ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers

सोमवार, 4 मई 2026

Vastushastra aur Surya ka Sambandh वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?

वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?


 हर दिन सूर्य आपके घर से दिखता है सवाल ये है कि क्या वो आपके घर या जीवन में प्रवेश कर पा रहा है? 

vastu me surya ka mahatva


आइए जानते हैं.. 
जब हम किसी घर या प्लॉट को केवल ईंट-पत्थर का ढांचा मानते हैं, तब हम उसकी वास्तविक शक्ति को नजर अंदाज कर देते हैं। वास्तव में, घर एक जीवंत ऊर्जा का केंद्र होता है और इस ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य का दैनिक भ्रमण हि है। वास्तुशास्त्र इसी प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह को समझकर जीवन को संतुलित करने की एक गहन प्रणाली प्रस्तुत करता है। यदि एक प्लॉट को केंद्र में रखा जाए और उसमें रहने वाले व्यक्ति की ऊर्जा लगभग (उदाहरण- के लिए मान लें तो) 6.300 हर्ट्ज मानी जाए, तो सूर्य की दिनभर की गति केवल आकाशीय परिवर्तन नहीं बल्कि ऊर्जा के क्रमिक उतार-चढ़ाव का एक वैज्ञानिक आधार बन जाती है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पूर्व दिशा (East) मे होता है

प्रातःकाल जब सूर्य पूर्व (East) दिशा में उदित होता है, उस समय उसकी ऊर्जा लगभग 4.100 हर्ट्ज होती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से कम होती है। यही कारण है कि सुबह 6 am से 8 am के बीच सूर्य की किरणें कोमल, शांत और जीवनदायिनी प्रतीत होती हैं। इस समय व्यक्ति सूर्य को खुली आंखों से देख सकता है और उसकी ऊर्जा को सहज रूप से अनुभव कर सकता है। यह काल मानसिक शुद्धि, ध्यान और प्राणायाम के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वास्तुशास्त्र में भी पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि यह सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रमुख द्वार है। इसी लिए वास्तु में पूर्व दिशा को हल्का, साफ-सुथरा और मुख्य द्वार बहुत शुभ माना गया है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य अग्नि कोण (S/E) मे होता है

आगे जैसे-जैसे सूर्य पूर्व से दक्षिण-पूर्व (S/E) अर्थात अग्नि कोण की ओर बढ़ता है, उसकी ऊर्जा में वृद्धि होने लगती है और वह अल्ट्रावायलेट किरणों के रूप में परिवर्तित होकर लगभग 6.300 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है , जो मनुष्य की ऊर्जा के समांतर हो जाती है। यह समय 9 am से 11 am तक का होता है, इसी समय में व्यक्ति पूरी तरह सक्रिय, चुस्त-दुरुस्त, ताजगी से भरपूर होकर हर कार्य के लिए तैयार रहता है। सामान्यतः लोग इस समय में अपने दैनिक कार्यों की शुरुआत करते हैं, अपने ऑफिस अथवा व्यापार के लिए निकलते हैं, और जीवन में उत्साह तथा उत्पादकता का अनुभव करते हैं। वास्तु के अनुसार अग्नि कोण को ऊर्जा और क्रियाशीलता का क्षेत्र माना गया है, इसलिए इस दिशा में रसोई या अग्नि से संबंधित कार्यों का स्थान होना शुभ माना जाता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य दक्षिण दिशा (South) मे होता है

दोपहर के समय 12 से 2 pm के बीच जब सूर्य दक्षिण दिशा में पहुंचता है, तब उसकी ऊर्जा अपने चरम पर होती है और लगभग 7.100 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से बहुत अधिक होती है। यह अवस्था सूर्य के प्रचंड और प्रभावशाली रूप को दर्शाती है, और यह आसमान में एकदम से हमारे सर के ऊपर होता है, इसे हम एक पिता के समान गरिमापूर्ण, अनुशासनात्मक और प्रभाव शक्ति का प्रतीक मान सकते है। विशेषकर गर्मियों में इस तीव्र ऊर्जा के कारण लोग प्रचंड धूप से बचने का प्रयास करते है और अधिकतर समय घर के भीतर या छाँव मे रहना पसंद करते हैं। वास्तु के अनुसार शायद इसलिए ही दक्षिण दिशा को स्थिर और भारी और ऊंचा रखने के लिए कहा गया है, और दक्षिण दिशा मे ऊंचे पेड़ लगाने की बात वास्तु मे की जाती है, जिससे घर में सूर्य की इस प्रबल ऊर्जा को संतुलित किया जा सके।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य नैऋत्य दिशा (S/W) मे होता है

इसके पश्चात सूर्य 3 pm से 5 pm के मध्य, धीरे-धीरे नैऋत्य दिशा S/W, की ओर अग्रसर होता है, जहां उसकी ऊर्जा इन्फ्रारेड किरणों में परिवर्तित हो जाती है। जहां ताप वैसे ही रहता है पर प्रकाश धीरे धीरे कम हो रहा होता है, इस अवस्था में ऊर्जा की तीव्रता कम होकर स्थिरता की ओर बढ़ती है और इसका प्रभाव व्यक्ति के शरीर और मन पर थकान के रूप में दिखाई देता है। यह वही समय होता है जब व्यक्ति अपने दिनभर के कार्यों से निवृत्त होकर घर लौटने की तरफ और विश्राम की ओर अग्रसर होता है। वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को स्थिरता, सुरक्षा और नियंत्रण का स्थान माना गया है, इसलिए यहां मास्टर बेडरूम का होना उपयुक्त समझा जाता है। इस दिशा को जितना अधिक भारी और ऊंचा किया जाता है, घर या अन्य निर्माण इस प्रकार की व्यवस्था की वजह से बहुत लाभ प्राप्त करता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पश्चिम दिशा (West) मे होता है

अब जब 6 बजे के आस-पास सूर्यास्त हो जाता है ( गर्मियों को छोड़कर क्योंकि अक्सर गर्मियों में सात या साढ़ेसात बजे तक सूर्यास्त होता है ) सो 7/8 बजे के बाद रात्रि होते ही धरती पर चंद्रमा की ऊर्जा सक्रिय हो जाती है, जो शीतल और शांत होती है, यह ऊर्जा मन और तन की शक्ति को पुनर्जीवित करने वाली होती है। अतः रात्रि में शयन के पश्चात यह शरीर और मन को पुनः संतुलित करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे व्यक्ति अगले दिन सुबह फिर से ऊर्जावान होकर अपने कार्य-व्यापार में नई ताजगी के साथ पुनः प्रवेश करने के लिए तैयार हो सके। वास्तु के अनुसार शयनकक्ष की सही दिशा और व्यवस्था इस प्राकृतिक ऊर्जा को प्रभावी ढंग से ग्रहण करने में सहायक होती है।

इस प्रकार सूर्य का दैनिक भ्रमण यह स्पष्ट करता है कि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं बल्कि ऊर्जा के संतुलन का विज्ञान है। जब घर या प्लॉट को इस प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुरूप बनाया जाता है, तब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बना रहता है। यही वास्तु का मूल सिद्धांत है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके जीवन को अधिक संतुलित, स्वस्थ और समृद्ध बनाया जा सकता है।

प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ यह दिखाता है कि किस प्रकार सूर्य अपने भ्रमण पथ से पृथ्वी पर अपना असर डालता है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।

प्रिय मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।  

मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो। 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

vastu me disha aur tatav kaise mile वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है

 

वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है… क्या ये आस्था है या pure science?”


आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में पाँच तत्वों का  किसी एक दिशा से हि संबंध क्यों और कैसे बना?  वास्तु के पीछे का वैज्ञानिक कारण। 

How were the elements and directions determined in Vastu?


वास्तुशास्त्र में पाँच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का निर्धारण किसी धार्मिक आस्था या कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति में उपस्थित ऊर्जा के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित एक व्यवस्थित सिद्धांत है। हमारे प्राचीन भारतीय वास्तु आचार्यों ने सबसे पहले यह जानने और समझने का प्रयास किया कि पृथ्वी पर ऊर्जा कैसे प्रवाहित होती है, किस दिशा में उसका स्वरूप कैसा होता है, और वह मानव जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती है, उन्होंने देखा कहीं ऊर्जा हल्की, शुद्ध और गतिशील है, कहीं भारी, स्थिर और संचित है, कहीं ताप (heat) अधिक है, कहीं वायु (motion) अधिक है, अतः उन्होंने इन्ही प्राकृतिक ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को पाँच मूल गुणों को पाँच तत्व के रूप मे अलग अलग दिशा मे स्थान दिया। 


वास्तुशास्त्र के अनुसार यह सभी पाँच तत्व किसी ठोस पदार्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे ऊर्जा के पाँच अलग-अलग रूप या गुण हैं। जल का अर्थ केवल पानी नहीं, बल्कि प्रवाह शुद्धता और संवेदना है, अग्नि का अर्थ केवल आग नहीं, बल्कि परिवर्तन और सक्रियता है, पृथ्वी स्थिरता और भार का प्रतीक है; वायु गति और परिवर्तनशीलता को दर्शाती है, और आकाश वह माध्यम है जिसमें यह सब घटित होता है। इस प्रकार पंचतत्व वास्तव में ऊर्जा के पाँच आयाम हैं, जिन्हें दिशाओं के अनुसार स्थान दिया गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पहला आधार

five elements in vastu with directions


इसका व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहला आधार सूर्य की गति है। हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है और उसकी किरणें दिनभर अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग कोण और तीव्रता के साथ पृथ्वी पर पहुँचती हैं। सूर्य पूर्व से उदय होकर दक्षिण की ओर झुकते हुए पश्चिम में अस्त होता है। सुबह के समय उत्तर-पूर्व दिशा में आने वाली किरणें अपेक्षाकृत कोमल, शुद्ध और कम ताप वाली होती हैं, जबकि दिन चढ़ने के साथ दक्षिण-पूर्व दिशा में सूर्य की किरणें अधिक तीव्र और ऊष्मा से भरपूर हो जाती हैं। दोपहर के बाद दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में ताप अधिक स्थिर और भारी हो जाता है, और शाम तक उत्तर-पश्चिम दिशा में ताप घटने लगता है तथा वायु की गति बढ़ जाती है। इस प्रकार दिनभर में ऊर्जा का एक निश्चित पैटर्न बनता है, जिसे ध्यान में रखकर तत्वों का निर्धारण किया गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का दूसरा आधार

अब इसका दूसरा आधार देखें तो वह पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र है। पृथ्वी के भीतर एक प्राकृतिक चुंबकीय प्रवाह होता है जो सामान्यतः उत्तर से दक्षिण की ओर चलता है। यह प्रवाह सूक्ष्म ऊर्जा स्तर पर प्रभाव डालता है और जीवित प्राणियों के जैविक तंत्र को भी प्रभावित करता है। जैसे पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी हुई है तो पृथ्वी के ऊपर का भाग उत्तर/पूर्व का का स्थान हुआ अतः ब्रह्मांड की सभी ऊर्जा, बारिश, ओस सब इसी दिशा से पृथ्वी पर प्रवेश करती है,जिसकी वजह से यहाँ हल्कापन और संवेदनशीलता अधिक होती है, और जहाँ यह स्थिर होती है अर्थात नीचे का दक्षिण/पश्चिम का भाग वहाँ भारीपन और स्थायित्व अधिक होता है। जैसे बारिश का पानी भी नीचे गहराई मे जाकर स्थिर होता है अतः इसी कारण से दिशाओं में ऊर्जा के अलग-अलग गुणों को पहचाना गया और उन्हें पंचतत्वों से जोड़ा गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का तीसरा आधार

तीसरा आधार वायु का प्रवाह और दाब का अंतर है। हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है और इसका संबंध तापमान से सीधा होता है। जहाँ ताप अधिक होता है वहाँ हवा ऊपर उठती है और निम्न दाब बनता है, जबकि ठंडे क्षेत्रों में हवा अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। पृथ्वी के भौगोलिक संदर्भ में सामान्यतः वायु का प्रवाह उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर देखा गया है। इस प्रवाह ने यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि किस दिशा में गतिशीलता अधिक है और किस दिशा में स्थिरता। इसे अगर आम बोलचाल की भाषा मे समझें तो?- जैसे हमारी पृथ्वी लट्टू की तरह पश्चिम से पूर्व की तरफ घूम रही है, क्यूँ की पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी है ती उसके झुकाव से उसका नीचे का स्थान दक्षिण-पश्चिम, S/W के तरफ चला गया और ऊपर का भाग उत्तर-पूर्व, N/E की तरफ, जैसे हम किसी कार या वाहन को पश्चिम से पूर्व की तरफ गति देते हैं तो वायु हमे सामने वाहन की खिड़कियों से आती हुई प्रतीत होगी इसी तरह से उत्तर-पश्चिम, N/W मे वायु का स्थान कहा गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का चौथा आधार

चौथा और बहुत ही महत्वपूर्ण है थर्मो डायनामिक्स आधार अर्थात ताप का व्यवहार। हम सभी जानते हैं कि सूर्य से मिलने वाली ऊष्मा हर दिशा में समान नहीं होती, बल्कि यह दिन के समय और दिशा के अनुसार बदलती रहती है। उत्तर-पूर्व, N/E क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा और शुद्ध रहता है, सूर्य के यहाँ से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य के रश्मि प्रभाव को हम अल्ट्रा वायलेट ऊर्जा के रूप मे पहचानते हैं, दक्षिण-पूर्व, S/E क्षेत्र में सूर्य का ताप बढ़ने लगता है, साधारण भाषा मे समझें तो जब पृथ्वी N/E मे झुकी हुई है तो उसकी पीठ सूर्य राशमियों के ठीक सामने आ जाती है जिसकी वजह से S/E सबसे तप्त स्थान हो जाता है, जिसकी वजह से आचार्यों ने इस स्थान को ही अग्नि कोण कहा है, अब दक्षिण दिशा से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य की यही ऊर्जा इन्फ्रारेड मे बदल जाती है, अब सूर्य दक्षिण-पश्चिम, S/W में अधिकतम स्थिर और भारी रूप ले लेता है, और उत्तर-पश्चिम में यह धीरे-धीरे कम होता हुआ गतिशील वायु में परिवर्तित हो जाता है। अग्नि का वास्तविक अर्थ केवल ज्वाला नहीं, बल्कि परिवर्तन की ऊर्जा है—वह शक्ति जो किसी पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलती है। इस तापीय क्रम ने भी पंचतत्वों के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके अतिरिक्त ऊर्जा प्रवाह के क्रम को भी समझना आवश्यक है। वास्तु में ऊर्जा का एक चक्र माना गया है जिसमें उत्तर-पूर्व से ऊर्जा का प्रवेश होता है, दक्षिण-पूर्व में वह सक्रिय और परिवर्तित होती है, दक्षिण-पश्चिम में स्थिर होकर संचित होती है, और उत्तर-पश्चिम में गति प्राप्त करके बाहर की ओर प्रवाहित होती है। इस क्रम में दक्षिण-पूर्व की भूमिका एक “एक्टिवेशन पॉइंट” की होती है, जहाँ निष्क्रिय ऊर्जा सक्रिय रूप लेती है। यही वैज्ञानिक तर्क अग्नि तत्व को इस दिशा में स्थापित करता है।

