल अपने ऊपर से सात बार उतारकर सात बुधवार को बहते जल में प्रवाहित करें।

* सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।

* शुभ मुहूर्त में सर्वतोभद्रमण्डल यंत्रा को पूजित कर धारण करें।

* नित्य प्रति हनुमान चालीसा पढ़ें और रसोईं में बैठकर भोजन करें। हनुमान चालीसा का नित्य 11 पाठ करें।

* सवा महीने तक जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं और प्रत्येक शनिवार को चींटियों को शक्कर मिश्रित सत्ताू उनके बिलों पर डालें।

* किसी शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को बहते जल में तीन बार प्रवाहित करें तथा किसी शुभ मुहूर्त में शनिवार के दिन बहते पानी में तीन बार कोयला भी प्रवाहित करें।


कालसर्प को लेकर पं. उदय प्रकाश शर्मा की अपनी बात 


मुझे कुछ पाठकों ने मैसेज में लिखा की गुरु जी यह कालसर्प योग तो होता ही नहीं, इसका किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता तो उन्हें मै इतना ही कहना चाहूँगा कि काफी समय से कालसर्प योग की सत्यता को लेकर गुरुजनों में मतभेद चल रहा है. कोई इसकी सत्यता पर ही सवाल उठा रहा है,कोई इसके पक्ष में खड़ा है.वास्तव में यह सही है की हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसे किसी योग का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु ऐसे कई तथ्य हैं की जिन चीजों की जानकारी हमें पहले नहीं थी तथा उनकी खोज बाद में हुई, अब आप उन तथ्यों को यह कहकर नकार नहीं सकते की पहले के ग्रंथों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, अब जैसे ब्लॉग पहले नहीं होता था, ईमेल पहले नहीं होती थी, लैपटॉप का पहले कहीं जिक्र नहीं मिलता,  मगर आज यह मौजूद हैं उसी तरह युग युगांतर से हर विषय में शोध कार्य होता रहता है और जीवन में जो अनुभव में आता है, वह प्रतिपादित भी होता है तो उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद हमें स्वीकार्य करना ही  पड़ता है।

कहने का तात्पर्य यह है की यदि विद्वान् गुरुजनों ने किसी तथ्य की खोज बाद के काल में की है तो उस पर पूर्ण अध्ययन किये बिना उसे नकार देना हठधर्मिता ही कही जाएगी। कालसर्प योग पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है. कई अवस्थाओं में यह योग कुंडली में मौजूद होते हुए भी निष्क्रिय होता है, कई बार इसके दुष्परिणाम भी दिखाई पड़ते हैं । इसे एकदम से नकार देना भी उचित न होगा। 

यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे ज्योतिष शास्त्र में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है। यहाँ हम यह कहना चाहेंगे कि अपने जीवन में मिलने वाले सारे अच्छे या बुरे फल अपने निजकृत कर्मो के आधार पर ही है, इसलिए ग्रहों को इसका दोष नहीं देना चाहिए बल्कि अपने शुभ कर्मों को बढ़ाना चाहिये व अशुभ कर्मों में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए तथा इश्वर पे भरोषा कर, हमेशा आशावान रहना चाहिये। 

काशी के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य, पं. उदय प्रकाश शर्मा 


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। मेरा यह प्रयास, कालसर्प को लेकर जिज्ञासु पाठकों के लिए अपना अनुभव और अपनी जानकारी साझा करना है। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

                                                  ।। इति शुभम् ।।


 

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गुरुवार, 7 जनवरी 2021

mangalwar ko janme log । मंगलवार को जन्मे लोग

 mangalwar ko janme log । मंगलवार को जन्मे लोग 


अक्सर मुझे ऐसे लोग मिलते हैं जो कहते हैं पंडित जी मेरा फलां दिन का जन्म हुआ है मेरे बारे में कुछ बताइए, मुझे मेरी जन्म तिथि, दिनांक, सनसमय कुछ भी ज्ञात नहीं बस यही दिन पता है कि मेरा जन्म मंगलवार को हुआ है । तो यह आर्टिकल उन्हीं लोगों के लिए  है


