ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers
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सोमवार, 18 मई 2026

Ghar Ki Unchai Vastu मकान की दिशा नहीं, उसकी ऊँचाई तय करती है वास्तु का संतुलन

 मकान की दिशा नहीं, उसकी ऊँचाई तय करती है वास्तु का संतुलन


                 South West Direction Height Benefits


क्या केवल प्लॉट की दिशा ही वास्तु तय करती है?

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यदि प्लॉट पूर्वमुखी है तो मकान का ऊँचा भाग भी पूर्व दिशा में होना चाहिए, या यदि प्लॉट पश्चिममुखी है तो पश्चिम दिशा को अधिक ऊँचा बना देना चाहिए।
लेकिन वास्तुशास्त्र का सिद्धांत इससे बिल्कुल अलग है।

वास्तु के अनुसार प्लॉट किसी भी दिशा का क्यों न हो, भवन का सबसे स्थिर, भारी और ऊँचा भाग सदैव नैऋत्य दिशा (South-West / S/W) में होना चाहिए। यही दिशा भवन को स्थिरता, मजबूती और ऊर्जा संतुलन प्रदान करती है।


आधुनिक घरों में सबसे बड़ी भूल

आज के समय में लोग घर बनाते समय डिज़ाइन, फ्रंट एलिवेशन, कलर कॉम्बिनेशन और आधुनिक सुविधाओं पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं।
लेकिन भवन की ऊर्जा संरचना को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

जबकि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा संतुलन का विज्ञान है।

किसी भवन का प्रभाव केवल उसके लुक, पोर्च की भव्यता या मुख्य द्वार से तय नहीं होता, बल्कि उसकी ऊँचाई, भार, ढाल (Slope) और वेंटिलेशन अर्थात खुले स्थानों से निर्धारित होता है।


क्यों महत्वपूर्ण है नैऋत्य (S/W) दिशा?

वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को पृथ्वी तत्व की दिशा माना गया है।
पृथ्वी का स्वभाव स्थिरता, धारण शक्ति और मजबूती है।

इसी कारण वास्तु में घर का भारी निर्माण, मोटी दीवारें, ऊँचा स्तर या भारयुक्त भाग इस दिशा में रखना शुभ माना गया है।

जब भवन का भारी और ऊँचा भाग S/W दिशा में होता है, तब घर की ऊर्जा नियंत्रित और संतुलित रहती है। ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि स्थिर होकर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है।

इसीलिए वास्तु में नैऋत्य को घर की शक्ति और स्थिरता का केंद्र कहा गया है।


यदि S/W में ऊँचाई देना संभव न हो तो क्या करें?

कई बार प्लॉट की स्थिति, डिज़ाइन या अन्य व्यावहारिक कारणों से नैऋत्य दिशा में पूर्ण ऊँचाई देना संभव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में दक्षिण या पश्चिम दिशा में ऊँचाई दी जा सकती है।

  • यदि पश्चिम दिशा ऊँची होगी, तो भवन का ढाल स्वाभाविक रूप से पूर्व दिशा की ओर बनेगा।

  • यदि दक्षिण दिशा ऊँची होगी, तो ढाल उत्तर दिशा की ओर रहेगा।

वास्तु का उद्देश्य केवल भार निर्धारित करना नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखना भी है। और यह संतुलन भवन की ऊँचाई और ढाल से स्वतः निर्मित होता है।


प्रकृति भी यही सिद्धांत सिखाती है

यदि हम प्रकृति को ध्यान से देखें, तो वास्तु के सिद्धांत स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं।

पर्वत सदैव स्थिर और ऊँचे होते हैं, जबकि नदियाँ ढाल की ओर बहती हैं।
ठीक उसी प्रकार भवन में भी एक दिशा स्थिरता का केंद्र बनती है और दूसरी दिशा ऊर्जा प्रवाह का मार्ग।

जब यह संतुलन सही होता है, तब घर केवल रहने का स्थान नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।


वास्तु का वास्तविक संदेश

वास्तु का मूल संदेश यह नहीं कि केवल प्लॉट की दिशा शुभ या अशुभ है।
बल्कि वास्तविक महत्व भवन के ऊर्जा संतुलन का है।

प्लॉट की दिशा कुछ भी हो सकती है, लेकिन स्थिरता और ऊर्जा प्रवाह का सिद्धांत नहीं बदलता।

इसीलिए वास्तु में कहा गया है कि घर किसी भी दिशा का हो, उसका भार और ऊँचाई नैऋत्य (S/W) दिशा में ही श्रेष्ठ मानी जाती है।


अंत में एक आवश्यक बात

मित्रों, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में अनेक मत-मतांतर हैं।
अतः किसी भी विषय को पढ़ें, समझें, अनुभव करें और फिर अपने व्यवहार में उतारें।

कृपया कुतर्क और अनावश्यक बहस से बचें। यदि आपके कुछ सुझाव हों तो मर्यादित शब्दों में अवश्य लिखें।
सोशल मीडिया पर मर्यादा बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

पूरा आलेख ध्यानपूर्वक पढ़ने हेतु आपका हृदय से धन्यवाद।

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो एक लाइक और प्यारा सा कमेंट अवश्य करें, जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु संबंधी पोस्ट लिखने की प्रेरणा मिलती रहे।

।। इति शुभम् ।।

शुक्रवार, 8 मई 2026

Vastu Ka Sabse Bada Satya । वास्तु का सबसे बड़ा सत्य — ऊर्जा कहाँ से आती है और कहाँ टिकती है?

 

वास्तु का सबसे बड़ा सत्य — ऊर्जा कहाँ से आती है और कहाँ टिकती है?

“ईशान कोण आकाश का द्वार है…और नैऋत्य पृथ्वी का आधार। इन दोनों के संतुलन का नाम ही वास्तु है।”

जब पृथ्वी एक मटका है — वास्तु का अद्भुत रहस्य


उत्तर-पूर्व से ऊर्जा का प्रवेश और दक्षिण-पश्चिम की स्थिरता का गूढ़ रहस्य

वास्तुशास्त्र को अक्सर लोग केवल दिशाओं, कमरों और निर्माण के नियमों तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। वास्तु केवल भवन निर्माण की पद्धति नहीं, बल्कि पृथ्वी, प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के बीच संतुलन स्थापित करने का एक प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह अनुभव किया था कि पृथ्वी पर बहने वाली सूक्ष्म ऊर्जाएँ मनुष्य के जीवन, मानसिकता, स्वास्थ्य, संबंध और समृद्धि को प्रभावित करती हैं। इन्हीं ऊर्जाओं को संतुलित करने के लिए वास्तुशास्त्र की रचना हुई।