five elements vastu zones and colors


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पाँचवाँ आधार

जिसमे अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी यह 4 तत्व स्थित हैं वह है आकाश तत्व, आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे सूक्ष्म और व्यापक माना जाता है। जहाँ पृथ्वी स्थिरता देती है, जल प्रवाह देता है, अग्नि ऊर्जा देती है, वायु गति देती है—वहीं आकाश तत्व इन सबका का आधार तत्व है, आकाश तत्व वह खाली स्थान है जो इन सबको धारण करता है। आकाश का अर्थ है खुलापन, शून्यता और विस्तार। वास्तुशस्त्र के अनुसार यह सिर्फ “खाली जगह” नहीं बल्कि ऊर्जा के प्रवाह का माध्यम है। यह ध्वनि (sound) का वाहक है, सभी दिशाओं को जोड़ने वाला ब्रह्म तत्व है, आकाश तत्व सकारात्मक ऊर्जा को फैलाने का काम करता है, प्रथम चारों तत्व की एक सीमा निर्धारित है पर यह आकाश तत्व हर सीमा से परे है, यह ननंत है ना इसका कोई ओर-छोर है ना कोई बाउंड्री है। वस्तुशास्त्र मे आकाश तत्व को  मध्य स्थान, ऊर्ध्व  स्थान, मुख्य स्थान (ब्रह्म स्थान) कि दिशा मे कहा गया है।आकाश तत्व दिखता नहीं, लेकिन पूरे घर/संसार की ऊर्जा उसी पर आधारित होती है।

अंततः हमने जाना की वास्तुशास्त्र में पंचतत्वों का निर्धारण एक समग्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसमें सूर्य की गति, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, वायु का प्रवाह, तापमान का वितरण और मानव शरीर की जैविक प्रतिक्रिया—इन सभी को एक साथ समझकर दिशाओं में ऊर्जा के गुण निर्धारित किए गए हैं। यह व्यवस्था इस बात को दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि प्रकृति के गहन अवलोकन और वैज्ञानिक समझ पर आधारित एक सुव्यवस्थित प्रणाली भी था। कितने महान थे हमारे पूर्वज आचार्य, ऋषि-मुनि जिन्होंने बिना किसी उन्नत दूरबीन, आधुनिक सेटेलाइट और सटीक उपकरण के ऊर्जातत्व के इन क्रमों को समझकर उन्हे सटीक रूप से दिशा अनुरूप वितरण कर के हमे दिशा प्रदान किया।


मित्रों यह निरंतर अध्ययन, अध्यापन और कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु और तत्वों को लेकर संसार मे बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । आप ने इस लेख को ध्यान से पढ़ा इसके लिए धन्यवाद। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

vastu ka dar वास्तु का डर या समाधान??

 

क्या आपका वास्तु शास्त्री आपको 'समाधान' दे रहा है या 'मौत' का डर??


“वास्तु के नाम पर समाधान मिल रहा है… या डर बेचकर खेल खेला जा रहा है?”

vastu ka dar 

सोशल मीडिया के 'रील-गुरुओं" द्वारा वास्तुशास्त्र जैसा महान ज्ञान आज मजाक बनकर रह गया है।​आजकल वास्तु शास्त्र का अर्थ 'सुख-शांति' नहीं, बल्कि 'खौफ' बन गया है। आप सोशल मीडिया Reels. shorts स्क्रॉल करते हैं, और अचानक एक 'रिल गुरु' प्रकट होकर चीखता है अगर यहाँ टायलेट है तो कैंसर हो जाएगा। कोने का मकान है तो 3 साल में मौत हो जाएगी। लाल रंग यहाँ है तो पैसा आना बंद हो जाएगा। साउथ वेस्ट में छत पर पानी की टंकी है तो हार्टअटैक आ जाएगा!"

आप ठहरिए! और गहरी सांस लीजिए। यह वास्तु शास्त्र नहीं है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी" है, जिसका मकसद आपकी जेब काटना है। अतः आप सब खुद इस हकीकत को तर्क Logic की कसौटी पर परखें। लकीर का फकीर होना ठीक नहीं है।

क्या वास्तु के नाम पर मेडिकली डराने का खेल नहीं है, हम सभी जानते हैं कि इंसान सबसे ज्यादा अपनी और परिवार की सेहत से डरता है कि उसे कोई भयानक रोग न लग जाए। इसीलिए ये वास्तु के नियमों को बीमारिओं से जोड़ देते हैं। ​कहीं कैंसर का डर, तो कहीं हार्ट अटैक की भविष्यवाणी। ​कहीं किडनी फेल होने की चेतावनी, तो कहीं एक्सीडेंट का खौफ।

सच्चाई यह है कि घर की दिशाओं में कुछ बदलाव करने से कैंसर ठीक नहीं होता और न ही केवल एक टॉयलेट की वजह से किसी को हार्ट अटैक आता है। यह "नीम-हकीम खतरा-ए-जान" वाली बात है। इनका मकसद आपको डिप्रेशन में डालना है ताकि आप घबराहट में इनके महंगे और बेतुके उपाय (Remedies) खरीद लें।

वास्तु मे सबसे बड़ा झूठ 

सबसे बड़ा गप्प तो 'कोने का मकान' और 'मौत' का झूठ है, आजकल बहुत से "रिल गुरु" हर दूसरी वीडियो में दावा करते है— "कोने अर्थात कॉर्नर के मकान में रहने वाले की 3 साल में मृत्यु निश्चित है।" आप खुद सोचिए अगर कोने का मकान वाकई 'काल' होता, तो संसार के हर गली मुहल्ले में कॉर्नर के मकान होते हैं और उनमें हजारों लोग सुख से रह रहे हैं, और यह तथाकथित बहुत से वास्तुविद/"रिल गुरु" कॉर्नर के मकान के नाम पर आपको अपना घर बेचने या तुड़वाने पर मजबूर करते है। यह 3 दिनों का वास्तु कोर्स कर के तोते की तरह यही सब रटा-रटाया झूठ बोलते रहते हैं।

घर को 'कबाड़' बनाने का षड्यंत्र- ​ये लोग आपके सुंदर घर को ब्रास की मूर्तियां, तांबे की तारों, रंग-बिरंगी टेप, चमकीली रेडियम की पट्टियों से भर देते हैं। ​उत्तर और पूर्व North/East जैसी पवित्र दिशाओं में ये तांबे की तार और कीलें ठोक देते हैं, जिससे घर के ईशान्य दिशा से सकारात्मक (Positve Enaergy) ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है। ​जो घर आपको सुकून देने के लिए था, उसे ये 'डर का म्यूजियम' बना देते हैं पढ़े-लिखे लोग भी इनकी चकाचौंध एडिटिंग, डायलॉग और आत्मविश्वास देखकर भ्रमित हो जाते हैं और अपने हाथों अपने घर का वास्तु खराब कर लेते हैं।
​जागो और इनसे तर्क करो, हर बात को सर हिलाकर मानना बंद करो, किसी भी रेमेडी अथवा उपाय का तार्किक कारण पूछो।

