ॐ श्री मार्कंडेय महादेवाय नमः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्यवेत्।
सब सुखी हों । सभी निरोग हों । सब कल्याण को देखें । किसी को लेसमात्र दुःख न हो ।

Pandit Uday Prakash
Astrologer, Vastu Consultant, Spiritual & Alternative Healers
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शुक्रवार, 8 मई 2026

Vastu Ka Sabse Bada Satya । वास्तु का सबसे बड़ा सत्य — ऊर्जा कहाँ से आती है और कहाँ टिकती है?

 

वास्तु का सबसे बड़ा सत्य — ऊर्जा कहाँ से आती है और कहाँ टिकती है?

“ईशान कोण आकाश का द्वार है…और नैऋत्य पृथ्वी का आधार। इन दोनों के संतुलन का नाम ही वास्तु है।”

जब पृथ्वी एक मटका है — वास्तु का अद्भुत रहस्य


उत्तर-पूर्व से ऊर्जा का प्रवेश और दक्षिण-पश्चिम की स्थिरता का गूढ़ रहस्य

वास्तुशास्त्र को अक्सर लोग केवल दिशाओं, कमरों और निर्माण के नियमों तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। वास्तु केवल भवन निर्माण की पद्धति नहीं, बल्कि पृथ्वी, प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के बीच संतुलन स्थापित करने का एक प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह अनुभव किया था कि पृथ्वी पर बहने वाली सूक्ष्म ऊर्जाएँ मनुष्य के जीवन, मानसिकता, स्वास्थ्य, संबंध और समृद्धि को प्रभावित करती हैं। इन्हीं ऊर्जाओं को संतुलित करने के लिए वास्तुशास्त्र की रचना हुई।

यदि वास्तु को बहुत ही सरल और प्रतीकात्मक रूप में समझना हो, तो “मटका” उसका सबसे अद्भुत उदाहरण बन सकता है।

कल्पना कीजिए कि पूरी पृथ्वी एक मटके के समान है। मटके का निचला भाग — उसकी पेंदी — वह आधार है जिस पर पूरा मटका टिका रहता है। यही भाग मटके को स्थिरता देता है। यदि पेंदी कमजोर हो जाए, टूट जाए या उसमें छेद हो जाए, तो मटका चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, उसमें रखा जल कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। वास्तुशास्त्र में यही सिद्धांत दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य दिशा, S/W पर लागू होता है।

दक्षिण-पश्चिम — स्थिरता और पृथ्वी तत्व का केंद्र

वास्तु के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा पृथ्वी तत्व की दिशा मानी गई है। यह घर की स्थिरता, सुरक्षा, परिपक्वता, नियंत्रण, अनुभव और धन की मजबूती का प्रतीक है। जिस प्रकार मटके का भार उसकी पेंदी पर होता है, उसी प्रकार घर की संपूर्ण ऊर्जा का भार नैऋत्य दिशा पर टिका होता है।

इसी कारण वास्तु में दक्षिण-पश्चिम को भारी, ऊँचा और स्थिर रखने की सलाह दी जाती है। इस दिशा में मास्टर बेडरूम, भारी निर्माण, मजबूत दीवारें या स्थिर तत्व शुभ माने जाते हैं। यदि यह दिशा संतुलित होती है, तो परिवार में स्थायित्व, आर्थिक मजबूती और मानसिक संतुलन बना रहता है।

लेकिन यदि इसी दिशा में कटाव, गड्ढा, अत्यधिक खुलापन, पानी या मुख्य द्वार बना दिया जाए, तो घर की ऊर्जा अस्थिर होने लगती है। धन आता है लेकिन टिकता नहीं, रिश्तों में स्थायित्व नहीं रहता, मानसिक तनाव बढ़ता है और जीवन में निर्णय क्षमता कमजोर होने लगती है। क्योंकि जिस दिशा का कार्य ऊर्जा को संभालना था, वहीं से ऊर्जा का रिसाव प्रारंभ हो जाता है।

उत्तर-पूर्व — ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश द्वार

अब मटके के ऊपरी भाग को देखिए। मटके का मुख ऊपर की ओर खुला होता है, जहां से वर्षा का जल उसमें प्रवेश करता है। यही प्रतीक वास्तु में उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण का है।

ईशान कोण जल तत्व, दिव्यता, ज्ञान, आध्यात्मिकता, प्रेरणा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का क्षेत्र माना गया है। सूर्योदय की पहली किरणें, पृथ्वी का चुंबकीय प्रवाह और सूक्ष्म सकारात्मक ऊर्जा उत्तर और पूर्व दिशाओं से अधिक प्रभावी रूप में प्रवेश करती हैं। इसलिए वास्तु में उत्तर-पूर्व को खुला, स्वच्छ, हल्का और पवित्र रखने का विशेष महत्व बताया गया है।

जब घर का ईशान कोण संतुलित होता है, तब घर में सकारात्मकता, मानसिक शांति, अवसर, ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यही कारण है कि मंदिर, ध्यान स्थान या जल तत्व उत्तर-पूर्व में शुभ माने जाते हैं।


north east south west vastu Stability Chart


क्यों उत्तर और पूर्व दिशा शुभ मानी जाती हैं?