यदि वास्तु को बहुत ही सरल और प्रतीकात्मक रूप में समझना हो, तो “मटका” उसका सबसे अद्भुत उदाहरण बन सकता है।

कल्पना कीजिए कि पूरी पृथ्वी एक मटके के समान है। मटके का निचला भाग — उसकी पेंदी — वह आधार है जिस पर पूरा मटका टिका रहता है। यही भाग मटके को स्थिरता देता है। यदि पेंदी कमजोर हो जाए, टूट जाए या उसमें छेद हो जाए, तो मटका चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, उसमें रखा जल कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। वास्तुशास्त्र में यही सिद्धांत दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य दिशा, S/W पर लागू होता है।

दक्षिण-पश्चिम — स्थिरता और पृथ्वी तत्व का केंद्र

वास्तु के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा पृथ्वी तत्व की दिशा मानी गई है। यह घर की स्थिरता, सुरक्षा, परिपक्वता, नियंत्रण, अनुभव और धन की मजबूती का प्रतीक है। जिस प्रकार मटके का भार उसकी पेंदी पर होता है, उसी प्रकार घर की संपूर्ण ऊर्जा का भार नैऋत्य दिशा पर टिका होता है।

इसी कारण वास्तु में दक्षिण-पश्चिम को भारी, ऊँचा और स्थिर रखने की सलाह दी जाती है। इस दिशा में मास्टर बेडरूम, भारी निर्माण, मजबूत दीवारें या स्थिर तत्व शुभ माने जाते हैं। यदि यह दिशा संतुलित होती है, तो परिवार में स्थायित्व, आर्थिक मजबूती और मानसिक संतुलन बना रहता है।

लेकिन यदि इसी दिशा में कटाव, गड्ढा, अत्यधिक खुलापन, पानी या मुख्य द्वार बना दिया जाए, तो घर की ऊर्जा अस्थिर होने लगती है। धन आता है लेकिन टिकता नहीं, रिश्तों में स्थायित्व नहीं रहता, मानसिक तनाव बढ़ता है और जीवन में निर्णय क्षमता कमजोर होने लगती है। क्योंकि जिस दिशा का कार्य ऊर्जा को संभालना था, वहीं से ऊर्जा का रिसाव प्रारंभ हो जाता है।

उत्तर-पूर्व — ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश द्वार

अब मटके के ऊपरी भाग को देखिए। मटके का मुख ऊपर की ओर खुला होता है, जहां से वर्षा का जल उसमें प्रवेश करता है। यही प्रतीक वास्तु में उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण का है।

ईशान कोण जल तत्व, दिव्यता, ज्ञान, आध्यात्मिकता, प्रेरणा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का क्षेत्र माना गया है। सूर्योदय की पहली किरणें, पृथ्वी का चुंबकीय प्रवाह और सूक्ष्म सकारात्मक ऊर्जा उत्तर और पूर्व दिशाओं से अधिक प्रभावी रूप में प्रवेश करती हैं। इसलिए वास्तु में उत्तर-पूर्व को खुला, स्वच्छ, हल्का और पवित्र रखने का विशेष महत्व बताया गया है।

जब घर का ईशान कोण संतुलित होता है, तब घर में सकारात्मकता, मानसिक शांति, अवसर, ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यही कारण है कि मंदिर, ध्यान स्थान या जल तत्व उत्तर-पूर्व में शुभ माने जाते हैं।


north east south west vastu Stability Chart


क्यों उत्तर और पूर्व दिशा शुभ मानी जाती हैं?

वास्तु में उत्तर और पूर्व दिशा को शुभ इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि यह केवल परंपरा है, बल्कि इसलिए क्योंकि यही दिशाएँ ऊर्जा के प्रवेश का माध्यम हैं।

यदि मटके का मुख सही दिशा में खुला हो, तो उसमें अमृत समान जल भरता रहेगा। लेकिन यदि वही मटका नीचे से टूटा हो, तो चाहे ऊपर से कितना भी जल डाला जाए, वह टिक नहीं पाएगा। यही कारण है कि वास्तु में केवल ऊर्जा को बुलाना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि उसे स्थिर रखना भी उतना ही आवश्यक बताया गया है।

उत्तर और पूर्व दिशा ऊर्जा को ग्रहण करती हैं, जबकि दक्षिण और पश्चिम दिशा उस ऊर्जा को धारण करती हैं। और इन सबके बीच दक्षिण-पश्चिम पूरे भवन की “ऊर्जा नींव” के रूप में कार्य करता है।

वास्तु का वास्तविक विज्ञान

आज आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि पृथ्वी पर चुंबकीय तरंगें, गुरुत्वीय प्रभाव और कॉस्मिक रेडिएशन लगातार कार्य कर रहे हैं। हमारे प्राचीन वास्तु ऋषियों ने इन्हीं शक्तियों को अनुभव करके भवन निर्माण के नियम बनाए थे। इसलिए वास्तु केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा के नियमों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का विज्ञान है।

जब किसी घर का उत्तर-पूर्व खुला और शुद्ध होता है तथा दक्षिण-पश्चिम मजबूत और स्थिर होता है, तब वह भवन केवल रहने का स्थान नहीं रह जाता, बल्कि वह सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और मानसिक संतुलन का केंद्र बन जाता है।

निष्कर्ष

धरती स्वयं एक विशाल ऊर्जा-पात्र है।
घर उसी धरती का एक छोटा रूप है।
और वास्तु उस ऊर्जा को सही दिशा से ग्रहण कर सही स्थान पर स्थिर करने की कला है।

यदि घर का ईशान कोण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का द्वार है, तो नैऋत्य उस ऊर्जा की सुरक्षा का आधार है।
यही संतुलन घर को केवल “मकान” से “सुख और समृद्धि के केंद्र” में परिवर्तित करता है।

प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ उदाहरण के लिए यह दिखाता है कि किस प्रकार पृथ्वी पर ब्रह्मांड से आने वाली ईशान्य दिशा की ऊर्जा S/W दिशा मे रखे एक मटके रूपी पात्र मे संचित होती है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।

प्रिय मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।  

मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो। 

सोमवार, 4 मई 2026

Vastushastra aur Surya ka Sambandh वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?

वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?