मंगलवार के दिन जन्म लेने वाले व्यक्ति का स्वभाव । Tuesday Birth

मंगलवार के दिन जन्म लेने वाले जातक की प्रकृति गर्म होती है। यह पराक्रमी, वीर, साहसी एवं संग्राम में  विजय प्राप्त करने वाले  होते है। इसकी बुद्धि विशेष अच्छी नहीं होती, इसी से यह बौद्धिक  कार्यों से अलग रहना पसंद करते है, परन्तु वीरता के कार्यों में आगे बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाले होते है। प्रायः यह सांवले रंग के होते हैं पर इनमे आकर्षण शक्ति बहुत गजब की होती है जिसकी वजह से विपरीत लिंगी इनकी तरफ बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं । 

यह लोग अपने शरीर को ही सब कुछ समझते हैं जैसे आज के समय में फ़िल्म अभिनेता, अभिनेत्री, जिम्नास्टिक आदि जो अपने शरीर को ही अपने कर्म का साधन बना लेते हैं, यह लोग रक्षा विभाग, पुलिस, आर्मी,  डाक्टरी शल्य चिकित्सा (surgery), खेल -कूद आदि में भी अग्रणी होते हैं। अपनी वाक्पटुता से यह लोगों को  सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। इनको रक्त संबंधी रिश्तों जैसे- चाचा, बुआ, बहन आदि से विशेष सहयोग प्राप्त होता है। यह दुश्मनी, कर्जा, बीमारी, बदला आदि  को ज्यादा महत्त्व देते हैं और इनसे सामना करने हेतु अधिक धन इकठ्ठा करते हैं

जमीनी संपत्ति भी यह लोग खड़ी करते हैं। यह अपनी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखते हैं। यह स्कूल आदि में पुस्तकों से सिखने के बजाय जीवन में कार्य कर के सिखने में अधिक विश्वास  करते हैं। यह जवानी के दिनों में कामुक भी बहुत होते हैं, इनके लिए प्रायः प्यार-मुहब्बत करना अक्सर मुसीबत बन जाता है, यह शंकालु भी बहोत होते हैं, यह अपनी पत्नी का लोगों से ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं करते, इनमे असुरक्षा की भावना भी अधिक होती है।

इन्हें  2, 32 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 74 वर्ष की होती है।

मंगलवार के दिन जन्म लेने वालों के लिए उपाय 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन के स्वामी मंगल होते हैं अतः अपने चहुमुखी कल्याण हेतु मंगल देव के मन्त्रों का जप करना चाहिए तथा संकट मोचन हनुमान जी व भगवान कार्तिकेय की पूजा-आराधना इन्हें करनी चाहिए साथ ही अपने छोटे भाई बहनों का उचित मार्गदर्शन, सहयोग व उनकी सुरक्षा करनी चाहिए। उनके उदंडता पे क्रोधित न होकर छमाशीलता अपनाना चाहिए।

रविवार, 20 दिसंबर 2020

1 MUKHI RUDRAKSH KE LABH। एक मुखी रुद्राक्ष के लाभ

 

एक मुखी रुद्राक्ष के लाभ । 1 MUKHI RUDRAKSH

1 MUKHI RUDRAKSH KE LABH। एक मुखी रुद्राक्ष के लाभ


रुद्राक्ष में 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने का बहुत महत्व है । यह रुद्राक्ष भगवान शिव के बहुत करीब है। अतः इसके धारण मात्र से जातक आरोग्यता , प्रसन्नता, सफलता की तरफ अग्रसर हो जाता है, चुनाव में विजय, राज सत्ता से सुख, प्रतिस्पर्धा में सफलता आदि के लिए यह रुद्राक्ष रामबाण सबित होता है। यह व्यक्ति के गंभीर पापों से मुक्ति में सहायता भी करता है, यह मन की शांती भी प्रदान करता है, इसे धारण करने वाले की इन्द्रियां उसके वश में होकर ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति की तरफ ले जाती है। तथा जो व्यक्ति धन-दौलत और भौतिक चीजों की चाहत करते हैं उन्हें एक मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए।