वास्तु में उत्तर और पूर्व दिशा को शुभ इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि यह केवल परंपरा है, बल्कि इसलिए क्योंकि यही दिशाएँ ऊर्जा के प्रवेश का माध्यम हैं।

यदि मटके का मुख सही दिशा में खुला हो, तो उसमें अमृत समान जल भरता रहेगा। लेकिन यदि वही मटका नीचे से टूटा हो, तो चाहे ऊपर से कितना भी जल डाला जाए, वह टिक नहीं पाएगा। यही कारण है कि वास्तु में केवल ऊर्जा को बुलाना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि उसे स्थिर रखना भी उतना ही आवश्यक बताया गया है।

उत्तर और पूर्व दिशा ऊर्जा को ग्रहण करती हैं, जबकि दक्षिण और पश्चिम दिशा उस ऊर्जा को धारण करती हैं। और इन सबके बीच दक्षिण-पश्चिम पूरे भवन की “ऊर्जा नींव” के रूप में कार्य करता है।

वास्तु का वास्तविक विज्ञान

आज आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि पृथ्वी पर चुंबकीय तरंगें, गुरुत्वीय प्रभाव और कॉस्मिक रेडिएशन लगातार कार्य कर रहे हैं। हमारे प्राचीन वास्तु ऋषियों ने इन्हीं शक्तियों को अनुभव करके भवन निर्माण के नियम बनाए थे। इसलिए वास्तु केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति और ऊर्जा के नियमों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का विज्ञान है।

जब किसी घर का उत्तर-पूर्व खुला और शुद्ध होता है तथा दक्षिण-पश्चिम मजबूत और स्थिर होता है, तब वह भवन केवल रहने का स्थान नहीं रह जाता, बल्कि वह सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और मानसिक संतुलन का केंद्र बन जाता है।

निष्कर्ष

धरती स्वयं एक विशाल ऊर्जा-पात्र है।
घर उसी धरती का एक छोटा रूप है।
और वास्तु उस ऊर्जा को सही दिशा से ग्रहण कर सही स्थान पर स्थिर करने की कला है।

यदि घर का ईशान कोण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का द्वार है, तो नैऋत्य उस ऊर्जा की सुरक्षा का आधार है।
यही संतुलन घर को केवल “मकान” से “सुख और समृद्धि के केंद्र” में परिवर्तित करता है।

प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ उदाहरण के लिए यह दिखाता है कि किस प्रकार पृथ्वी पर ब्रह्मांड से आने वाली ईशान्य दिशा की ऊर्जा S/W दिशा मे रखे एक मटके रूपी पात्र मे संचित होती है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।

प्रिय मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।  

मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो। 

सोमवार, 4 मई 2026

Vastushastra aur Surya ka Sambandh वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?

वास्तुशास्त्र और सूर्य का संबंध क्या है?


 हर दिन सूर्य आपके घर से दिखता है सवाल ये है कि क्या वो आपके घर या जीवन में प्रवेश कर पा रहा है? 

vastu me surya ka mahatva


आइए जानते हैं.. 
जब हम किसी घर या प्लॉट को केवल ईंट-पत्थर का ढांचा मानते हैं, तब हम उसकी वास्तविक शक्ति को नजर अंदाज कर देते हैं। वास्तव में, घर एक जीवंत ऊर्जा का केंद्र होता है और इस ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य का दैनिक भ्रमण हि है। वास्तुशास्त्र इसी प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह को समझकर जीवन को संतुलित करने की एक गहन प्रणाली प्रस्तुत करता है। यदि एक प्लॉट को केंद्र में रखा जाए और उसमें रहने वाले व्यक्ति की ऊर्जा लगभग (उदाहरण- के लिए मान लें तो) 6.300 हर्ट्ज मानी जाए, तो सूर्य की दिनभर की गति केवल आकाशीय परिवर्तन नहीं बल्कि ऊर्जा के क्रमिक उतार-चढ़ाव का एक वैज्ञानिक आधार बन जाती है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पूर्व दिशा (East) मे होता है

प्रातःकाल जब सूर्य पूर्व (East) दिशा में उदित होता है, उस समय उसकी ऊर्जा लगभग 4.100 हर्ट्ज होती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से कम होती है। यही कारण है कि सुबह 6 am से 8 am के बीच सूर्य की किरणें कोमल, शांत और जीवनदायिनी प्रतीत होती हैं। इस समय व्यक्ति सूर्य को खुली आंखों से देख सकता है और उसकी ऊर्जा को सहज रूप से अनुभव कर सकता है। यह काल मानसिक शुद्धि, ध्यान और प्राणायाम के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वास्तुशास्त्र में भी पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि यह सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रमुख द्वार है। इसी लिए वास्तु में पूर्व दिशा को हल्का, साफ-सुथरा और मुख्य द्वार बहुत शुभ माना गया है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य अग्नि कोण (S/E) मे होता है

आगे जैसे-जैसे सूर्य पूर्व से दक्षिण-पूर्व (S/E) अर्थात अग्नि कोण की ओर बढ़ता है, उसकी ऊर्जा में वृद्धि होने लगती है और वह अल्ट्रावायलेट किरणों के रूप में परिवर्तित होकर लगभग 6.300 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है , जो मनुष्य की ऊर्जा के समांतर हो जाती है। यह समय 9 am से 11 am तक का होता है, इसी समय में व्यक्ति पूरी तरह सक्रिय, चुस्त-दुरुस्त, ताजगी से भरपूर होकर हर कार्य के लिए तैयार रहता है। सामान्यतः लोग इस समय में अपने दैनिक कार्यों की शुरुआत करते हैं, अपने ऑफिस अथवा व्यापार के लिए निकलते हैं, और जीवन में उत्साह तथा उत्पादकता का अनुभव करते हैं। वास्तु के अनुसार अग्नि कोण को ऊर्जा और क्रियाशीलता का क्षेत्र माना गया है, इसलिए इस दिशा में रसोई या अग्नि से संबंधित कार्यों का स्थान होना शुभ माना जाता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य दक्षिण दिशा (South) मे होता है

दोपहर के समय 12 से 2 pm के बीच जब सूर्य दक्षिण दिशा में पहुंचता है, तब उसकी ऊर्जा अपने चरम पर होती है और लगभग 7.100 हर्ट्ज तक पहुंच जाती है, जो मनुष्य की ऊर्जा से बहुत अधिक होती है। यह अवस्था सूर्य के प्रचंड और प्रभावशाली रूप को दर्शाती है, और यह आसमान में एकदम से हमारे सर के ऊपर होता है, इसे हम एक पिता के समान गरिमापूर्ण, अनुशासनात्मक और प्रभाव शक्ति का प्रतीक मान सकते है। विशेषकर गर्मियों में इस तीव्र ऊर्जा के कारण लोग प्रचंड धूप से बचने का प्रयास करते है और अधिकतर समय घर के भीतर या छाँव मे रहना पसंद करते हैं। वास्तु के अनुसार शायद इसलिए ही दक्षिण दिशा को स्थिर और भारी और ऊंचा रखने के लिए कहा गया है, और दक्षिण दिशा मे ऊंचे पेड़ लगाने की बात वास्तु मे की जाती है, जिससे घर में सूर्य की इस प्रबल ऊर्जा को संतुलित किया जा सके।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य नैऋत्य दिशा (S/W) मे होता है