वास्तु का अनुभव 

अतः अपने लंबे वास्तु अनुभवों के आधार पर मैं वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा आप से यही कहना चाहूंगा कि वास्तुशस्त्र जीवन को बेहतर बनाने का विज्ञान है, डराने का नहीं। वास्तु दोष है, तो उसका तार्किक समाधान भी होता है, न कि कैंसर या हार्ट अटैक की धमकी। ​रील्स Reels देखकर खुद से वास्तु समाधान करना बंद करें, कोई भी वास्तु रेमेडी यूं ही खरीदकर घर न लाएं। 

अगर सचमुच घर या कार्यालय में कुछ वास्तु समस्याएं हैं तो किसी योग्य वास्तुशास्त्री से संपर्क करें, इन "रिल गुरुओं" की 60 सेकंड की वास्तु वीडियो देखकर अपने घर में तोड़-फोड़ न करें। ​अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करें। ऐसे 'डर के सौदागरों' को अपने जीवन और सोशल मीडिया से आज ही ब्लॉक करें। इनसे फ्री के सवाल करना बंद करें, यह आप का समाधान तो क्या करेंगे, उल्टा आप को और भयभीत कर देंगे। आप अपने नजदीकी अपने क्षेत्र/सिटी के किसी जानकार वास्तुविद को अपने घर वास्तु विज़िट के लिए आमंत्रित करें, अपने घर का वास्तु निरीक्षण कराएं, और उनके बताए उपाय को अजमाएं आप अवश्य लाभवन्तित होंगे। फ्री की चीजें हमेशा दुख देती हैं। 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

vastu for floor level वास्तु के अनुसार घर का फ्लोर लेबल कैसा हो??

 वास्तु के अनुसार घर का फ्लोर लेबल कैसा हो??


"वास्तु में सही ढाल और ऊंचा नैऋत्य—यही है स्थायी सफलता का असली वास्तु रहस्य"


vastu for floor level


अगर आपके घर का नैऋत्य ऊँचा नहीं है और फ्लोर का ढाल सही दिशा में नहीं है, तो समझिए आप खूब मेहनत कर रहे हैं… लेकिन स्थिरता कभी टिकती नहीं, और सफलता बार-बार फिसल जाती है।”

वास्तु मे ऊंची नैऋत्य दिशा 

मित्रों वास्तु शास्त्र में दिशाओं का संतुलन केवल भौतिक संरचना का विषय नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा प्रवाह, स्थिरता और जीवन के विभिन्न आयामों पर गहरा प्रभाव डालता है। विशेष रूप से नैऋत्य दिशा (South-West) को स्थायित्व, नियंत्रण और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। किसी भी भवन या प्लॉट में इस दिशा का ऊँचा होना और फ्लोर का ढाल सही दिशा में होना अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे एक वास्तु कंसल्टेंट के रूप में निरंतर कार्य कर के समझा है।

नैऋत्य दिशा को पंचतत्वों में पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधि माना गया है। पृथ्वी का स्वभाव स्थिर और भारी होता है, इसलिए इस दिशा का ऊँचा और भारयुक्त होना आवश्यक माना गया है। जब घर या प्लॉट का नैऋत्य भाग अन्य दिशाओं की तुलना में ऊँचा होता है, तो यह जीवन में स्थायित्व, आर्थिक मजबूती, बेहतर रिश्ते और निर्णय क्षमता को बढ़ाता है। परिवार के मुखिया का नियंत्रण मजबूत रहता है और घर में अनुशासन तथा संतुलन बना रहता है। 

इसके विपरीत यदि यह दिशा नीची हो जाए, तो जीवन में अस्थिरता, आर्थिक नुकसान और मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भले ही घर किसी भी दिशा का क्यों न हो, उसे इस प्रकार डिजाइन करवाएं कि पूरा मकान ही दक्षिण और पश्चिम दिशा में ऊंचा रहे और उत्तर और पूर्व में नीचा हो। आप के घर का पचास पर्सेंट वास्तु तो सिर्फ इस व्यवस्था से अच्छा हो जाएगा।

South/West नैऋत्य ऊंचा होने का लाभ 

नैऋत्य दिशा के ऊँचे होने का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि यह नकारात्मक ऊर्जा को रोकने का कार्य करती है। यह दिशा एक तरह से सुरक्षा कवच का काम करती है, जो बाहरी बाधाओं और अनचाही ऊर्जा को घर में प्रवेश करने से रोकती है। यही कारण है कि वास्तु शास्त्र में इस दिशा में भारी निर्माण जैसे मास्टर बेडरूम, तिजोरी कक्ष या स्टोर रूम रखने की सलाह दी जाती है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचय होता है और घर में दीर्घकालिक सुख-समृद्धि बनी रहती है।

अब यदि हम फ्लोर के ढाल (slope) की बात करें, तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण विषय है। वास्तु के अनुसार, घर का ढाल हमेशा नैऋत्य से ईशान (North-East) की ओर होना चाहिए। अर्थात दक्षिण-पश्चिम हिस्सा सबसे ऊँचा और उत्तर-पूर्व हिस्सा सबसे नीचा होना चाहिए। यह ढाल ऊर्जा के प्राकृतिक प्रवाह को सुनिश्चित करता है। ईशान दिशा को देव स्थान माना गया है, जहां से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। जब ढाल इस दिशा में होता है, तो ऊर्जा का प्रवाह सहज और संतुलित बना रहता है।

वास्तु मे फर्श का ढाल गलत होने पर 

यदि घर का ढाल इसके विपरीत हो, यानी ईशान से नैऋत्य की ओर, तो यह अत्यंत दोषपूर्ण स्थिति मानी जाती है। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचय होने लगता है, जिससे स्वास्थ्य, संबंध और वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसलिए निर्माण के समय ही इस सिद्धांत का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

फ्लोर ढाल का प्रभाव केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल निकास (drainage) और साफ-सफाई से भी जुड़ा हुआ है। सही ढाल होने से पानी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ईशान दिशा की ओर होता है, जिससे घर में नमी और गंदगी का जमाव नहीं होता। यह स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी है और भवन की दीर्घायु को बढ़ाता है।

मित्रों मै आप का अपना वास्तु कंसल्टेंट आचार्य उदय प्रकाश शर्मा अबतक के अपने निरंतर कार्य अनुभव से यही जान पाया हूं कि एक वास्तुशास्त्री के लिए केवल दिशा का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि हर तत्व के पीछे छिपे ऊर्जा सिद्धांत और उनके व्यावहारिक प्रभाव को भी स्पष्ट रूप से समझना बहुत आवश्यक है। नैऋत्य दिशा का ऊँचा होना और फ्लोर का सही ढाल न केवल वास्तु के मूल सिद्धांत हैं, बल्कि यह जीवन में संतुलन, सुरक्षा और समृद्धि के आधार स्तंभ भी हैं।