1 मुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिव स्वरूप है, इसके प्रतिनिधि ग्रह सूर्य हैं, इससे धारण करने के लिए

शिव पंचाक्षरी मन्त्र   ॐ नमः शिवाय 

से अभिमंत्रित करना अनिवार्य है।

1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने के 12 मुख्य फायदे

  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले के जीवन एवं घर में माता लक्ष्मी का आगमन होता है।
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने के सभी अनिष्ट दूर हो जाते हैं
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले के शत्रु स्वयं परास्त हो जाते हैं
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने से हृदय रोग समाप्त होता है तथा ह्रदयघात से रक्षा होती है
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने से मानसिक बिमारियों में लाभ मिलता है तथा मन को शांति प्राप्त होती है
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले की औरा (अभामंडल) मजबूत होता है
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि तथा व्यक्तित्व का विकास होता है
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण पा लेता है 
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति आंख, रक्त विकार तथा  सिर दर्द की समस्या से छुटकारा पा लेता है 
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने  वाले व्यक्ति को समाज में सम्मान एवं आदर प्राप्त होता है 
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने  वाले व्यक्ति शरीर में उच्च रक्तचाप BP धीरे धीरे नियंत्रित होने लगता है और कम दवाई से ही BP शांत रहता है
  • 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करने से शिक्षा में आ रही रुकावट दूर होती है
 

।। इति शुभम् ।।


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kulik kalsarp yog । कुलिक कालसर्प योग और उपाय

 कुलिक कालसर्प योग और उपाय । kulik kalsarp yog


जन्मकुण्डली में राहु दूसरे घर में हो और केतु अष्टम भाव में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के मध्य हों तो कुलिक नाम कालसर्प योग बनता है।
kulik kalsarp yog । कुलिक कालसर्प योग

इस योग के फल स्वरूप जातक को सदैव कोई न कोई रोग हुआ रहता है। प्रायः मुख व गुदा संबंधी रोग होते हैं। गले के ऊपर का अंग दोषपूर्ण होता है।अपयश का भी भागी बनना पड़ता है। इस योग की वजह से जातक की पढ़ाई-लिखाई सामान्य गति से चलती है तथा वह सदा भ्रम की स्थिति में रहता है। वैसे तो उसका वैवाहिक जीवन सामान्य रहता है परंतु आर्थिक परेशानियों की वजह से उसके वैवाहिक जीवन में भी जहर घुल जाता है। मित्रों द्वारा धोखा, संतान सुख में बाधा और व्यवसाय में संघर्ष कभी उसका पीछा नहीं छोड़ते। जातक का स्वभाव भी विकृत हो जाता है। मानसिक असंतुलन और शारीरिक व्याधियां झेलते-झेलते वह समय से पहले ही बूढ़ा हो जाता है। उसके उत्साह व पराक्रम में निरंतर गिरावट आती जाती है। उसका कठिन परिश्रमी स्वभाव उसे सफलता के शिखर पर भी पहुंचा देता है। परंतु इस फल को वह पूर्णतय: सुखपूर्वक भोग नहीं पाता है।

कुलिक कालसर्प योग का उपाय

* लग्न से सम्बंधित रत्न ज्योतिषीय सलाह लेकर धारण करें।
* विद्यार्थीजन सरस्वती जी के बीज मंत्रों का एक वर्ष तक जाप करें और विधिवत उपासना करें।
* शुभ मुहूर्त में बहते पानी में कोयला तीन बार प्रवाहित करें।
* हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें।
* श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
शनिवार और मंगलवार का व्रत रखें और शनि मंदिर में जाकर भगवान शनिदेव कर पूजन करें व तैलाभिषेक करें, इससे तुरंत कार्य सफलता प्राप्त होती है।
* सिद्ध कालसर्प योग शांति यंत्र पूजा घर में स्थापित करें।
* नाग की आकृति की चांदी की अंगूठी बनवाकर पहनें।