इसके पश्चात सूर्य 3 pm से 5 pm के मध्य, धीरे-धीरे नैऋत्य दिशा S/W, की ओर अग्रसर होता है, जहां उसकी ऊर्जा इन्फ्रारेड किरणों में परिवर्तित हो जाती है। जहां ताप वैसे ही रहता है पर प्रकाश धीरे धीरे कम हो रहा होता है, इस अवस्था में ऊर्जा की तीव्रता कम होकर स्थिरता की ओर बढ़ती है और इसका प्रभाव व्यक्ति के शरीर और मन पर थकान के रूप में दिखाई देता है। यह वही समय होता है जब व्यक्ति अपने दिनभर के कार्यों से निवृत्त होकर घर लौटने की तरफ और विश्राम की ओर अग्रसर होता है। वास्तुशास्त्र में नैऋत्य दिशा को स्थिरता, सुरक्षा और नियंत्रण का स्थान माना गया है, इसलिए यहां मास्टर बेडरूम का होना उपयुक्त समझा जाता है। इस दिशा को जितना अधिक भारी और ऊंचा किया जाता है, घर या अन्य निर्माण इस प्रकार की व्यवस्था की वजह से बहुत लाभ प्राप्त करता है।

वास्तु के अनुसार जब सूर्य पश्चिम दिशा (West) मे होता है

अब जब 6 बजे के आस-पास सूर्यास्त हो जाता है ( गर्मियों को छोड़कर क्योंकि अक्सर गर्मियों में सात या साढ़ेसात बजे तक सूर्यास्त होता है ) सो 7/8 बजे के बाद रात्रि होते ही धरती पर चंद्रमा की ऊर्जा सक्रिय हो जाती है, जो शीतल और शांत होती है, यह ऊर्जा मन और तन की शक्ति को पुनर्जीवित करने वाली होती है। अतः रात्रि में शयन के पश्चात यह शरीर और मन को पुनः संतुलित करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे व्यक्ति अगले दिन सुबह फिर से ऊर्जावान होकर अपने कार्य-व्यापार में नई ताजगी के साथ पुनः प्रवेश करने के लिए तैयार हो सके। वास्तु के अनुसार शयनकक्ष की सही दिशा और व्यवस्था इस प्राकृतिक ऊर्जा को प्रभावी ढंग से ग्रहण करने में सहायक होती है।

इस प्रकार सूर्य का दैनिक भ्रमण यह स्पष्ट करता है कि वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का ज्ञान नहीं बल्कि ऊर्जा के संतुलन का विज्ञान है। जब घर या प्लॉट को इस प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुरूप बनाया जाता है, तब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बना रहता है। यही वास्तु का मूल सिद्धांत है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके जीवन को अधिक संतुलित, स्वस्थ और समृद्ध बनाया जा सकता है।

प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ यह दिखाता है कि किस प्रकार सूर्य अपने भ्रमण पथ से पृथ्वी पर अपना असर डालता है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।

प्रिय मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।  

मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो। 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

vastu me disha aur tatav kaise mile वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है

 

वास्तु में हर दिशा को एक तत्व क्यों दिया गया है… क्या ये आस्था है या pure science?”


आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में पाँच तत्वों का  किसी एक दिशा से हि संबंध क्यों और कैसे बना?  वास्तु के पीछे का वैज्ञानिक कारण। 

How were the elements and directions determined in Vastu?


वास्तुशास्त्र में पाँच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का निर्धारण किसी धार्मिक आस्था या कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति में उपस्थित ऊर्जा के सूक्ष्म अध्ययन पर आधारित एक व्यवस्थित सिद्धांत है। हमारे प्राचीन भारतीय वास्तु आचार्यों ने सबसे पहले यह जानने और समझने का प्रयास किया कि पृथ्वी पर ऊर्जा कैसे प्रवाहित होती है, किस दिशा में उसका स्वरूप कैसा होता है, और वह मानव जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती है, उन्होंने देखा कहीं ऊर्जा हल्की, शुद्ध और गतिशील है, कहीं भारी, स्थिर और संचित है, कहीं ताप (heat) अधिक है, कहीं वायु (motion) अधिक है, अतः उन्होंने इन्ही प्राकृतिक ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को पाँच मूल गुणों को पाँच तत्व के रूप मे अलग अलग दिशा मे स्थान दिया। 


वास्तुशास्त्र के अनुसार यह सभी पाँच तत्व किसी ठोस पदार्थ का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे ऊर्जा के पाँच अलग-अलग रूप या गुण हैं। जल का अर्थ केवल पानी नहीं, बल्कि प्रवाह शुद्धता और संवेदना है, अग्नि का अर्थ केवल आग नहीं, बल्कि परिवर्तन और सक्रियता है, पृथ्वी स्थिरता और भार का प्रतीक है; वायु गति और परिवर्तनशीलता को दर्शाती है, और आकाश वह माध्यम है जिसमें यह सब घटित होता है। इस प्रकार पंचतत्व वास्तव में ऊर्जा के पाँच आयाम हैं, जिन्हें दिशाओं के अनुसार स्थान दिया गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पहला आधार

five elements in vastu with directions


इसका व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहला आधार सूर्य की गति है। हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है और उसकी किरणें दिनभर अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग कोण और तीव्रता के साथ पृथ्वी पर पहुँचती हैं। सूर्य पूर्व से उदय होकर दक्षिण की ओर झुकते हुए पश्चिम में अस्त होता है। सुबह के समय उत्तर-पूर्व दिशा में आने वाली किरणें अपेक्षाकृत कोमल, शुद्ध और कम ताप वाली होती हैं, जबकि दिन चढ़ने के साथ दक्षिण-पूर्व दिशा में सूर्य की किरणें अधिक तीव्र और ऊष्मा से भरपूर हो जाती हैं। दोपहर के बाद दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में ताप अधिक स्थिर और भारी हो जाता है, और शाम तक उत्तर-पश्चिम दिशा में ताप घटने लगता है तथा वायु की गति बढ़ जाती है। इस प्रकार दिनभर में ऊर्जा का एक निश्चित पैटर्न बनता है, जिसे ध्यान में रखकर तत्वों का निर्धारण किया गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का दूसरा आधार