अंततः वास्तु शास्त्र और वास्तुशास्त्री का उद्देश्य केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि भवन निर्माण की दिशा में एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां ऊर्जा संतुलित हो, जीवन सुचारु रूप से चले और व्यक्ति मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक रूप से समृद्ध हो। हम यदि वास्तु के इन सरल और प्रभावशाली सिद्धांतों को सही ढंग से अपनायें तो कोई भी घर केवल एक निर्माण हुआ घर नहीं रहता, बल्कि एक सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। जिसमें हम अपने प्रियजनों के साथ खुशहाल जीवन बिता सकते हैं।

इस पोस्ट में संलग्न चित्र एक प्रतीकात्मक रूप है, जो सिर्फ यह दिखाता है कि किस तरफ से किस तरफ का फ्लोर लेबल का ढाल/स्लोप होना चाहिए, इसे सिर्फ सरल रूप से समझने के लिए प्रयोग करें।
नोट :- किसी भी घर का फ्लोर लेबल उपरोक्त चित्र की भांति/सीढ़ीनुमा नहीं होता

मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । आप ने इस लेख को ध्यान से पढ़ा इसके लिए धन्यवाद। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

vastu me gadda kahan hona chahiye

vastu me gadda kahan hona chahiye 


“सिर्फ एक गलत गड्ढा, और पूरा वास्तु बिगड़ सकता है!”

वास्तु शास्त्र में प्लॉट के भीतर बनाए जाने वाले गड्ढों का सीधा संबंध ऊर्जा के प्रवाह से होता है। चाहे वह पानी के लिए बनाया गया हो या अपशिष्ट (सेफ्टिक टैक), के लिए हो, इसलिए निर्माण के समय उसकी सही दिशा का चयन अत्यंत आवश्यक है।


यदि यह स्थान गलत हो जाए, तो इसका प्रभाव घर के आर्थिक, मानसिक और शारीरिक पक्ष पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “गड्ढा छोटा होता है, लेकिन उसका असर बहुत बड़ा होता है।”

वास्तु के अनुसार प्लॉट मे अंडर ग्राउंड वाटर टैंक, बोरिंग, कुआं, तहखाना, के लिए गड्ढा कहाँ हों?? 


वास्तु सिद्धांतों के अनुसार ईशान कोण, अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा (North/East) जल तत्व का स्थान माना गया है। इस दिशा में केवल जल से संबंधित गड्ढे जैसे बोरिंग, कुआँ, अंडरग्राउंड वाटर टैंक आदि बनाए जाने चाहिए। इस स्थान पर जल स्रोत होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और समृद्धि का संचार होता है। इस क्षेत्र को जितना अधिक स्वच्छ और हल्का रखा जाए, उतना ही बेहतर परिणाम प्राप्त होता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि N/E से एक सीधी रेखा S/W को खींची जाए तो यह अति मर्म स्थान होगा अतः इस रेखा का बोरिंग अथवा गड्ढे का निर्माण करने समय इसे छोड़ देना चाहिए, अगर निर्माण में बेसमेंट कि आवश्यकता है तो जितने स्थान को जल के लिए चिन्हित किया गया है उस स्थान में बेसमेंट निर्माण किया जा सकता है निम्नलिखित चित्र में इसे नीले रंग से दिखाया गया है।

वास्तु के अनुसार प्लॉट मे सेप्टिक टैंक, Sok Pit, लिफ्ट के लिए गड्ढा कहाँ हों??


वायव्य कोण, अर्थात उत्तर-पश्चिम दिशा (North/West) अपशिष्ट निष्कासन के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इस स्थान पर सेप्टिक टैंक या सोख पिट का निर्माण किया जा सकता है। यह दिशा वायु तत्व से संबंधित है, जो अपशिष्ट को बाहर निकालने में सहायक होती है और घर के वातावरण को संतुलित बनाए रखती है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि N/W में भी बिल्कुल कोने की जहां 90 अंस का कोण बनता हैं वहां यह गड्ढा नहीं होना चाहिए, इससे घर की स्त्रियां को स्वास्थ्य की समस्याएं रहती हैं, इस दोष की वजह से प्रायः परिवारिक जनों का साइको या मनोरोगी लोगों से निरंतर पाला पड़ता रहता है अतः वायव्य का एकदम कॉर्नर छोड़ देना उचित रहता है।

वास्तु के अनुसार प्लॉट मे कहाँ गड्ढा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए??


इसके विपरीत, दक्षिण, अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व) और नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में किसी भी प्रकार का गड्ढा बनाना वास्तु के अनुसार अशुभ माना गया है। इन दिशाओं में गड्ढा होने से आर्थिक हानि, स्वास्थ्य समस्याएं, मानसिक तनाव और पारिवारिक अस्थिरता जैसी परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से नैऋत्य कोण में गड्ढा बनाना गंभीर वास्तु दोष माना जाता है, जो जीवन की स्थिरता को प्रभावित करता है, यह पृथ्वी तत्व की दिशा है जो मजबूती से खड़े रहने के लिए बहुत जिम्मेदार होती है जैसे गड्ढे वाली भुरभुरि मिट्टी युक्त जमीन मजबूत निर्माण के उपयुक्त नहीं होती क्यों कि वह मिट्टी बड़े निर्माण का भार सह नहीं पाएगी और मकान गिर सकता है अतः यह दिशा जितनी ठोस होगी उतना शुभ फल प्राप्त होगा।
आज के समय में कुछ महान वास्तुविद पूर्वी आग्नेय (E/S/E) में सेफ्टिक टैक रखने की सलाह देते हैं, यह स्थान वास्तु में सुबह 9 से 10 बजे का ऊर्जा स्थान है, यह वह समय होता है जब व्यक्ति एकदम फ्रेस होकर अपने कार्य के लिए अपने ऑफिस या फैक्ट्री, बच्चे स्कूल के लिए निकलते हैं, इस समय सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें घर को और व्यक्ति दोनों को ऊर्जा प्रदान करती हैं, मैने अनुभव में पाया है जिन घरों में सेफ्टिक टैक इस स्थान पर हैं उन घरों में सुबह सुबह कार्य हेतु घर से निकलते समय अत्यधिक जल्दबाजी, आलस्य की वजह से तैयार न हो पाना जिसकी वजह से नित्य किचकिच होना आम बात है। मेरा आशय किसी भी ज्ञानी को गलत कहना नहीं है बल्कि मैने अपने कार्य अनुभव में अपने बहुत से क्लाइंट के घर में देखा है।

वास्तु का मूल सिद्धांत संतुलन पर आधारित है। जहाँ जल का स्थान होता है, वहाँ जीवन और ऊर्जा का प्रवाह होता है, जबकि अपशिष्ट के लिए उचित दिशा का चयन आवश्यक होता है ताकि नकारात्मकता नियंत्रित रहे।

अंततः मै आप का वास्तुविद आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, वास्तुशास्त्र के ग्रंथों के अध्ययन और अपने अबतक के वास्तु यात्रा के निजी कार्य अनुभव के आधार पे आप से यही निवेदन करूंगा कि प्लॉट में गड्ढों का निर्माण ईशान कोण में जल स्रोत और वायव्य कोण में सेप्टिक टैंक के रूप में किया जाए तथा दक्षिण दिशा को इस प्रकार के निर्माण से मुक्त रखा जाए, तो घर में सुख, शांति और समृद्धि का स्थायी वातावरण बना रहता है।

मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें। पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद। 