 हर दिन सूर्य आपके घर से दिखता है सवाल ये है कि क्या वो आपके घर या जीवन में प्रवेश कर पा रहा है? 

vastu me surya ka mahatva


आइए जानते हैं.. 
जब हम किसी घर या प्लॉट को केवल ईंट-पत्थर का ढांचा मानते हैं, तब हम उसकी वास्तविक शक्ति को नजर अंदाज कर देते हैं। वास्तव में, घर एक जीवंत ऊर्जा का केंद्र होता है और इस ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य का दैनिक भ्रमण हि है। वास्तुशास्त्र इसी प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह को समझकर जीवन को संतुलित करने की एक गहन प्रणाली प्रस्तुत करता है। यदि एक प्लॉट को केंद्र में रखा जाए और उसमें रहने वाले व्यक्ति की ऊर्जा लगभग (उदाहरण- के लिए मान लें तो) 6.300 हर्ट्ज मानी जाए, तो सूर्य की दिनभर की गति केवल आकाशीय परिवर्तन नहीं बल्कि ऊर्जा के क्रमिक उतार-चढ़ाव का एक वैज्ञानिक आधार बन जाती है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पूर्व दिशा (East) मे होता है

प्रातःकाल जब सूर्य पूर्व (East) दिशा में उदित होता है, उस समय उसकी ऊर्जा लगभग 4.100 हर्ट्ज होती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से कम होती है। यही कारण है कि सुबह 6 am से 8 am के बीच सूर्य की किरणें कोमल, शांत और जीवनदायिनी प्रतीत होती हैं। इस समय व्यक्ति सूर्य को खुली आंखों से देख सकता है और उसकी ऊर्जा को सहज रूप से अनुभव कर सकता है। यह काल मानसिक शुद्धि, ध्यान और प्राणायाम के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वास्तुशास्त्र में भी पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि यह सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रमुख द्वार है। इसी लिए वास्तु में पूर्व दिशा को हल्का, साफ-सुथरा और मुख्य द्वार बहुत शुभ माना गया है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य अग्नि कोण (S/E) मे होता है

आगे जैसे-जैसे सूर्य पूर्व से दक्षिण-पूर्व (S/E) अर्थात अग्नि कोण की ओर बढ़ता है, उसकी ऊर्जा में वृद्धि होने लगती है और वह अल्ट्रावायलेट किरणों के रूप में परिवर्तित होकर लगभग 6.300 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है , जो मनुष्य की ऊर्जा के समांतर हो जाती है। यह समय 9 am से 11 am तक का होता है, इसी समय में व्यक्ति पूरी तरह सक्रिय, चुस्त-दुरुस्त, ताजगी से भरपूर होकर हर कार्य के लिए तैयार रहता है। सामान्यतः लोग इस समय में अपने दैनिक कार्यों की शुरुआत करते हैं, अपने ऑफिस अथवा व्यापार के लिए निकलते हैं, और जीवन में उत्साह तथा उत्पादकता का अनुभव करते हैं। वास्तु के अनुसार अग्नि कोण को ऊर्जा और क्रियाशीलता का क्षेत्र माना गया है, इसलिए इस दिशा में रसोई या अग्नि से संबंधित कार्यों का स्थान होना शुभ माना जाता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य दक्षिण दिशा (South) मे होता है

दोपहर के समय 12 से 2 pm के बीच जब सूर्य दक्षिण दिशा में पहुंचता है, तब उसकी ऊर्जा अपने चरम पर होती है और लगभग 7.100 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से बहुत अधिक होती है। यह अवस्था सूर्य के प्रचंड और प्रभावशाली रूप को दर्शाती है, और यह आसमान में एकदम से हमारे सर के ऊपर होता है, इसे हम एक पिता के समान गरिमापूर्ण, अनुशासनात्मक और प्रभाव शक्ति का प्रतीक मान सकते है। विशेषकर गर्मियों में इस तीव्र ऊर्जा के कारण लोग प्रचंड धूप से बचने का प्रयास करते है और अधिकतर समय घर के भीतर या छाँव मे रहना पसंद करते हैं। वास्तु के अनुसार शायद इसलिए ही दक्षिण दिशा को स्थिर और भारी और ऊंचा रखने के लिए कहा गया है, और दक्षिण दिशा मे ऊंचे पेड़ लगाने की बात वास्तु मे की जाती है, जिससे घर में सूर्य की इस प्रबल ऊर्जा को संतुलित किया जा सके।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य नैऋत्य दिशा (S/W) मे होता है

इसके पश्चात सूर्य 3 pm से 5 pm के मध्य, धीरे-धीरे नैऋत्य दिशा S/W, की ओर अग्रसर होता है, जहां उसकी ऊर्जा इन्फ्रारेड किरणों में परिवर्तित हो जाती है। जहां ताप वैसे ही रहता है पर प्रकाश धीरे धीरे कम हो रहा होता है, इस अवस्था में ऊर्जा की तीव्रता कम होकर स्थिरता की ओर बढ़ती है और इसका प्रभाव व्यक्ति के शरीर और मन पर थकान के रूप में दिखाई देता है। यह वही समय होता है जब व्यक्ति अपने दिनभर के कार्यों से निवृत्त होकर घर लौटने की तरफ और विश्राम की ओर अग्रसर होता है। वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को स्थिरता, सुरक्षा और नियंत्रण का स्थान माना गया है, इसलिए यहां मास्टर बेडरूम का होना उपयुक्त समझा जाता है। इस दिशा को जितना अधिक भारी और ऊंचा किया जाता है, घर या अन्य निर्माण इस प्रकार की व्यवस्था की वजह से बहुत लाभ प्राप्त करता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पश्चिम दिशा (West) मे होता है

अब जब 6 बजे के आस-पास सूर्यास्त हो जाता है ( गर्मियों को छोड़कर क्योंकि अक्सर गर्मियों में सात या साढ़ेसात बजे तक सूर्यास्त होता है ) सो 7/8 बजे के बाद रात्रि होते ही धरती पर चंद्रमा की ऊर्जा सक्रिय हो जाती है, जो शीतल और शांत होती है, यह ऊर्जा मन और तन की शक्ति को पुनर्जीवित करने वाली होती है। अतः रात्रि में शयन के पश्चात यह शरीर और मन को पुनः संतुलित करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे व्यक्ति अगले दिन सुबह फिर से ऊर्जावान होकर अपने कार्य-व्यापार में नई ताजगी के साथ पुनः प्रवेश करने के लिए तैयार हो सके। वास्तु के अनुसार शयनकक्ष की सही दिशा और व्यवस्था इस प्राकृतिक ऊर्जा को प्रभावी ढंग से ग्रहण करने में सहायक होती है।

इस प्रकार सूर्य का दैनिक भ्रमण यह स्पष्ट करता है कि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं बल्कि ऊर्जा के संतुलन का विज्ञान है। जब घर या प्लॉट को इस प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुरूप बनाया जाता है, तब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बना रहता है। यही वास्तु का मूल सिद्धांत है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके जीवन को अधिक संतुलित, स्वस्थ और समृद्ध बनाया जा सकता है।

प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ यह दिखाता है कि किस प्रकार सूर्य अपने भ्रमण पथ से पृथ्वी पर अपना असर डालता है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।

प्रिय मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।  

मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो। 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

vastu me disha aur tatav kaise mile वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है

 

वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है… क्या ये आस्था है या pure science?”


आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में पाँच तत्वों का  किसी एक दिशा से हि संबंध क्यों और कैसे बना?  वास्तु के पीछे का वैज्ञानिक कारण। 

How were the elements and directions determined in Vastu?


वास्तुशास्त्र में पाँच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का निर्धारण किसी धार्मिक आस्था या कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति में उपस्थित ऊर्जा के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित एक व्यवस्थित सिद्धांत है। हमारे प्राचीन भारतीय वास्तु आचार्यों ने सबसे पहले यह जानने और समझने का प्रयास किया कि पृथ्वी पर ऊर्जा कैसे प्रवाहित होती है, किस दिशा में उसका स्वरूप कैसा होता है, और वह मानव जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती है, उन्होंने देखा कहीं ऊर्जा हल्की, शुद्ध और गतिशील है, कहीं भारी, स्थिर और संचित है, कहीं ताप (heat) अधिक है, कहीं वायु (motion) अधिक है, अतः उन्होंने इन्ही प्राकृतिक ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को पाँच मूल गुणों को पाँच तत्व के रूप मे अलग अलग दिशा मे स्थान दिया। 


वास्तुशास्त्र के अनुसार यह सभी पाँच तत्व किसी ठोस पदार्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे ऊर्जा के पाँच अलग-अलग रूप या गुण हैं। जल का अर्थ केवल पानी नहीं, बल्कि प्रवाह शुद्धता और संवेदना है, अग्नि का अर्थ केवल आग नहीं, बल्कि परिवर्तन और सक्रियता है, पृथ्वी स्थिरता और भार का प्रतीक है; वायु गति और परिवर्तनशीलता को दर्शाती है, और आकाश वह माध्यम है जिसमें यह सब घटित होता है। इस प्रकार पंचतत्व वास्तव में ऊर्जा के पाँच आयाम हैं, जिन्हें दिशाओं के अनुसार स्थान दिया गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पहला आधार

five elements in vastu with directions


इसका व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहला आधार सूर्य की गति है। हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है और उसकी किरणें दिनभर अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग कोण और तीव्रता के साथ पृथ्वी पर पहुँचती हैं। सूर्य पूर्व से उदय होकर दक्षिण की ओर झुकते हुए पश्चिम में अस्त होता है। सुबह के समय उत्तर-पूर्व दिशा में आने वाली किरणें अपेक्षाकृत कोमल, शुद्ध और कम ताप वाली होती हैं, जबकि दिन चढ़ने के साथ दक्षिण-पूर्व दिशा में सूर्य की किरणें अधिक तीव्र और ऊष्मा से भरपूर हो जाती हैं। दोपहर के बाद दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में ताप अधिक स्थिर और भारी हो जाता है, और शाम तक उत्तर-पश्चिम दिशा में ताप घटने लगता है तथा वायु की गति बढ़ जाती है। इस प्रकार दिनभर में ऊर्जा का एक निश्चित पैटर्न बनता है, जिसे ध्यान में रखकर तत्वों का निर्धारण किया गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का दूसरा आधार

अब इसका दूसरा आधार देखें तो वह पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र है। पृथ्वी के भीतर एक प्राकृतिक चुंबकीय प्रवाह होता है जो सामान्यतः उत्तर से दक्षिण की ओर चलता है। यह प्रवाह सूक्ष्म ऊर्जा स्तर पर प्रभाव डालता है और जीवित प्राणियों के जैविक तंत्र को भी प्रभावित करता है। जैसे पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी हुई है तो पृथ्वी के ऊपर का भाग उत्तर/पूर्व का का स्थान हुआ अतः ब्रह्मांड की सभी ऊर्जा, बारिश, ओस सब इसी दिशा से पृथ्वी पर प्रवेश करती है,जिसकी वजह से यहाँ हल्कापन और संवेदनशीलता अधिक होती है, और जहाँ यह स्थिर होती है अर्थात नीचे का दक्षिण/पश्चिम का भाग वहाँ भारीपन और स्थायित्व अधिक होता है। जैसे बारिश का पानी भी नीचे गहराई मे जाकर स्थिर होता है अतः इसी कारण से दिशाओं में ऊर्जा के अलग-अलग गुणों को पहचाना गया और उन्हें पंचतत्वों से जोड़ा गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का तीसरा आधार

तीसरा आधार वायु का प्रवाह और दाब का अंतर है। हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है और इसका संबंध तापमान से सीधा होता है। जहाँ ताप अधिक होता है वहाँ हवा ऊपर उठती है और निम्न दाब बनता है, जबकि ठंडे क्षेत्रों में हवा अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। पृथ्वी के भौगोलिक संदर्भ में सामान्यतः वायु का प्रवाह उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर देखा गया है। इस प्रवाह ने यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि किस दिशा में गतिशीलता अधिक है और किस दिशा में स्थिरता। इसे अगर आम बोलचाल की भाषा मे समझें तो?- जैसे हमारी पृथ्वी लट्टू की तरह पश्चिम से पूर्व की तरफ घूम रही है, क्यूँ की पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी है ती उसके झुकाव से उसका नीचे का स्थान दक्षिण-पश्चिम, S/W के तरफ चला गया और ऊपर का भाग उत्तर-पूर्व, N/E की तरफ, जैसे हम किसी कार या वाहन को पश्चिम से पूर्व की तरफ गति देते हैं तो वायु हमे सामने वाहन की खिड़कियों से आती हुई प्रतीत होगी इसी तरह से उत्तर-पश्चिम, N/W मे वायु का स्थान कहा गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का चौथा आधार