अब इसका दूसरा आधार देखें तो वह पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र है। पृथ्वी के भीतर एक प्राकृतिक चुंबकीय प्रवाह होता है जो सामान्यतः उत्तर से दक्षिण की ओर चलता है। यह प्रवाह सूक्ष्म ऊर्जा स्तर पर प्रभाव डालता है और जीवित प्राणियों के जैविक तंत्र को भी प्रभावित करता है। जैसे पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी हुई है तो पृथ्वी के ऊपर का भाग उत्तर/पूर्व का का स्थान हुआ अतः ब्रह्मांड की सभी ऊर्जा, बारिश, ओस सब इसी दिशा से पृथ्वी पर प्रवेश करती है,जिसकी वजह से यहाँ हल्कापन और संवेदनशीलता अधिक होती है, और जहाँ यह स्थिर होती है अर्थात नीचे का दक्षिण/पश्चिम का भाग वहाँ भारीपन और स्थायित्व अधिक होता है। जैसे बारिश का पानी भी नीचे गहराई मे जाकर स्थिर होता है अतः इसी कारण से दिशाओं में ऊर्जा के अलग-अलग गुणों को पहचाना गया और उन्हें पंचतत्वों से जोड़ा गया।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का तीसरा आधार

तीसरा आधार वायु का प्रवाह और दाब का अंतर है। हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है और इसका संबंध तापमान से सीधा होता है। जहाँ ताप अधिक होता है वहाँ हवा ऊपर उठती है और निम्न दाब बनता है, जबकि ठंडे क्षेत्रों में हवा अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। पृथ्वी के भौगोलिक संदर्भ में सामान्यतः वायु का प्रवाह उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर देखा गया है। इस प्रवाह ने यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि किस दिशा में गतिशीलता अधिक है और किस दिशा में स्थिरता। इसे अगर आम बोलचाल की भाषा मे समझें तो?- जैसे हमारी पृथ्वी लट्टू की तरह पश्चिम से पूर्व की तरफ घूम रही है, क्यूँ की पृथ्वी 23.5 डिग्री उत्तर की तरफ झुकी है ती उसके झुकाव से उसका नीचे का स्थान दक्षिण-पश्चिम, S/W के तरफ चला गया और ऊपर का भाग उत्तर-पूर्व, N/E की तरफ, जैसे हम किसी कार या वाहन को पश्चिम से पूर्व की तरफ गति देते हैं तो वायु हमे सामने वाहन की खिड़कियों से आती हुई प्रतीत होगी इसी तरह से उत्तर-पश्चिम, N/W मे वायु का स्थान कहा गया है।


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का चौथा आधार

चौथा और बहुत ही महत्वपूर्ण है थर्मो डायनामिक्स आधार अर्थात ताप का व्यवहार। हम सभी जानते हैं कि सूर्य से मिलने वाली ऊष्मा हर दिशा में समान नहीं होती, बल्कि यह दिन के समय और दिशा के अनुसार बदलती रहती है। उत्तर-पूर्व, N/E क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा और शुद्ध रहता है, सूर्य के यहाँ से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य के रश्मि प्रभाव को हम अल्ट्रा वायलेट ऊर्जा के रूप मे पहचानते हैं, दक्षिण-पूर्व, S/E क्षेत्र में सूर्य का ताप बढ़ने लगता है, साधारण भाषा मे समझें तो जब पृथ्वी N/E मे झुकी हुई है तो उसकी पीठ सूर्य राशमियों के ठीक सामने आ जाती है जिसकी वजह से S/E सबसे तप्त स्थान हो जाता है, जिसकी वजह से आचार्यों ने इस स्थान को ही अग्नि कोण कहा है, अब दक्षिण दिशा से आगे बढ़ने के क्रम मे सूर्य की यही ऊर्जा इन्फ्रारेड मे बदल जाती है, अब सूर्य दक्षिण-पश्चिम, S/W में अधिकतम स्थिर और भारी रूप ले लेता है, और उत्तर-पश्चिम में यह धीरे-धीरे कम होता हुआ गतिशील वायु में परिवर्तित हो जाता है। अग्नि का वास्तविक अर्थ केवल ज्वाला नहीं, बल्कि परिवर्तन की ऊर्जा है—वह शक्ति जो किसी पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलती है। इस तापीय क्रम ने भी पंचतत्वों के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके अतिरिक्त ऊर्जा प्रवाह के क्रम को भी समझना आवश्यक है। वास्तु में ऊर्जा का एक चक्र माना गया है जिसमें उत्तर-पूर्व से ऊर्जा का प्रवेश होता है, दक्षिण-पूर्व में वह सक्रिय और परिवर्तित होती है, दक्षिण-पश्चिम में स्थिर होकर संचित होती है, और उत्तर-पश्चिम में गति प्राप्त करके बाहर की ओर प्रवाहित होती है। इस क्रम में दक्षिण-पूर्व की भूमिका एक “एक्टिवेशन पॉइंट” की होती है, जहाँ निष्क्रिय ऊर्जा सक्रिय रूप लेती है। यही वैज्ञानिक तर्क अग्नि तत्व को इस दिशा में स्थापित करता है।