मंगलवार, 7 मई 2024

padam kalsarp yog। पद्म कालसर्प योग

पद्म कालसर्प योग । padam kalsarp yog

जन्मकुण्डली में जब राहु पंचम व केतु एकादश भाव में हों तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म नामक कालसर्प योग बनता है

पद्म कालसर्प योग padam kaal sarp yog in hindi

इस योग के फल स्वरूप जातक को जल्दी संतान सुख नहीं मिलता। पुत्र संतान की चिंता रहती है। यदि संतान हो भी जाये तो बृद्धावस्था में अलग हो जाती है अथवा दूर चली जाती है।विद्याध्ययन में कुछ व्यवधान उपस्थित होता है। परंतु कालान्तर में वह व्यवधान समाप्त हो जाता है। जातक का स्वास्थ्य कभी-कभी असामान्य हो जाता है। इस योग के कारण दाम्पत्य जीवन सामान्य होते हुए भी कभी-कभी अधिक तनावपूर्ण हो जाता है। परिवार में जातक को अपयश मिलने का भी भय बना रहता है। जातक के मित्रगण स्वार्थी होते हैं और वे सब उसका पतन कराने में सहायक होते हैं। जातक को तनावग्रस्त जीवन व्यतीत करना पड़ता है। इस योग के प्रभाव से जातक के गुप्त शत्रू भी होते हैं। वे सब उसे नुकसान पहुंचाते हैं। उसके लाभ मार्ग में भी आंशिक बाधा उत्पन्न होती रहती है एवं चिंता के कारण जातक का जीवन संघर्षमय बना रहता है। जातक द्वारा अर्जित सम्पत्ति को प्राय: दूसरे लोग हड़प लेते हैं।प्रायः व्याधियों के कारण इलाज में अधिक धन खर्च हो जाने के कारण आर्थिक संकट उपस्थित हो जाता है। जातक वृध्दावस्था को लेकर अधिक चिंतित रहता है एवं कभी-कभी उसके मन में संन्यास ग्रहण करने की भावना भी जागृत हो जाती है। लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी एक समय ऐसा आता है कि यह जातक आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत होता है, समाज में मान-सम्मान मिलता है और कारोबार भी ठीक रहता है यदि यह जातक अपना चाल-चलन ठीक रखें, मध्यपान न करें और अपने मित्र की सम्पत्ति को न हड़पे तो उपरोक्त कालसर्प प्रतिकूल प्रभाव लागू नहीं होते हैं।

पद्म कालसर्प योग का उपाय

घर के शयनकक्ष में मोर पंख लगाएं तथा प्रतिदिन कम से कम एक बार मोर पंख अपने पुरे शारीर पे फिराऐं।

* किसी शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से मिर्मित नाग चिपका दें।
* शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से व्रत प्रारंभ कर 18 शनिवारों तक व्रत करें और काला वस्त्र धारण कर 18 या 3 माला राहु के बीज मंत्र का जाप करें। फिर एक बर्तन में जल दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं।
* भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, समयानुसार रेवड़ी तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही वस्तुएं दान भी करें। रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें। नाग पंचमी का व्रत भी अवश्य करें।
* नित्य प्रति हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ करें और हर शनिवार को लाल कपड़े में आठ मुट्ठी भिंगोया चना व ग्यारह केले सामने रखकर हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और उन केलों को बंदरों को खिला दें और प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं और हनुमान जी की प्रतिमा पर चमेली के तेल में घुला सिंदूर चढ़ाएं और साथ ही श्री शनिदेव का तेलाभिषेक करें।
* श्रावण के महीने में प्रतिदिन स्नानोपरांत 11 माला ॐ नम: शिवाय' मंत्र का जप करने के उपरांत शिवजी को बेलपत्र व गाय का दूध तथा गंगाजल चढ़ाएं तथा सोमवार का व्रत करें।

कालसर्प को लेकर पं. उदय प्रकाश शर्मा की अपनी बात

मुझे कुछ पाठकों ने मैसेज में लिखा की गुरु जी यह कालसर्प योग तो होता ही नहीं, इसका किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता तो उन्हें मै इतना ही कहना चाहूँगा कि काफी समय से कालसर्प योग की सत्यता को लेकर गुरुजनों में मतभेद चल रहा है. कोई इसकी सत्यता पर ही सवाल उठा रहा है,कोई इसके पक्ष में खड़ा है.वास्तव में यह सही है की हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसे किसी योग का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु ऐसे कई तथ्य हैं की जिन चीजों की जानकारी हमें पहले नहीं थी तथा उनकी खोज बाद में हुई, अब आप उन तथ्यों को यह कहकर नकार नहीं सकते की पहले के ग्रंथों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, अब जैसे ब्लॉग पहले नहीं होता था, ईमेल पहले नहीं होती थी, लैपटॉप का पहले कहीं जिक्र नहीं मिलता, मगर आज यह मौजूद हैं उसी तरह युग युगांतर से हर विषय में शोध कार्य होता रहता है और जीवन में जो अनुभव में आता है, वह प्रतिपादित भी होता है तो उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद हमें स्वीकार्य करना ही पड़ता है।

कहने का तात्पर्य यह है की यदि विद्वान् गुरुजनों ने किसी तथ्य की खोज बाद के काल में की है तो उस पर पूर्ण अध्ययन किये बिना उसे नकार देना हठधर्मिता ही कही जाएगी। कालसर्प योग पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है. कई अवस्थाओं में यह योग कुंडली में मौजूद होते हुए भी निष्क्रिय होता है, कई बार इसके दुष्परिणाम भी दिखाई पड़ते हैं । इसे एकदम से नकार देना भी उचित न होगा।


यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे ज्योतिष शास्त्र में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है। यहाँ हम यह कहना चाहेंगे कि अपने जीवन में मिलने वाले सारे अच्छे या बुरे फल अपने निजकृत कर्मो के आधार पर ही है, इसलिए ग्रहों को इसका दोष नहीं देना चाहिए बल्कि अपने शुभ कर्मों को बढ़ाना चाहिये व अशुभ कर्मों में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए तथा इश्वर पे भरोषा कर, हमेशा सकारात्मक विचार के साथ रहना चाहिये।

मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। मेरा यह प्रयास, कालसर्प को लेकर अपना अनुभव और जानकारी साझा करना है। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

रविवार, 21 मार्च 2021

Mangal Dosh Rectification मंगली योग का परिहार

 

मंगली योग का परिहार । mangal Dosh Rectification

mangal dosha parihara in hindi I mangal dosh rectification in hindi
mangal dosh, mangal dosha remedies


ज्योतिष शास्त्र के लगभग सभी ग्रन्थों में मंगली योग के परिहार का उल्लेख मिलता है। परिहार भी आत्म कुण्डलिगत एवं पर कुण्डलिगत भेद से दो प्रकार के होते हैं । वर या कन्या की कुंडली में मंगली योग होने पर उसी की कुण्डली को जो योग मंगली दोष को निष्फल कर देता है, वह परिहार योग आत्म कुण्डलिगत कहलाता है। तथा वर या कन्या इन दोनों में से किसी एक की कुण्डली में मंगल योग का दुष्प्रभाव दूसरे की कुण्डली के जिस योग से दूर हो जाता है, वह पर कुण्डलिगत परिहार योग कहा जाता है। इस आलेख मे 10 ऐसे सूत्र दिए हैं जिनके कुंडली मे होने से मंगल दोष भंग या उसका परिहार हो जाता है। 