चौथा और बहुत ही महत्वपूर्ण है थर्मो डायनामिक्स आधार अर्थात ताप का व्यवहार। हम सभी जानते हैं कि सूर्य से मिलने वाली ऊष्मा हर दिशा में समान नहीं होती, बल्कि यह दिन के समय और दिशा के अनुसार बदलती रहती है। उत्तर-पूर्व, N/E क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा और शुद्ध रहता है, सूर्य के यहाँ से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य के रश्मि प्रभाव को हम अल्ट्रा वायलेट ऊर्जा के रूप मे पहचानते हैं, दक्षिण-पूर्व, S/E क्षेत्र में सूर्य का ताप बढ़ने लगता है, साधारण भाषा मे समझें तो जब पृथ्वी N/E मे झुकी हुई है तो उसकी पीठ सूर्य राशमियों के ठीक सामने आ जाती है जिसकी वजह से S/E सबसे तप्त स्थान हो जाता है, जिसकी वजह से आचार्यों ने इस स्थान को ही अग्नि कोण कहा है, अब दक्षिण दिशा से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य की यही ऊर्जा इन्फ्रारेड मे बदल जाती है, अब सूर्य दक्षिण-पश्चिम, S/W में अधिकतम स्थिर और भारी रूप ले लेता है, और उत्तर-पश्चिम में यह धीरे-धीरे कम होता हुआ गतिशील वायु में परिवर्तित हो जाता है। अग्नि का वास्तविक अर्थ केवल ज्वाला नहीं, बल्कि परिवर्तन की ऊर्जा है—वह शक्ति जो किसी पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलती है। इस तापीय क्रम ने भी पंचतत्वों के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके अतिरिक्त ऊर्जा प्रवाह के क्रम को भी समझना आवश्यक है। वास्तु में ऊर्जा का एक चक्र माना गया है जिसमें उत्तर-पूर्व से ऊर्जा का प्रवेश होता है, दक्षिण-पूर्व में वह सक्रिय और परिवर्तित होती है, दक्षिण-पश्चिम में स्थिर होकर संचित होती है, और उत्तर-पश्चिम में गति प्राप्त करके बाहर की ओर प्रवाहित होती है। इस क्रम में दक्षिण-पूर्व की भूमिका एक “एक्टिवेशन पॉइंट” की होती है, जहाँ निष्क्रिय ऊर्जा सक्रिय रूप लेती है। यही वैज्ञानिक तर्क अग्नि तत्व को इस दिशा में स्थापित करता है।

five elements vastu zones and colors


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पाँचवाँ आधार

जिसमे अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी यह 4 तत्व स्थित हैं वह है आकाश तत्व, आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे सूक्ष्म और व्यापक माना जाता है। जहाँ पृथ्वी स्थिरता देती है, जल प्रवाह देता है, अग्नि ऊर्जा देती है, वायु गति देती है—वहीं आकाश तत्व इन सबका का आधार तत्व है, आकाश तत्व वह खाली स्थान है जो इन सबको धारण करता है। आकाश का अर्थ है खुलापन, शून्यता और विस्तार। वास्तुशस्त्र के अनुसार यह सिर्फ “खाली जगह” नहीं बल्कि ऊर्जा के प्रवाह का माध्यम है। यह ध्वनि (sound) का वाहक है, सभी दिशाओं को जोड़ने वाला ब्रह्म तत्व है, आकाश तत्व सकारात्मक ऊर्जा को फैलाने का काम करता है, प्रथम चारों तत्व की एक सीमा निर्धारित है पर यह आकाश तत्व हर सीमा से परे है, यह ननंत है ना इसका कोई ओर-छोर है ना कोई बाउंड्री है। वस्तुशास्त्र मे आकाश तत्व को  मध्य स्थान, ऊर्ध्व  स्थान, मुख्य स्थान (ब्रह्म स्थान) कि दिशा मे कहा गया है।आकाश तत्व दिखता नहीं, लेकिन पूरे घर/संसार की ऊर्जा उसी पर आधारित होती है।

अंततः हमने जाना की वास्तुशास्त्र में पंचतत्वों का निर्धारण एक समग्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसमें सूर्य की गति, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, वायु का प्रवाह, तापमान का वितरण और मानव शरीर की जैविक प्रतिक्रिया—इन सभी को एक साथ समझकर दिशाओं में ऊर्जा के गुण निर्धारित किए गए हैं। यह व्यवस्था इस बात को दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि प्रकृति के गहन अवलोकन और वैज्ञानिक समझ पर आधारित एक सुव्यवस्थित प्रणाली भी था। कितने महान थे हमारे पूर्वज आचार्य, ऋषि-मुनि जिन्होंने बिना किसी उन्नत दूरबीन, आधुनिक सेटेलाइट और सटीक उपकरण के ऊर्जातत्व के इन क्रमों को समझकर उन्हे सटीक रूप से दिशा अनुरूप वितरण कर के हमे दिशा प्रदान किया।


मित्रों यह निरंतर अध्ययन, अध्यापन और कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु और तत्वों को लेकर संसार मे बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । आप ने इस लेख को ध्यान से पढ़ा इसके लिए धन्यवाद। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

vastu ka dar वास्तु का डर या समाधान??

 

क्या आपका वास्तु शास्त्री आपको 'समाधान' दे रहा है या 'मौत' का डर??


“वास्तु के नाम पर समाधान मिल रहा है… या डर बेचकर खेल खेला जा रहा है?”

vastu ka dar 

​सोशल मीडिया के 'रील-गुरुओं" द्वारा वास्तुशास्त्र जैसा महान ज्ञान आज मजाक बनकर रह गया है।​आजकल वास्तु शास्त्र का अर्थ 'सुख-शांति' नहीं, बल्कि 'खौफ' बन गया है। आप सोशल मीडिया Reels. shorts स्क्रॉल करते हैं, और अचानक एक 'रिल गुरु' प्रकट होकर चीखता है अगर यहाँ टायलेट है तो कैंसर हो जाएगा। कोने का मकान है तो 3 साल में मौत हो जाएगी। लाल रंग यहाँ है तो पैसा आना बंद हो जाएगा। साउथ वेस्ट में छत पर पानी की टंकी है तो हार्टअटैक आ जाएगा!"

आप ठहरिए! और गहरी सांस लीजिए। यह वास्तु शास्त्र नहीं है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी" है, जिसका मकसद आपकी जेब काटना है। अतः आप सब खुद इस हकीकत को तर्क Logic की कसौटी पर परखें। लकीर का फकीर होना ठीक नहीं है।

क्या वास्तु के नाम पर मेडिकली डराने का खेल नहीं है, हम सभी जानते हैं कि इंसान सबसे ज्यादा अपनी और परिवार की सेहत से डरता है कि उसे कोई भयानक रोग न लग जाए। इसीलिए ये वास्तु के नियमों को बीमारिओं से जोड़ देते हैं। ​कहीं कैंसर का डर, तो कहीं हार्ट अटैक की भविष्यवाणी। ​कहीं किडनी फेल होने की चेतावनी, तो कहीं एक्सीडेंट का खौफ।

सच्चाई यह है कि घर की दिशाओं में कुछ बदलाव करने से कैंसर ठीक नहीं होता और न ही केवल एक टॉयलेट की वजह से किसी को हार्ट अटैक आता है। यह "नीम-हकीम खतरा-ए-जान" वाली बात है। इनका मकसद आपको डिप्रेशन में डालना है ताकि आप घबराहट में इनके महंगे और बेतुके उपाय (Remedies) खरीद लें।