five elements vastu zones and colors


दिशा के अनुसार तत्व निर्धारण का पाँचवाँ आधार

जिसमे अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी यह 4 तत्व स्थित हैं वह है आकाश तत्व, आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे सूक्ष्म और व्यापक माना जाता है। जहाँ पृथ्वी स्थिरता देती है, जल प्रवाह देता है, अग्नि ऊर्जा देती है, वायु गति देती है—वहीं आकाश तत्व इन सबका का आधार तत्व है, आकाश तत्व वह खाली स्थान है जो इन सबको धारण करता है। आकाश का अर्थ है खुलापन, शून्यता और विस्तार। वास्तुशस्त्र के अनुसार यह सिर्फ “खाली जगह” नहीं बल्कि ऊर्जा के प्रवाह का माध्यम है। यह ध्वनि (sound) का वाहक है, सभी दिशाओं को जोड़ने वाला ब्रह्म तत्व है, आकाश तत्व सकारात्मक ऊर्जा को फैलाने का काम करता है, प्रथम चारों तत्व की एक सीमा निर्धारित है पर यह आकाश तत्व हर सीमा से परे है, यह ननंत है ना इसका कोई ओर-छोर है ना कोई बाउंड्री है। वस्तुशास्त्र मे आकाश तत्व को  मध्य स्थान, ऊर्ध्व  स्थान, मुख्य स्थान (ब्रह्म स्थान) कि दिशा मे कहा गया है।आकाश तत्व दिखता नहीं, लेकिन पूरे घर/संसार की ऊर्जा उसी पर आधारित होती है।

अंततः हमने जाना की वास्तुशास्त्र में पंचतत्वों का निर्धारण एक समग्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसमें सूर्य की गति, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र, वायु का प्रवाह, तापमान का वितरण और मानव शरीर की जैविक प्रतिक्रिया—इन सभी को एक साथ समझकर दिशाओं में ऊर्जा के गुण निर्धारित किए गए हैं। यह व्यवस्था इस बात को दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि प्रकृति के गहन अवलोकन और वैज्ञानिक समझ पर आधारित एक सुव्यवस्थित प्रणाली भी था। कितने महान थे हमारे पूर्वज आचार्य, ऋषि-मुनि जिन्होंने बिना किसी उन्नत दूरबीन, आधुनिक सेटेलाइट और सटीक उपकरण के ऊर्जातत्व के इन क्रमों को समझकर उन्हे सटीक रूप से दिशा अनुरूप वितरण कर के हमे दिशा प्रदान किया।


मित्रों यह निरंतर अध्ययन, अध्यापन और कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु और तत्वों को लेकर संसार मे बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । आप ने इस लेख को ध्यान से पढ़ा इसके लिए धन्यवाद। 

रविवार, 10 जनवरी 2021

toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा

 toilet ki disha vastu ke anusar । वास्तु के अनुसार शौचालय की दिशा 

​"लाख कोशिशों के बाद भी घर में पैसा नहीं टिक रहा या कोई न कोई बीमार रहता है? वास्तु शास्त्र के अनुसार, इसका कारण आपके शौचालय की गलत स्थिति हो सकती है। जानिए कौन सी दिशा आपके लिए वरदान है और कौन सी अभिशाप।"

आज के समय में बन रहे ज्यादातर घरों में स्थान की कमी अथवा शहरी संस्कृति और शास्त्रों की अनभिज्ञता के कारण शौचालय का निर्माण गलत दिशा में हो जाता है जिससे उस घर मे रहने वाले परिवार को स्वास्थ्य और धन संबंधी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अतः जब भी घर में शौचालय का निर्माण कराया जाए तो उसे वास्तु के अनुसार ही करना चाहिए, नहीं तो ये घर में यही शौचालय negative energy नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का कारण बनते हैं। इनकी गलत दिशा के कारण परिवार के लोगों का स्वास्थ्य खराब बना रह सकता है। तो आइए मित्रों जानते हैं कि शौचालय निर्माण में किन मुख्य बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है?


शौचालय के उपयुक्त दिशा 

सर्वप्रथम वस्तुशात्र के अनुसार घर में शौचालय के लिए सबसे अच्छा स्थान SSW अथवा WNW एवं ESE का होता है। घर के मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए यह घर (भवन) का ब्रह्म स्थल होता है यहां वास्तु पुरुष की नाभि होती है, यहां बना शौचालय स्वास्थ्य के साथ जीवन में संघर्ष की शक्ति को समाप्त करता है। ईशान अथवा नैऋत्य कोण में शौचालय का निर्माण निषिद्ध किया गया है। ईशान कोण में शौचालय होने से गृह-क्लेश में वृद्धि होती है साथ ही कैंसर जैसा भयंकर रोग होने कि संभावना रहिती है, घर के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, नए और शुभ विचार नहीं आते, घर को आर्थिक संकटों का सामना निरंतर करना पड़ता है तथा सारे घर में negative energy अपवित्रता का वातावरण हमेशा बना रहता है। वहीं नैऋत्य कोण में शौचालय बनाने से मानसिक अस्थिरता, संबंधों में खटास, प्रगति में बाधा, नजर दोष तथा शारीरिक कष्टों में वृद्धि होती है।

शौचालय के अंदर की व्यवस्था 

यदि शौचालय कमरे के साथ ही बनाना हो तो इसे कमरे के वायव्य कोण में बनाना चाहिए। नैऋत्य कोण में शौचालय निर्माण सर्वथा निषिद्ध है। शौचालय में ताजी हवा तथा प्रकाश के आगमन की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। शौचालय का दरवाजा पूर्व अथवा अग्नि कोण में होना चाहिए तथा टॉयलेट सीट इस प्रकार फिट होनी चाहिए कि सीट पर बैठते समय व्यक्ति का मुख दक्षिण अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे, भूलकर भी मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर नहीं करना चाहिए।

शौचालय में पानी की व्यवस्था पूर्व अथवा उत्तर दिशा में होनी चाहिए, अगर वाशबेसिन भी शौचालय में लगाए जाने हैं तो वह भी पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाने चाहिए। वैसे शौचालय में दर्पण का प्रयोग वर्जित है फिर भी अगर लगाना है तो उसे भी उत्तरी और पूर्वी दीवाल पर ही लगाएं। 