कालसर्प को लेकर पं. उदय प्रकाश शर्मा की अपनी बात 

मुझे कुछ पाठकों ने मैसेज में लिखा की गुरु जी यह कालसर्प योग तो होता ही नहीं, इसका किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता तो उन्हें मै इतना ही कहना चाहूँगा कि काफी समय से कालसर्प योग की सत्यता को लेकर गुरुजनों में मतभेद चल रहा है. कोई इसकी सत्यता पर ही सवाल उठा रहा है,कोई इसके पक्ष में खड़ा है.वास्तव में यह सही है की हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसे किसी योग का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु ऐसे कई तथ्य हैं की जिन चीजों की जानकारी हमें पहले नहीं थी तथा उनकी खोज बाद में हुई, अब आप उन तथ्यों को यह कहकर नकार नहीं सकते की पहले के ग्रंथों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, अब जैसे ब्लॉग पहले नहीं होता था, ईमेल पहले नहीं होती थी, लैपटॉप का पहले कहीं जिक्र नहीं मिलता,  मगर आज यह मौजूद हैं उसी तरह युग युगांतर से हर विषय में शोध कार्य होता रहता है और जीवन में जो अनुभव में आता है, वह प्रतिपादित भी होता है तो उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद हमें स्वीकार्य करना ही  पड़ता है।

कहने का तात्पर्य यह है की यदि विद्वान् गुरुजनों ने किसी तथ्य की खोज बाद के काल में की है तो उस पर पूर्ण अध्ययन किये बिना उसे नकार देना हठधर्मिता ही कही जाएगी। कालसर्प योग पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है. कई अवस्थाओं में यह योग कुंडली में मौजूद होते हुए भी निष्क्रिय होता है, कई बार इसके दुष्परिणाम भी दिखाई पड़ते हैं । इसे एकदम से नकार देना भी उचित न होगा। 

 एक छोटे से उदाहरण से समझें तो जब किसी छात्र की कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर हो रहे हों व राहू केतु पंचम भाव को प्रभावित कर रहे हों तो अपनी 15-16 वर्ष की आयु के दौरान उस छात्र का ध्यान शिक्षा की और से डगमगाने लगता है, जबकि इस से पहले वह एक बेहतरीन छात्र के रूप में जाना जाता है। यह सत्य है की कालसर्प का योग का  प्रभाव जीवन पर  कहीं न कहीं पड़ता ही है। आप  कालसर्प योग के ऊपर अपने अनुभव को मुझसे साझा भी कर सकते हैं। 


।। इति शुभम् ।।

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शनिवार, 19 दिसंबर 2020

disha shool। दिशा शूल

 disha shool। दिशा शूल

आईये जानते हैं यात्रा में दिशा शूल का विचार कितना महत्वपूर्ण होता है?


हम सभी लोग आये दिन कहीं न कहीं की यात्रा करते हैं। कभी काम- धंधे व व्यापार से संबंधित यात्रा तो कभी अपनी एजुकेशन से संबंधित यात्रा तो कभी किसी विवाह, रिश्ते जैसे मांगलिक कार्य हेतु यात्रा, कभी तीर्थ अथवा धार्मिक प्रयोजन से यात्रा। इस तरह के अनेकों ऐसे प्रयोजन होते है जिसके लिए हमें यात्रा करनी ही पड़ती है। हमारा यही मनोरथ होता है कि हम जिस भी कार्य हेतु यात्रा कर रहें हैं उसमे हमें सफलता जरुर प्राप्त हो। 