वास्तु मे सबसे बड़ा झूठ 

सबसे बड़ा गप्प तो 'कोने का मकान' और 'मौत' का झूठ है, आजकल बहुत से "रिल गुरु" हर दूसरी वीडियो में दावा करते है— "कोने अर्थात कॉर्नर के मकान में रहने वाले की 3 साल में मृत्यु निश्चित है।" आप खुद सोचिए अगर कोने का मकान वाकई 'काल' होता, तो संसार के हर गली मुहल्ले में कॉर्नर के मकान होते हैं और उनमें हजारों लोग सुख से रह रहे हैं, और यह तथाकथित बहुत से वास्तुविद/"रिल गुरु" कॉर्नर के मकान के नाम पर आपको अपना घर बेचने या तुड़वाने पर मजबूर करते है। यह 3 दिनों का वास्तु कोर्स कर के तोते की तरह यही सब रटा-रटाया झूठ बोलते रहते हैं।

घर को 'कबाड़' बनाने का षड्यंत्र- ​ये लोग आपके सुंदर घर को ब्रास की मूर्तियां, तांबे की तारों, रंग-बिरंगी टेप, चमकीली रेडियम की पट्टियों से भर देते हैं। ​उत्तर और पूर्व North/East जैसी पवित्र दिशाओं में ये तांबे की तार और कीलें ठोक देते हैं, जिससे घर के ईशान्य दिशा से सकारात्मक (Positve Enaergy) ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है। ​जो घर आपको सुकून देने के लिए था, उसे ये 'डर का म्यूजियम' बना देते हैं पढ़े-लिखे लोग भी इनकी चकाचौंध एडिटिंग, डायलॉग और आत्मविश्वास देखकर भ्रमित हो जाते हैं और अपने हाथों अपने घर का वास्तु खराब कर लेते हैं।
​जागो और इनसे तर्क करो, हर बात को सर हिलाकर मानना बंद करो, किसी भी रेमेडी अथवा उपाय का तार्किक कारण पूछो।

वास्तु का अनुभव 

अतः अपने लंबे वास्तु अनुभवों के आधार पर मैं वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा आप से यही कहना चाहूंगा कि वास्तुशस्त्र जीवन को बेहतर बनाने का विज्ञान है, डराने का नहीं। वास्तु दोष है, तो उसका तार्किक समाधान भी होता है, न कि कैंसर या हार्ट अटैक की धमकी। ​रील्स Reels देखकर खुद से वास्तु समाधान करना बंद करें, कोई भी वास्तु रेमेडी यूं ही खरीदकर घर न लाएं। 

अगर सचमुच घर या कार्यालय में कुछ वास्तु समस्याएं हैं तो किसी योग्य वास्तुशास्त्री से संपर्क करें, इन "रिल गुरुओं" की 60 सेकंड की वास्तु वीडियो देखकर अपने घर में तोड़-फोड़ न करें। ​अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करें। ऐसे 'डर के सौदागरों' को अपने जीवन और सोशल मीडिया से आज ही ब्लॉक करें। इनसे फ्री के सवाल करना बंद करें, यह आप का समाधान तो क्या करेंगे, उल्टा आप को और भयभीत कर देंगे। आप अपने नजदीकी अपने क्षेत्र/सिटी के किसी जानकार वास्तुविद को अपने घर वास्तु विज़िट के लिए आमंत्रित करें, अपने घर का वास्तु निरीक्षण कराएं, और उनके बताए उपाय को अजमाएं आप अवश्य लाभवन्तित होंगे। फ्री की चीजें हमेशा दुख देती हैं। 

रविवार, 10 जनवरी 2021

toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा

 toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा 

​"लाख कोशिशों के बाद भी घर में पैसा नहीं टिक रहा या कोई न कोई बीमार रहता है? वास्तु शास्त्र के अनुसार, इसका कारण आपके शौचालय की गलत स्थिति हो सकती है। जानिए कौन सी दिशा आपके लिए वरदान है और कौन सी अभिशाप।"

आज के समय में बन रहे ज्यादातर घरों में स्थान की कमी अथवा शहरी संस्कृति और शास्त्रों की अनभिज्ञता के कारण शौचालय का निर्माण गलत दिशा में हो जाता है जिससे उस घर मे रहने वाले परिवार को स्वास्थ्य और धन संबंधी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः जब भी घर में शौचालय का निर्माण कराया जाए तो उसे वास्तु के अनुसार ही करना चाहिए, नहीं तो ये घर में यही शौचालय negative energy नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का कारण बनते हैं। इनकी गलत दिशा के कारण परिवार के लोगों का स्वास्थ्य खराब बना रह सकता है। तो आइए मित्रों जानते हैं कि शौचालय निर्माण में किन मुख्य बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है?


शौचालय के उपयुक्त दिशा 

सर्वप्रथम वस्तुशात्र के अनुसार घर में शौचालय के लिए सबसे अच्छा स्थान SSW अथवा WNW एवं ESE का होता है। घर के मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए यह घर (भवन) का ब्रह्म स्थल होता है यहां वास्तु पुरुष की नाभि होती है, यहां बना शौचालय स्वास्थ्य के साथ जीवन में संघर्ष की शक्ति को समाप्त करता है। ईशान अथवा नैऋत्य कोण में शौचालय का निर्माण निषिद्ध किया गया है। ईशान कोण में शौचालय होने से गृह-क्लेश में वृद्धि होती है साथ ही कैंसर जैसा भयंकर रोग होने कि संभावना रहिती है, घर के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, नए और शुभ विचार नहीं आते, घर को आर्थिक संकटों का सामना निरंतर करना पड़ता है तथा सारे घर में negative energy अपवित्रता का वातावरण हमेशा बना रहता है। वहीं नैऋत्य कोण में शौचालय बनाने से मानसिक अस्थिरता, संबंधों में खटास, प्रगति में बाधा, नजर दोष तथा शारीरिक कष्टों में वृद्धि होती है।

शौचालय के अंदर की व्यवस्था 

यदि शौचालय कमरे के साथ ही बनाना हो तो इसे कमरे के वायव्य कोण में बनाना चाहिए। नैऋत्य कोण में शौचालय निर्माण सर्वथा निषिद्ध है। शौचालय में ताजी हवा तथा प्रकाश के आगमन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय का दरवाजा पूर्व अथवा अग्नि कोण में होना चाहिए तथा टॉयलेट सीट इस प्रकार फिट होनी चाहिए कि सीट पर बैठते समय व्यक्ति का मुख दक्षिण अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे, भूलकर भी मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर नहीं करना चाहिए।