वेंटिलेशन, एग्जॉस्ट एवं ड्रेनेज की व्यवस्था 

शौचालय में शुद्ध वायु के आवागमन के लिए खिड़की या वेंटिलेशन उत्तर या पूर्व दिशा में होना उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इन दिशाओं से प्राकृतिक प्रकाश एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता है।

एग्जॉस्ट फैन लगाने के लिए वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह दिशा वायु तत्व की होती है और दूषित वायु को बाहर निकालने में सहायक होती है। वैकल्पिक रूप में, यदि वायव्य कोण उपलब्ध न हो, तो एग्जॉस्ट फैन उत्तर या पूर्व दिशा में भी लगाया जा सकता है।

जल निकासी (ड्रेनेज) का ढाल इस प्रकार रखा जाए कि पानी का प्रवाह उत्तर, पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। इससे जल का उचित प्रवाह बना रहता है तथा स्थान स्वच्छ बना रहता है।

अन्य महत्वपूर्ण निर्देश 

शौचालय कभी भी रसोई घर के सामने ना बनाएं अगर शौचालय एवं स्नानघर इकट्ठा बनाना है तो यह पश्चिम वायव्य अथवा पूर्व आग्नेय दिशा में होना चाहिए इसमें लगे शावर व नल आदि ईशान कोण में तथा टॉयलेट की सीट वायव्य कोण में होनी चाहिए यह पश्चिम दिशा में भी सुविधा अनुसार रखी जा सकती है वाशबेसिन की स्थिति पश्चिम में होनी चाहिए।

शौचालय के लिए वास्तु टिप्स toilet vastu remedies

अगर किसी कारण वश शौचालय का निर्माण गलत हुआ है तो निम्नलिखित कुछ उपाय करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा को आने से रोका जा सकता है।

*अगर पूर्व दिशा और दक्षिण दिशा के मध्य स्थान तक शौचालय की खिड़की खुलती हो तो उस खिड़की में 3 क्रिस्टल की बॉल लाल रिबन में बांधकर लटका दें जब सूर्य की रश्मियां उस क्रिस्टल बॉल से टकराकर शौचालय में पड़ेंगी तो वहां की नकारात्मक ऊर्जा जल जाएगी।

* शौचालय की दुर्गंध घर में बिल्कुल न फैले इसका विशेष ध्यान रखें, इसके लिए सुगंधित चीजों का छिड़काव आदि करें।

* शौचालय में किसी सूखे स्थान पर समुद्री नमक किसी कांच की कटोरी आदि में भरकर रखे और सप्ताह में एक बार उसी कमोड में डालकर फ्लश कर दें तथा वापस नया नमक रख दें।

नोट- इस तरह के कुछ उपाय करने से बहोत हद तक सकारात्मक लाभ उठाया जा सकता है, अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार की मदत लें।


मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद 

नोट — उक्त उपाय करने से बहुत हद तक सकारात्मक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए अपने वास्तु सलाहकार का मार्गदर्शन प्राप्त करें।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

mangalwar ko janme log । मंगलवार को जन्मे लोग

 mangalwar ko janme log । मंगलवार को जन्मे लोग 


अक्सर मुझे ऐसे लोग मिलते हैं जो कहते हैं पंडित जी मेरा फलां दिन का जन्म हुआ है मेरे बारे में कुछ बताइए, मुझे मेरी जन्म तिथि, दिनांक, सन, समय कुछ भी ज्ञात नहीं बस यही दिन पता है कि मेरा जन्म मंगलवार को हुआ है । तो यह आर्टिकल उन्हीं लोगों के लिए  है।


मंगलवार के दिन जन्म लेने वाले व्यक्ति का स्वभाव । Tuesday Birth

मंगलवार के दिन जन्म लेने वाले जातक की प्रकृति गर्म होती है। यह पराक्रमी, वीर, साहसी एवं संग्राम में  विजय प्राप्त करने वाले  होते है। इसकी बुद्धि विशेष अच्छी नहीं होती, इसी से यह बौद्धिक  कार्यों से अलग रहना पसंद करते है, परन्तु वीरता के कार्यों में आगे बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाले होते है। प्रायः यह सांवले रंग के होते हैं पर इनमे आकर्षण शक्ति बहुत गजब की होती है जिसकी वजह से विपरीत लिंगी इनकी तरफ बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं । 

यह लोग अपने शरीर को ही सब कुछ समझते हैं जैसे आज के समय में फ़िल्म अभिनेता, अभिनेत्री, जिम्नास्टिक आदि जो अपने शरीर को ही अपने कर्म का साधन बना लेते हैं, यह लोग रक्षा विभाग, पुलिस, आर्मी,  डाक्टरी शल्य चिकित्सा (surgery), खेल -कूद आदि में भी अग्रणी होते हैं। अपनी वाक्पटुता से यह लोगों को  सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। इनको रक्त संबंधी रिश्तों जैसे- चाचा, बुआ, बहन आदि से विशेष सहयोग प्राप्त होता है। यह दुश्मनी, कर्जा, बीमारी, बदला आदि  को ज्यादा महत्त्व देते हैं और इनसे सामना करने हेतु अधिक धन इकठ्ठा करते हैं।

जमीनी संपत्ति भी यह लोग खड़ी करते हैं। यह अपनी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखते हैं। यह स्कूल आदि में पुस्तकों से सिखने के बजाय जीवन में कार्य कर के सिखने में अधिक विश्वास  करते हैं। यह जवानी के दिनों में कामुक भी बहुत होते हैं, इनके लिए प्रायः प्यार-मुहब्बत करना अक्सर मुसीबत बन जाता है, यह शंकालु भी बहोत होते हैं, यह अपनी पत्नी का लोगों से ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं करते, इनमे असुरक्षा की भावना भी अधिक होती है।