दिशा के बारे में तो हम सभी जानते हैं और शूल का अर्थ होता है चुभन अर्थात पीड़ा देने वाला इससे स्पष्ट होता है की कोई विशेष दिन किसी विशेष दिशा में यात्रा प्रारंभ करने पर पीड़ा अथवा चुभन (विघ्न) देता है। हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा जब दिशाशुल को समझने की कोशिश की गयी तो उन्होंने पाया कि दिशाशुल पूर्ण रूप से दिशा और पंच तत्व की एनर्जी पर कार्य करता है। आज विज्ञान की अनेक ऐसी शाखायें है जहाँ इन प्राचीन काल से चली आ रही प्रथाओं का विश्लेषण किया जा रह है और आश्चर्यजनक बात तो ये है कि परा – मनोविज्ञान और मेटाफिजिक्स ने तो इन प्रथाओं को स्वीकार भी कर लिया है।

पर आजकल की ज्यादातर जवान पीढ़ी बुजुर्गो की इन बातों को अन्धविसवास मानती है। लेकिन सत्य यही है कि बड़े हमेशा बड़े ही रहते हैं। इसलिए हमे उनका आदर करना चाहिए. साथ ही उनकी बातों का भी आदर करना चाहिए। भले ही आज की परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं पहले आज के जैसे तेज रफ़्तार वाहन नहीं होते थे 100 किलोमीटर की भी यात्रा लम्बी होती थी जहाँ पहुँचने में बहुत समय और उर्जा व्यय होती थी, उन्हें जाकर बिना कार्य हुए खाली वापस आने की पीड़ा न झेलनी पड़े इसके लिए वह यात्रा से पहले दिशा शूल का बहोत ध्यान रखते थे। भले ही आज हम अपने तेज रफ़्तार वाहन से अपने गन्यव्य पर जाकर लौट भी सकते हैं पर कार्य न हुआ अथवा उसमे कोई विघ्न आया तो अपना मूड ऑफ़ ही करेंगे, हाँ यह भी सत्य है की आज की भागम-भाग भरी तेज रफ़्तार जिंदगी में नित्य दिशा शूल का पालन कर पाना भी तो संभव नहीं है ऐसे में इसका जो भी सामान्य उपाय है उसको अपनाकर अपनी यात्रा सुखद तो की ही जा सकती है तो आइये पाठकों वास्तुविद एवं ज्योतिष आचार्य पं. उदय प्रकाश शर्मा द्वारा जानते हैं की दिशा शूल कैसे देखते हैं और अपनी यात्रा को कैसे शुभ एवं लाभप्रद बना सकते हैं।

रविवार को पश्चिम West दिशा तथा नैरित्य South West दिशा में दिशा शूल होता है

सोमवार को पूर्व East दिशा तथा आग्नेय South East दिशा में दिशा शूल होता है

मंगलवार को उत्तर North दिशा तथा वायव्य North West दिशा में दिशा शूल होता है

बुधवार को उत्तर North दिशा तथा ईशान North East दिशा में दिशा शूल होता है

गुरुवार को दक्षिण South दिशा तथा आग्नेय South East दिशा में दिशा शूल होता है

शुक्रवार को पश्चिम West दिशा तथा नैरित्य South West दिशा में दिशा शूल होता है

शनिवार को पूर्व East दिशा तथा ईशान्य North East दिशा में दिशा शूल होता है



दिशा शूल में महत्वपूर्ण नियम


यदि घर से अपनी यात्रा सुरु कर उसी दिन गंतव्य स्थान पर पहुंचं जाना हो तथा अपने नित्य के कार्य जैसे अपने ऑफिस, कारखाने, ड्यूटी, फिल्ड-मार्केटिंग आदि के लिए निकलना हो तो ऐसी यात्रा में दिशा शूल का कोई प्रभाव नहीं होता अतः इसका विचार नहीं करना चाहिए

अगर दिशा शूल में यात्रा करना अनिवार्य हो तो..