मंगल दोष पे सम्पूर्ण जानकारी 


(1) वर कन्या में से किसी एक की कुंडली में मंगली योग हो तथा दूसरे की कुण्डली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में शनि हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है।

(2) जिस कुण्डली में मंगली योग हो यदि उसमे शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण में तथा शेष पाप ग्रह त्रिषडाय में हो तथा सप्तमेश सप्तम स्थान में हो तो भी मंगली योग प्रभावहीन हो जाता है।

(3) यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो तो मंगल दोष प्रभावहीन हो जाता है।

(4) कुण्डली में लग्न आदि 5 भावों में से जिस भाव में भौमादि ग्रह के बैठने से मंगली योग बनता हो, यदि उस भाव का स्वामी बलवान् हो तथा उस भाव में बैठा हो या देखता हो साथ ही सप्तमेश या शुक्र त्रिक स्थान में न हों तो मंगली योग का अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है।

(5) वर कन्या में से किसी एक की कुण्डली में मंगली योग हो तथा दूसरे की कुण्डली में मंगली योगकारक भाव में कोई पाप ग्रह हो तो भी मंगली दोष प्रभावहीन हो जाता है।

(6) जिस कुण्डली में सप्तमेश या शुक्र बलवान हों तथा सप्तम भाव इनसे युत-दृष्ट हो उस कुंडली में मंगल दोष का प्रभाव न्यून हो जाता है।

(7) मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ स्थान में होने पर, कर्क या मकर का मंगल सप्तम स्थान में होने पर, मीन का मंगल अष्टम में होने पर, तथा मेष या कर्क का मंगल व्यय स्थान में होने पर मंगल दोष नहीं लगता।

(8) मेष लग्न में स्थित, मंगल, वृश्चिक राशि में चतुर्थ भाव में स्थित मंगल, वृषभ राशि में सप्तम स्थान में मंगल, कुम्भ राशि में अष्टम स्थान में स्थित मंगल तथा धनु राशि में व्यय स्थान में स्थित मंगल मंगली दोष नहीं करता।

(9) मंगली योग वाली कुंडली में बलवान् गुरु या शुक्र के लग्न या सप्तम में होने पर अथवा मंगल के निर्बल होने पर मंगली दोष का प्रभाव दूर हो जाता है।

(10) यदि मंगली योगकारक ग्रह स्वराशि मूलत्रिकोण राशि या उच्च राशि में हो तो मंगली दोष स्वयं समाप्त हो जाता है।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

रविवार, 10 जनवरी 2021

toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा

 toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा 

​"लाख कोशिशों के बाद भी घर में पैसा नहीं टिक रहा या कोई न कोई बीमार रहता है? वास्तु शास्त्र के अनुसार, इसका कारण आपके शौचालय की गलत स्थिति हो सकती है। जानिए कौन सी दिशा आपके लिए वरदान है और कौन सी अभिशाप।"

आज के समय में बन रहे ज्यादातर घरों में स्थान की कमी अथवा शहरी संस्कृति और शास्त्रों की अनभिज्ञता के कारण शौचालय का निर्माण गलत दिशा में हो जाता है जिससे उस घर मे रहने वाले परिवार को स्वास्थ्य और धन संबंधी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः जब भी घर में शौचालय का निर्माण कराया जाए तो उसे वास्तु के अनुसार ही करना चाहिए, नहीं तो ये घर में यही शौचालय negative energy नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का कारण बनते हैं। इनकी गलत दिशा के कारण परिवार के लोगों का स्वास्थ्य खराब बना रह सकता है। तो आइए मित्रों जानते हैं कि शौचालय निर्माण में किन मुख्य बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है?


शौचालय के उपयुक्त दिशा 

सर्वप्रथम वस्तुशात्र के अनुसार घर में शौचालय के लिए सबसे अच्छा स्थान SSW अथवा WNW एवं ESE का होता है। घर के मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए यह घर (भवन) का ब्रह्म स्थल होता है यहां वास्तु पुरुष की नाभि होती है, यहां बना शौचालय स्वास्थ्य के साथ जीवन में संघर्ष की शक्ति को समाप्त करता है। ईशान अथवा नैऋत्य कोण में शौचालय का निर्माण निषिद्ध किया गया है। ईशान कोण में शौचालय होने से गृह-क्लेश में वृद्धि होती है साथ ही कैंसर जैसा भयंकर रोग होने कि संभावना रहिती है, घर के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, नए और शुभ विचार नहीं आते, घर को आर्थिक संकटों का सामना निरंतर करना पड़ता है तथा सारे घर में negative energy अपवित्रता का वातावरण हमेशा बना रहता है। वहीं नैऋत्य कोण में शौचालय बनाने से मानसिक अस्थिरता, संबंधों में खटास, प्रगति में बाधा, नजर दोष तथा शारीरिक कष्टों में वृद्धि होती है।

शौचालय के अंदर की व्यवस्था 

यदि शौचालय कमरे के साथ ही बनाना हो तो इसे कमरे के वायव्य कोण में बनाना चाहिए। नैऋत्य कोण में शौचालय निर्माण सर्वथा निषिद्ध है। शौचालय में ताजी हवा तथा प्रकाश के आगमन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय का दरवाजा पूर्व अथवा अग्नि कोण में होना चाहिए तथा टॉयलेट सीट इस प्रकार फिट होनी चाहिए कि सीट पर बैठते समय व्यक्ति का मुख दक्षिण अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे, भूलकर भी मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर नहीं करना चाहिए।

शौचालय में पानी की व्यवस्था पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होनी चाहिए, अगर वाशबेसिन भी शौचालय में लगाए जाने हैं तो वह भी पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाने चाहिए। वैसे शौचालय में दर्पण का प्रयोग वर्जित है फिर भी अगर लगाना है तो उसे भी उत्तरी और पूर्वी दीवाल पर ही लगाएं। 

वेंटिलेशन, एग्जॉस्ट एवं ड्रेनेज की व्यवस्था 

शौचालय में शुद्ध वायु के आवागमन के लिए खिड़की या वेंटिलेशन उत्तर या पूर्व दिशा में होना उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इन दिशाओं से प्राकृतिक प्रकाश एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता है।

एग्जॉस्ट फैन लगाने के लिए वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह दिशा वायु तत्व की होती है और दूषित वायु को बाहर निकालने में सहायक होती है। वैकल्पिक रूप में, यदि वायव्य कोण उपलब्ध न हो, तो एग्जॉस्ट फैन उत्तर या पूर्व दिशा में भी लगाया जा सकता है।

जल निकासी (ड्रेनेज) का ढाल इस प्रकार रखा जाए कि पानी का प्रवाह उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। इससे जल का उचित प्रवाह बना रहता है तथा स्थान स्वच्छ बना रहता है।

अन्य महत्वपूर्ण निर्देश 

शौचालय कभी भी रसोई घर के सामने ना बनाएं अगर शौचालय एवं स्नानघर इकट्ठा बनाना है तो यह पश्चिम वायव्य अथवा पूर्व आग्नेय दिशा में होना चाहिए इसमें लगे शावर व नल आदि ईशान कोण में तथा टॉयलेट की सीट वायव्य कोण में होनी चाहिए यह पश्चिम दिशा में भी सुविधा अनुसार रखी जा सकती है वाशबेसिन की स्थिति पश्चिम में होनी चाहिए।