इन्हें  2, 32 वें वर्ष में कष्ट होता है तथा पूर्णायु 74 वर्ष की होती है।

मंगलवार के दिन जन्म लेने वालों के लिए उपाय 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन के स्वामी मंगल होते हैं अतः अपने चहुमुखी कल्याण हेतु मंगल देव के मन्त्रों का जप करना चाहिए तथा संकट मोचन हनुमान जी व भगवान कार्तिकेय की पूजा-आराधना इन्हें करनी चाहिए साथ ही अपने छोटे भाई बहनों का उचित मार्गदर्शन, सहयोग व उनकी सुरक्षा करनी चाहिए। उनके उदंडता पे क्रोधित न होकर छमाशीलता अपनाना चाहिए।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

vrishabh lagn ke liye ratna । वृषभ लग्न के लिए रत्न

vrishabh lagn ke liye ratna । वृषभ लग्न के लिए रत्न 

vrishabh lagn ke liye ratna । वृषभ लग्न के लिए रत्न
vrishabh lagna gem stone वृषभ लग्न के लिए रत्न 


रत्न का चुनाव सामान्यतः जन्मकुण्डली में “भाग्य भाव” जिसे कुंडली में नवम भाव भी कहते हैं, का स्वामी भाग्येश कहलाता है । भगयेश का रत्न पहनने से भाग्य प्रबल होता है । यदि भाग्येश के साथ केंद्र ( 1, 4, 7, 10 ) तथा त्रिकोण का स्वामी शुभ योग बनाकर कुंडली में बलि स्थिति में हो तो, ऐसे व्यक्ति के लिए भाग्य के स्वामी ग्रह का रत्न धारण करना उच्च स्तरीय सफलता दिलाता है। यदि भाग्य का स्वामी निर्बल हो तथा उसका जन्मकुंडली के अन्य शुभ एवं योगकारक ग्रहों से कोई सम्बन्ध नहीं हो, तो ऐसे व्यक्ति को भाग्येश का रत्न उतनी सफलता नहीं देता । ऐसी स्थिति में लग्नेश या पंचमेश ग्रह का उनकी स्थिति के अनुसार पहनने से जीवन में सफलता मिलती है। 

रत्न विज्ञान ज्योतिष


रत्नों का चुनाव करने में लग्न की स्थिति विशेष महत्वपूर्ण होती है। विभिन्न लग्नो के लिए कौन- कौन से रत्न शुभ या अशुभ होते हैं । जानने के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। पं. उदय प्रकाश शर्मा

शुभ रत्न का चुनाव करते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए की जिस ग्रह के रत्न को आप धारण करने वाले है, वह जन्मकुण्डली में शुभ भावों का स्वामी हो, यदि कोई ग्रह अशुभ भावों का स्वामी होकर आप को पीड़ित कर रहा हो, तो उसकी शांति हेतु मन्त्र जप, पूजा-अनुष्ठान आदि करवाना लाभप्रद होता है।


वृषभ लग्न में रत्न का चुनाव 

which stone is suitable for vrishabha rashi and lagna


यह सत्य है की लग्न ही व्यक्तित्व का परिचायक होता है, प्रायः वृषभ लग्न के जातक विश्वसनीय और व्यवहारिक होते है जिसके कारण यह अपने नौकरी/व्यवसाय में अच्छी तरह से सफल होते हैं। साथ ही यह कामुक व्यक्ति भी  होते है तथा हर क्षेत्र में भौतिक सुख के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, यह बहुत उद्यमी भी होते है और अपने कार्यों को अपने अनुसार निश्चित समय में पूरा करते है। इस लग्न के लोग अपने मूल्य और सिद्धांत के प्रति काफी अडिग रहते हैं जिससे इनके दृष्टिकोण को बदलना आसान बिलकुल नहीं होता है। आइये जानते हैं कि इस लग्न के जातकों को कौन कौन सा रत्न धारण करना चाहिए और कौन से रत्न से परहेज करना चाहिए?


वृषभ लग्न में सूर्य रत्न माणिक्य  Ruby

वृषभ लग्न की कुंडली में सूर्य चतुर्थ भाव का स्वामी होता है। अतः सूर्य के निर्बल होने के कारण भूमि-संपत्ति, गाड़ी, मकान आदि के मामले में कमी रहेगी इस लिए सूर्य रत्न माणिक्य धारण करना लाभप्रद होगा पर इसे तभी धारण करें जब सूर्य कुंडली में 1, 2, 4, 5, 10, 11,  स्थानों में स्थित हो, पर हाँ अपने ज्योतिषी से परामर्श अवश्य ले लें। अगर सूर्य 3, 6, 7, 8, 9 स्थान में हो तो माणिक्य बिलकुल भी धारण न करें। कुंडली के बारहवें भाव में यह उच्च का होता है ऐसे में माणिक्य धारण करने से खर्चे बढ़ जायेंगे पर सुविधाएँ भी ऊँचे दर्जे की मिलेंगी।


वृषभ लग्न में चन्द्र रत्न मोती Pearl

वृषभ लग्न में चन्द्रमा तीसरे भाव का स्वामी हो जाता है और साथ ही यह इस लग्न के स्वामी शुक्र का शत्रु भी है अतः वृषभ लग्न में मोती धारण करना कुछ खास लाभदायक नहीं होता। हाँ अगर चन्द्रमा की महादशा- अन्तर्दशा चल रही हो और यह कुंडली में 1, 3, 9, 11 स्थानों में हो तो मोती धारण किया जा सकता है पर अपने ज्योतिषी से परामर्श अवश्य ले लें । इसके अतिरिक्त चंद्रमा अन्य भावों में स्थित हो तो मोती बिल्कुल भी धारण न करें बल्कि इसकी पूजा करें।


