मकान की दिशा नहीं, उसकी ऊँचाई तय करती है वास्तु का संतुलन
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| South West Direction Height Benefits |
क्या केवल प्लॉट की दिशा ही वास्तु तय करती है?
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि यदि प्लॉट पूर्वमुखी है तो मकान का ऊँचा भाग भी पूर्व दिशा में होना चाहिए, या यदि प्लॉट पश्चिममुखी है तो पश्चिम दिशा को अधिक ऊँचा बना देना चाहिए।
लेकिन वास्तुशास्त्र का सिद्धांत इससे बिल्कुल अलग है।
वास्तु के अनुसार प्लॉट किसी भी दिशा का क्यों न हो, भवन का सबसे स्थिर, भारी और ऊँचा भाग सदैव नैऋत्य दिशा (South-West / S/W) में होना चाहिए। यही दिशा भवन को स्थिरता, मजबूती और ऊर्जा संतुलन प्रदान करती है।
आधुनिक घरों में सबसे बड़ी भूल
आज के समय में लोग घर बनाते समय डिज़ाइन, फ्रंट एलिवेशन, कलर कॉम्बिनेशन और आधुनिक सुविधाओं पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं।
लेकिन भवन की ऊर्जा संरचना को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
जबकि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा संतुलन का विज्ञान है।
किसी भवन का प्रभाव केवल उसके लुक, पोर्च की भव्यता या मुख्य द्वार से तय नहीं होता, बल्कि उसकी ऊँचाई, भार, ढाल (Slope) और वेंटिलेशन अर्थात खुले स्थानों से निर्धारित होता है।
क्यों महत्वपूर्ण है नैऋत्य (S/W) दिशा?
वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को पृथ्वी तत्व की दिशा माना गया है।
पृथ्वी का स्वभाव स्थिरता, धारण शक्ति और मजबूती है।
इसी कारण वास्तु में घर का भारी निर्माण, मोटी दीवारें, ऊँचा स्तर या भारयुक्त भाग इस दिशा में रखना शुभ माना गया है।
जब भवन का भारी और ऊँचा भाग S/W दिशा में होता है, तब घर की ऊर्जा नियंत्रित और संतुलित रहती है। ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि स्थिर होकर सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है।
इसीलिए वास्तु में नैऋत्य को घर की शक्ति और स्थिरता का केंद्र कहा गया है।
यदि S/W में ऊँचाई देना संभव न हो तो क्या करें?
कई बार प्लॉट की स्थिति, डिज़ाइन या अन्य व्यावहारिक कारणों से नैऋत्य दिशा में पूर्ण ऊँचाई देना संभव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में दक्षिण या पश्चिम दिशा में ऊँचाई दी जा सकती है।
यदि पश्चिम दिशा ऊँची होगी, तो भवन का ढाल स्वाभाविक रूप से पूर्व दिशा की ओर बनेगा।
यदि दक्षिण दिशा ऊँची होगी, तो ढाल उत्तर दिशा की ओर रहेगा।
वास्तु का उद्देश्य केवल भार निर्धारित करना नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखना भी है। और यह संतुलन भवन की ऊँचाई और ढाल से स्वतः निर्मित होता है।
प्रकृति भी यही सिद्धांत सिखाती है
यदि हम प्रकृति को ध्यान से देखें, तो वास्तु के सिद्धांत स्वयं स्पष्ट हो जाते हैं।
पर्वत सदैव स्थिर और ऊँचे होते हैं, जबकि नदियाँ ढाल की ओर बहती हैं।
ठीक उसी प्रकार भवन में भी एक दिशा स्थिरता का केंद्र बनती है और दूसरी दिशा ऊर्जा प्रवाह का मार्ग।
जब यह संतुलन सही होता है, तब घर केवल रहने का स्थान नहीं रहता, बल्कि मानसिक शांति, स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।
वास्तु का वास्तविक संदेश
वास्तु का मूल संदेश यह नहीं कि केवल प्लॉट की दिशा शुभ या अशुभ है।
बल्कि वास्तविक महत्व भवन के ऊर्जा संतुलन का है।
प्लॉट की दिशा कुछ भी हो सकती है, लेकिन स्थिरता और ऊर्जा प्रवाह का सिद्धांत नहीं बदलता।
इसीलिए वास्तु में कहा गया है कि घर किसी भी दिशा का हो, उसका भार और ऊँचाई नैऋत्य (S/W) दिशा में ही श्रेष्ठ मानी जाती है।
अंत में एक आवश्यक बात
मित्रों, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में अनेक मत-मतांतर हैं।
अतः किसी भी विषय को पढ़ें, समझें, अनुभव करें और फिर अपने व्यवहार में उतारें।
कृपया कुतर्क और अनावश्यक बहस से बचें। यदि आपके कुछ सुझाव हों तो मर्यादित शब्दों में अवश्य लिखें।
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पूरा आलेख ध्यानपूर्वक पढ़ने हेतु आपका हृदय से धन्यवाद।
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