इसके लिए हमारे प्राचीन ऋषि-आचार्यों ने कुछ नियम प्रतिपादित किये हैं जिनका पालन करने से यात्रा सुखद होती है

रविवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्राम्भ करनी हो तो घर से दलिया अथवा घी खाकर निकले और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिससे दिशा शूल का दोष न्यून हो जाता है।

सोमवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो दर्पण मे अपना चेहरा देख कर घर से निकलें और हाँ अपनी यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिससे दिशा शूल का दोष न्यून हो जाता है। 

मंगलवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो   गुड़ खाकर घर से निकले। और अपनी यात्रा सुरु करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिसके प्रभाव से दिशा शूल का प्रभाव न के बराबर रहता है।

बुधवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो धनिया या तिल खाकर घर से निकले। और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिसके प्रभाव से दिशा शूल का प्रभाव न्यून हो जाता है।

गुरुवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो दही या जीरा खाकर घर से निकलना चाहिए। तथा यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना चाहिए  ऐसा करने से दिशा शूल का प्रभाव कम हो जाता है।

शुक्रवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो घर से  जौ या राइ खाकर निकलना शुभ होता है। और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना अच्छा होता है इससे दिशा शूल का प्रभाव कट जाता है।

शनिवार को अगर दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो घर से अदरक, उड़द या तिल खाकर निकलना चाहिए यह शुभ होता है। यहाँ भी यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना दिशा शूल के प्रभाव को कम करता है।

।। इति शुभम् ।।

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सोमवार, 7 दिसंबर 2020

ravivar ko janm lene wale । रविवार के दिन जन्म लेने वाले

अक्सर मुझे ऐसे लोग मिलते हैं जो कहते हैं पंडित जी मेरा फलां दिन का जन्म हुआ है मेरे बारे में कुछ बताइए, मुझे मेरी जन्म तिथि, दिनांक, सनसमय कुछ भी ज्ञात नहीं बस यही दिन पता है कि मेरा जन्म रविवार को हुआ है । तो यह आर्टिकल उन्हीं लोगों के लिए  है

रविवार  के दिन जन्म लेने वाले । Sunday ko janm lene wale

ravivar ko janm lene wale । रविवार  के दिन जन्म लेने वाले


रविवार के दिन जन्म लेने वाले जातक की प्रकृति तेज होती है, इनमे थोड़ी बहुत अहम की भवना होती है, यह दिखावा करना भी पसंद करते हैं, यह अपने पिता के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले होते हैं, अपनी माता से इनकी थोड़ी कम बनती है, यह भाई बहनों के प्रति पिता तुल्य जोम्मेदारी समझते हैं, यह सरकरी नौकरी पाने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। 

वैसे यह स्वतंत्र विचारों के होते हैं इसलिए यह किसी का दबाव बर्दास्त नहीं कर पाते हैं जिससे नौकरी में परेसनी भी बनी रहती है। 
यह ठेकेदारी से जुड़े कामों में अधिक सफल होते हैं। यह राज सत्ता के करीब रहने वाले और मान-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं, पर पीठ पीछे इनके कार्यों की बुराई भी होती है, इन्हें आलोचनाओं को सहने की आदत रखनी चाहिए, सफल होने के लिए इन्हें जनता के बिच रहना पड़ता है सायद इसी लिए यह एक अच्छे राजनीतिज्ञ भी होते हैं। 
यह परिवार में बहन, बेटी तथा बुआ के लाडले होते हैं, वैसे तो यह किसी से डरते नहीं पर अपनी जीवन साथी से ही कुछ डर महसूस करते हैं और इनको जीवन में अपनी स्त्री को लेकर परेसान भी होना पड़ता है। 
यह लोगों की अपेक्षा पे खरे उतरने वाले चतुर, दान करने वाले, समूह का नेतृत्व करने वाले आदेशात्मक वाणी बोलने वाले होते है।

इन्हें प्रायः पित्त की बीमारी के रोग लगते है। इन्हें 1, 6 महीने में तथा 13, 23 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 50 वर्ष व उससे अधिक होती है।

रविवार को जन्म लेने वालों के लिए उपाय 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन के स्वामी सूर्य हैं- अतः इन्हें भगवान सूर्य देव के मन्त्रों का जप करना चाहिए तथा भगवान शंकर की पूजा करनी चाहिये इससे इनके चहुमुखी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है तथा साथ ही  पिता और गुरुजन की सेवा और आज्ञा पालन से उतम सुख मिलता है।

।। इति शुभम ।।

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