शौचालय में पानी की व्यवस्था पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होनी चाहिए, अगर वाशबेसिन भी शौचालय में लगाए जाने हैं तो वह भी पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाने चाहिए। वैसे शौचालय में दर्पण का प्रयोग वर्जित है फिर भी अगर लगाना है तो उसे भी उत्तरी और पूर्वी दीवाल पर ही लगाएं। 

वेंटिलेशन, एग्जॉस्ट एवं ड्रेनेज की व्यवस्था 

शौचालय में शुद्ध वायु के आवागमन के लिए खिड़की या वेंटिलेशन उत्तर या पूर्व दिशा में होना उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इन दिशाओं से प्राकृतिक प्रकाश एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता है।

एग्जॉस्ट फैन लगाने के लिए वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह दिशा वायु तत्व की होती है और दूषित वायु को बाहर निकालने में सहायक होती है। वैकल्पिक रूप में, यदि वायव्य कोण उपलब्ध न हो, तो एग्जॉस्ट फैन उत्तर या पूर्व दिशा में भी लगाया जा सकता है।

जल निकासी (ड्रेनेज) का ढाल इस प्रकार रखा जाए कि पानी का प्रवाह उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। इससे जल का उचित प्रवाह बना रहता है तथा स्थान स्वच्छ बना रहता है।

अन्य महत्वपूर्ण निर्देश 

शौचालय कभी भी रसोई घर के सामने ना बनाएं अगर शौचालय एवं स्नानघर इकट्ठा बनाना है तो यह पश्चिम वायव्य अथवा पूर्व आग्नेय दिशा में होना चाहिए इसमें लगे शावर व नल आदि ईशान कोण में तथा टॉयलेट की सीट वायव्य कोण में होनी चाहिए यह पश्चिम दिशा में भी सुविधा अनुसार रखी जा सकती है वाशबेसिन की स्थिति पश्चिम में होनी चाहिए।

शौचालय के लिए वास्तु टिप्स toilet vastu remedies

अगर किसी कारण वश शौचालय का निर्माण गलत हुआ है तो निम्नलिखित कुछ उपाय करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा को आने से रोका जा सकता है।

*अगर पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा के मध्य स्थान तक शौचालय की खिड़की खुलती हो तो उस खिड़की में 3 क्रिस्टल की बॉल लाल रिबन में बांधकर लटका दें जब सूर्य की रश्मियां उस क्रिस्टल बॉल से टकराकर शौचालय में पड़ेंगी तो वहां की नकारात्मक ऊर्जा जल जाएगी।

* शौचालय की दुर्गंध घर में बिल्कुल न फैले इसका विशेष ध्यान रखें, इसके लिए सुगंधित चीजों का छिड़काव आदि करें।

* शौचालय में किसी सूखे स्थान पर समुद्री नमक किसी कांच की कटोरी आदि में भरकर रखे और सप्ताह में एक बार उसी कमोड में डालकर फ्लश कर दें तथा वापस नया नमक रख दें।

नोट- इस तरह के कुछ उपाय करने से बहोत हद तक सकारात्मक लाभ उठाया जा सकता है, अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार की मदत लें।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद 

नोट — उक्त उपाय करने से बहुत हद तक सकारात्मक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार का मार्गदर्शन प्राप्त करें।

रविवार, 27 दिसंबर 2020

paschim disha vastu shastra । पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र

पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र । paschim disha

पश्चिम दिशा के स्वामी ग्रह शनि हैं तथा देवता वरुण है। यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है। शनि को ज्योतिष में भगवान शंकर द्वारा न्यायाधीश की पदवी प्राप्त हुई है। यह हमारे कर्मो के आधार पर फला-फल की न्यायोचित व्यवस्था करते हैं। 

paschim disha vastu shastra ।  पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र



क्यों की आज कलयुग में बुरे कर्मों का बोलबाला है, सो अधिकांश लोग शनि देव को लेकर भय एवं भ्रम की स्थिति में रहते हैं। वास्तु में इस दिशा को कारोबार, गौरव, स्थायित्व, यश और सौभाग्य के लीये जाना जाता है।

इस दिशा में सूर्यास्त होता है, वहीँ आम जनमानस में डूबते हुए सूर्य को देखना शुभ नहीं माना जाता क्यों की सूर्य की ढलती हुई किरणे हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं इसलिए आवश्यक है कि हम भवन में पश्चिम दिशा में भारी और ऊँचा निर्माण करें। 

वास्तु अनुसार इस दिशा में डाइनिग रूम बनवाना शुभ होता है। यहाँ शयनकक्ष भी बनाना शुभ होता है।  वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा के अनुभव के अनुसार इस दिशा में बच्चों के लिए उनके पढ़ने का कमरा बनवाना उत्तम होता है क्यों की शनि ग्रह किसी भी विषय की गहराई में जाने की शक्ति प्रदान करते हैं सो यहाँ बच्चों में गंभीरता आती हैं और वह बुद्धिजीवी होते हैं। 

यह दिशा जल के देवता वरुण की है इसलिए यहाँ रसोईघर अच्छा नहीं माना गया है। रसोई में अग्नि की प्रधानता होती है और अग्नि एवं जल आपस में शत्रु होते हैं। वैसे इसके अलावां इस दिशा में लगभग सभी निर्माण किये जा सकते हैं।

।। इति शुभम् ।।


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गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen

 वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें ?


फैक्ट्री निर्माण में वास्तु सिद्धांतों व उनके सूत्रों का पालन करना चाहिए जिससे उस स्थान पे पंच तत्वों का ठीक से समन्वय हो और उस फैक्ट्री में जिस भी किसी चीज का निर्माण हो रहा है वह सही तथा फिट हो और जब वह वहां से निर्मित होकर बाजार में पहुंचे तो अपनी गुणवत्ता से उपभोक्ताओं का दिल जीत सके जिससे मालिक को उसका अच्छा मूल्य प्राप्त हो और वह लाभवन्तित हो सके।

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen


पाठकों मै वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा अपने अनेकों फैक्ट्री के वास्तु विजिट में पाया है की उस फैक्ट्री में अच्छी गुणवत्ता वाले तैयार सामान के आर्डर बिलकुल न के बराबर होते हैं, जिसका मुख्य कारण होता है वहां तैयार माल का गलत जोंन में रखा होना। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर फैक्ट्री ही सभी व्यवसाय का आधार होती है, जिनसे मालिक के साथ-साथ मैनेजमेंट टीम, तकनीशियन, लेबर, ट्रांसपोर्ट आदि सीधे जुड़े होते हैं और कंपनी में निर्माण होने वाली वस्तु और उसके लाभ से प्रभावित होते हैं। अब अगर फैक्ट्री में तैयार माल मार्किट में जायेगा ही नहीं अर्थात उस माल का आर्डर ही नहीं आयेगा तो फैक्ट्री मालिक के साथ-साथ फैक्ट्री से जुडा हर व्यक्ति इससे प्रभावित होगा, तो आइये जानते हैं कि इसके लिए फैक्ट्री का कौन सा जोंन वास्तु अनुसार अच्छा माना गया है।