शौचालय के लिए वास्तु टिप्स toilet vastu remedies

अगर किसी कारण वश शौचालय का निर्माण गलत हुआ है तो निम्नलिखित कुछ उपाय करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा को आने से रोका जा सकता है।

*अगर पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा के मध्य स्थान तक शौचालय की खिड़की खुलती हो तो उस खिड़की में 3 क्रिस्टल की बॉल लाल रिबन में बांधकर लटका दें जब सूर्य की रश्मियां उस क्रिस्टल बॉल से टकराकर शौचालय में पड़ेंगी तो वहां की नकारात्मक ऊर्जा जल जाएगी।

* शौचालय की दुर्गंध घर में बिल्कुल न फैले इसका विशेष ध्यान रखें, इसके लिए सुगंधित चीजों का छिड़काव आदि करें।

* शौचालय में किसी सूखे स्थान पर समुद्री नमक किसी कांच की कटोरी आदि में भरकर रखे और सप्ताह में एक बार उसी कमोड में डालकर फ्लश कर दें तथा वापस नया नमक रख दें।

नोट- इस तरह के कुछ उपाय करने से बहोत हद तक सकारात्मक लाभ उठाया जा सकता है, अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार की मदत लें।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद 

नोट — उक्त उपाय करने से बहुत हद तक सकारात्मक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार का मार्गदर्शन प्राप्त करें।

shankhpal kalsarp yog। शंखपाल कालसर्प योग और उपाय

शंखपाल कालसर्प योग और उपाय । shankhpal kalsarp yog

जन्मकुण्डली में जब राहु चौथे भाव में और केतु दशवें भाव में हो इनके बीच सारे ग्रह स्थित हों तो शंखपाल नामक कालसर्प योग बनता है।

                                       shankhpal kalsarp yog aur upay। शंखपाल कालसर्प योग और उपाय


जातक को घर, वाहन, माता का अपेक्षित सुख नहीं मिलता । कभी-कभी बेवजह चिंता घेर लेती है तथा विद्या प्राप्ति में भी उसे आंशिक रूप से तकलीफ उठानी पड़ती है। जातक को माता से कोई, न कोई किसी न किसी समय आंशिक रूप में तकलीफ मिलती है।अपने ही विश्वासघात करते हैं। सुख-संवृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति संबंधी अनेक परेसानी उठानी पड़ती है। नौकरों की वजह से भी कोई न कोई कष्ट होता ही रहता है। इसमें उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ता है। जातक का वैवाहिक जीवन सामान्य होते हुए भी वह कभी-कभी तनावग्रस्त हो जाता है। चंद्रमा के पीड़ित होने के कारण जातक समय-समय पर मानसिक संतुलन भी खोता रहता है। कार्य के क्षेत्रा में भी अनेक विघ्न आते हैं। पर वे सब विघ्न कालान्तर में स्वत: नष्ट हो जाते हैं। बहुत सारे कामों को एक साथ करने के कारण जातक का कोई भी काम प्राय: पूरा नहीं हो पाता है। इस योग के प्रभाव से जातक का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है, जिस कारण आर्थिक संकट भी उपस्थित हो जाता है। लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी जातक को व्यवसाय, नौकरी तथा राजनीति के क्षेत्रा में बहुत सफलताएं प्राप्त होती हैं एवं उसे सामाजिक पद प्रतिष्ठा भी मिलती है।


शंखपाल कालसर्प योग का उपाय 

राहु का मन्त्र जाप करने तथा नागपंचमी का व्रत करने व सर्पों को दूध पिलाने से इस योग के बुरे फलों में कमी आती है।

* शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।

* शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को जल में तीन बार प्रवाहित करें।

* 86 शनिवार का व्रत करें और राहु, केतु व शनि के साथ हनुमान की आराधना करें। और हनुमान जी को मंगलवार को चोला चढ़ायें और शनिवार को श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें।

* किसी शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल अपने ऊपर से सात बार उतारकर सात बुधवार को बहते जल में प्रवाहित करें।

* सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।

* शुभ मुहूर्त में सर्वतोभद्रमण्डल यंत्रा को पूजित कर धारण करें।

* नित्य प्रति हनुमान चालीसा पढ़ें और रसोईं में बैठकर भोजन करें। हनुमान चालीसा का नित्य 11 पाठ करें।

* सवा महीने तक जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं और प्रत्येक शनिवार को चींटियों को शक्कर मिश्रित सत्ताू उनके बिलों पर डालें।

* किसी शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को बहते जल में तीन बार प्रवाहित करें तथा किसी शुभ मुहूर्त में शनिवार के दिन बहते पानी में तीन बार कोयला भी प्रवाहित करें।


कालसर्प को लेकर पं. उदय प्रकाश शर्मा की अपनी बात 


मुझे कुछ पाठकों ने मैसेज में लिखा की गुरु जी यह कालसर्प योग तो होता ही नहीं, इसका किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता तो उन्हें मै इतना ही कहना चाहूँगा कि काफी समय से कालसर्प योग की सत्यता को लेकर गुरुजनों में मतभेद चल रहा है. कोई इसकी सत्यता पर ही सवाल उठा रहा है,कोई इसके पक्ष में खड़ा है.वास्तव में यह सही है की हमारे प्राचीन शास्त्रों में ऐसे किसी योग का उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु ऐसे कई तथ्य हैं की जिन चीजों की जानकारी हमें पहले नहीं थी तथा उनकी खोज बाद में हुई, अब आप उन तथ्यों को यह कहकर नकार नहीं सकते की पहले के ग्रंथों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, अब जैसे ब्लॉग पहले नहीं होता था, ईमेल पहले नहीं होती थी, लैपटॉप का पहले कहीं जिक्र नहीं मिलता,  मगर आज यह मौजूद हैं उसी तरह युग युगांतर से हर विषय में शोध कार्य होता रहता है और जीवन में जो अनुभव में आता है, वह प्रतिपादित भी होता है तो उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद हमें स्वीकार्य करना ही  पड़ता है।

कहने का तात्पर्य यह है की यदि विद्वान् गुरुजनों ने किसी तथ्य की खोज बाद के काल में की है तो उस पर पूर्ण अध्ययन किये बिना उसे नकार देना हठधर्मिता ही कही जाएगी। कालसर्प योग पर अधिक ध्यान दिया जाना आवश्यक है. कई अवस्थाओं में यह योग कुंडली में मौजूद होते हुए भी निष्क्रिय होता है, कई बार इसके दुष्परिणाम भी दिखाई पड़ते हैं । इसे एकदम से नकार देना भी उचित न होगा। 

यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे ज्योतिष शास्त्र में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है। यहाँ हम यह कहना चाहेंगे कि अपने जीवन में मिलने वाले सारे अच्छे या बुरे फल अपने निजकृत कर्मो के आधार पर ही है, इसलिए ग्रहों को इसका दोष नहीं देना चाहिए बल्कि अपने शुभ कर्मों को बढ़ाना चाहिये व अशुभ कर्मों में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए तथा इश्वर पे भरोषा कर, हमेशा आशावान रहना चाहिये। 

काशी के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य, पं. उदय प्रकाश शर्मा 


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। मेरा यह प्रयास, कालसर्प को लेकर जिज्ञासु पाठकों के लिए अपना अनुभव और अपनी जानकारी साझा करना है। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

                                                  ।। इति शुभम् ।।


 

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