चाहे किसी भी चीज का फैक्ट्री में निर्माण होता हो वहां तैयार सामान (finished goods) को हमेसा वायव्य कोण ( north weast) में रखना चाहिए। यह दिशा वायु प्रधान होने से वहां रखे तैयार सामान को जल्दी से जल्दी बिकने में सहायता करेगी अर्थात उस सामान का आर्डर डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से जल्दी आयेगा। वायव्य कोण चन्द्रमा की दिशा है और चंद्रमा का स्वभाव चंचलता भरा होता है उसकी इसी चंचलता के फल स्वरूप तैयार माल वहां टिककर रहता नहीं बल्कि वायु के वेग से अपने सही स्थान (मार्किट और ग्राहक) तक पहुंच जाता है, और नए आर्डर का श्रोत निरंतर खुला रहता है। अगर गलती से भी तैयार माल नैरित्य कोण अर्थात पृथ्वी दिशा में रखा गया है तो वह स्टेबल जोंन में आ जायेगा जिससे उसका आर्डर बिलकुल न के बराबर ही रहेगा, तथा मिला हुआ आर्डर भी बार-बार कैंसिल होने की सम्भावना बनेगी अतः फैक्ट्री मालिक को फैक्ट्री का निर्माण करते समय अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

अगर पहले से ही फैक्ट्री  स्थापित है जिसमे इस तरह की अथवा अन्य अनचाही अड़चने आ रही हैं तो मित्रों मैं आप का अपना /वास्तु सलाहकार/ पं. उदयप्रकाश शर्मा आप से इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने किस्मत को कोसने के बजाय हमे यह समझना चाहिए कि इस युग में मृत्यु को छोड़कर हर समस्या का समाधान होता है, बात है जागरूकता की। मैंने अपने वर्षों के अनुभव में छोटे बड़े कई उद्योगों का सफलता पूर्वक उपचार किया है जिससे बड़े अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं। 

आज विज्ञान का युग हैं। आज आधुनिक रूप से आधुनिक यंत्रो द्वारा सटीक रूप से Positive - Negative ऊर्जाओं का सोधन कर पाना संभव हुआ है अगर संबंधित स्थान पे नकारात्मक ऊर्जा है अथवा ऊर्जा का अभाव है अर्थात वहां शून्य ऊर्जा है तो वहां प्राण ऊर्जा का सामंजस्य स्थापित करने हेतु धरती के चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरी ध्रुव- दक्षिणी ध्रुव व अंतरिक्ष की शुभ ऊर्जाओं को आकर्षित करना पड़ता है जिसके लिए आवस्यकता अनुसार वैज्ञानिक यंत्र, पिरामिड, ऊर्जा प्लेट, क्रिस्टल एवं रत्न-उपरत्नों के कोणीय प्रभाव, तथा धातुवों से बनी विभिन्न कोणीय आकृतियों का प्रयोग करना होता है। कोई नकारात्मक दोष वहां पर है तो पूजा-हवन भी करवाना पड़ता है I अतः आप के औद्योगिक परिसर में फैक्ट्री-कारखाने में कोई वास्तु दोष हो तो निःसंकोच आप को किसी कुशल वास्तुशास्त्री से संपर्क कर उनसे परामर्श लेना चाहिए और संबंधित स्थान का पूरे वैज्ञानिक विधि से जांच करवानी चाहिए मित्रों अगर वहां ऐसा कुछ भी हो जिससे अनचाही पीड़ा और उद्योग में असफलता मिल रही हो तो अपने इष्टदेव को प्रणाम कर उनसे आज्ञा ले उस समस्या का उचित उपाय करवाना चाहिए। और अपने औद्योगिक विकाश को गति देनी चाहिए।

।। इति शुभम् ।।

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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

purv disha vastu shastra । पूर्व दिशा वास्तु शास्त्र

 purv disha vastu shastra । पूर्व दिशा वास्तु शास्त्र 

पूर्व दिशा के स्वामी ग्रह सूर्य हैं तथा देवता इंद्र हैं। यह दिशा अग्नि तत्व को प्रभावित करती है। 

purva disha ka prabahv vastu I purva disha in hindi



हमारे शास्त्रों में सूर्य को जीवन का आधार माना गया है अर्थात सूर्य ही जीवन है। जिसकी वजह से वास्तुशास्त्र में इस दिशा को हमारी पुष्टि एवं मान-सम्मान की दिशा कहा गया है। सूर्य के आभाव में सृष्टि में न जीवन की कल्पना की जा सकती है और ना ही किसी प्रकार की वनस्पति उत्पन्न हो सकती है। इस लिए भवन निर्माण में पूर्व दिशा में निर्मित किए जाने वाले निर्माणों के बारे में निर्माणकर्ता को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। 

पूर्व दिशा में ऊँचे और भारी निर्माण को शुभ नहीं कहा जा सकता। संभवत इसीलिए कि उचें निर्माण से प्रातः कालीन सूर्य किरणे भवन पे नहीं पहुंच पाती इसलिए ऐसे भवन में निवास करने से भिन्न-भिन्न प्रकार की व्याधियां उत्पन्न हो जाती है। ऐसे भवन में निवास करने वाले मनुष्य के मान सम्मान की हानि होती है। उस पर ऋण का बोझ बढ़ता है। पित्रदोष लगता है । घर में मांगलिक कार्यों में बाधाएं उत्पन्न होती हैं। यहां तक कि इस प्रकार का गृह निर्माण करने से घर के मुखिया को मृत्युतुल्य कष्ट एवं व्याधियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।अतः गृहनिर्माण में पूर्व इस दिशा में ज्यादा से ज्यादा खुला स्थान रखने का प्रावधान गृहस्वामी को करना चाहिए। इस दिशा की तरफ पूजन कक्ष, बैठक, बाथरूम आदि बनवाये जा सकते हैं। इस दिशा में खिड़कियां तथा दरवाजे रखना बहोत शुभ हैं और जगह होने की स्थिति में दरवाजे के बहार छोटा सा ही सही लॉन अवश्य बनाना चाहिए।

।। इति शुभम ।।

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