वृषभ लग्न में मंगल रत्न मूंगा Coral

इस लग्न में मंगल सातवें  एवं बारहवें भाव का स्वामी होता है, ज्योतिष में बारहवें भाव का स्वामी अपनी दूसरी राशी का फल देता है ऐसा ऋषि परासर ने कहा है अतः मंगल यहाँ सातवें भाव का फल करेगा, पर इसे केंद्राधिपति दोष भी लग जायेगा, अतः यह वृषभ लग्न के लिए तटस्थ हो जायेगा अर्थात यह न अधिक बुरा होगा न अधिक शुभ,अगर इसकी दशा अन्तर्दशा चल रही हो और यह कुंडली के 1,7, 9, 10, 11 वें भाव में स्थित हो तो अपने ज्योतिषी से सलाह लेकर मूंगा रत्न धारण कर सकते हैं अन्यथा इस लग्न वाले जातक मूंगा धारण न करें तो उचित है।


वृषभ लग्न में बुध रत्न पन्ना Emerald

इस लग्न में बुध लग्नेश शुक्र का मित्र होता है तथा कुंडली के दो शुभ भावों दुसरे एवं पांचवें का स्वामी होकर धनेश और त्रिकोणपति भी बनता है अगर वृषभ लग्न में बुध रत्न पन्ना धारण किया जाये तो  यह खूब धन-धान्य, संतान, कुटुंब, विद्या-बुद्धि, उच्च शिक्षा, प्रभावशाली वाणी, मंत्री पद आदि देने में जातक की सहायता करता है। अतः जब यह कुंडली के 1, 2,5, 9, 10, भावों में हो तो पन्ना रत्न धारण करना शुभ होता है। अगर बुध 3,4, 6,7,8,11, 12 वें भाव में हो पन्ना धारण न करें, ऐसी स्थिति में अपने ज्योतिषी से सलाह अवस्य लें ।


वृषभ लग्न में गुरु रत्न पुखराज  Yello Topaz

इस लग्न में देवगुरु वृहस्पति दो अशुभ भाव आठवें एवं ग्यारहवें के स्वामी होते हैं, ज्योतिष अनुभव के आधार पर इस लग्न के लिए गुरु शुभ नहीं होते, यह वृषभ लग्न के स्वामी शुक्र के शत्रु भी हैं, फिर भी अगर वृहस्पति की महादशा अन्तर्दशा हो और यह कुंडली के 2, 4, 5, 9 भाव में स्थित हों तो अपने ज्योतिषी से सलाह लेकर ऐसा पुखराज धारण करें जिसमे पीलापन न के बराबर हो। अन्य भावों में स्थित होने पर पुखराज धारण नहीं करना चाहिए । 


वृषभ लग्न में शुक्र रत्न हिरा Daimond अथवा ओपल Opal

इस लग्न में शुक्र लग्न और छठे भाव के स्वामी हो जाते हैं और इनकी मूल त्रिकोण राशी तुला छठे भाव में अति है ऐसे में शुक्र अपनी मूल त्रिकोण राशी का फल अधिक करेंगे जो बीमारी, शत्रुता, चोट, कर्जा आदि की हो जाएगी ऐसे में हिरा पहनने से पहले बहुत सावधानी बरतें व अपने ज्योतिषी से सलाह अवश्य ले लें, अगर शुक्र की दशा-अन्तर्दशा हो और शुक्र कुंडली के 1, 2, 4, 7, 9, 10, 11, भावों में हो तभी हिरा अथवा ओपल रत्न धारण करें अन्य भावों में होने पर इसकी पूजा करें रत्न न धारण करें। 


वृषभ लग्न में शनि रत्न नीलम  Blue Sapphire

इस लग्न में शनि राजयोग कारक होते हैं, इनकी दोनों राशियाँ  नवम भाव एवं दशम भाव में आती हैं, यह दोनों भाव अत्यंत शुभ हैं, ज्योतिष में शनि को धर्म, कर्म  एवं न्याय का ग्रह कहा गया है अतः यह यहाँ स्वयं धर्मेश एवं कर्मेश होकर अत्यंत शुभ हो जातें हैं, अतः जब भी शनि कुंडली के 1, 2, 5, 9, 10, 11 भाव में स्थित हों तब नीलम अवश्य धारण करना चाहिए विशेषकर जब इनकी महादशा एवं अन्तर्दशा हो।


वृषभ लग्न में राहु रत्न गोमेद Onyx

इस लग्न में राहु का फल मिला जुला होता है, यह लग्नेश शुक्र के मित्र भी हैं, गोमेद धारण करें से कुछ शुभ फल मिलता है तो अशुभ फल अधिक मिलता है,  अगर कुंडली के अनुसार राहु की दशा-अन्तर्दशा चल रही हो तब गोमेद धारण करने से पहले अपने ज्योतिषी से सलाह अवश्य हि लें, मेरे ( पं. उदय प्रकाश शर्मा )  के अपने अनुभव के अनुसार राहु जब कुंडली के 1, 2, 5, 9, 10, 11 वें  भाव में बैठा हो तब इसे बुध रत्न पन्ना के साथ धारण करें, अन्यथा गोमेद को धारण करने से बचें बल्कि इसकी पूजा और मन्त्र जप श्रेष्ठ रहेगा। 


वृषभ लग्न में केतु रत्न लहसुनियाँ  Cat.s Eye

इस लग्न में राहु की तरह केतु को भी समझें और केतु कुंडली के 1, 2, 5, 11 में हो तब ही लहसुनियाँ रत्न धारण करें पर धारण करने से पहले अपनी कुंडली का अपने ज्योतिष से परामर्श अवश्य कर लेवें । अन्य भावों में स्थित होने पर केतु की पूजा करें।



मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है,ज्योतिष और रत्नों  को लेकर समाज मे बहुत मत-मतांतर हैं, कोई ज्योतिषी जातक को नीच के ग्रहों के रत्न को धारण करवाता कोई शुभ ग्रहों के रत्न अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। अगर इस विषय को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने के लिए आप का धन्यवाद।

रविवार, 27 दिसंबर 2020

paschim disha vastu shastra । पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र

पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र । paschim disha

पश्चिम दिशा के स्वामी ग्रह शनि हैं तथा देवता वरुण है। यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है। शनि को ज्योतिष में भगवान शंकर द्वारा न्यायाधीश की पदवी प्राप्त हुई है। यह हमारे कर्मो के आधार पर फला-फल की न्यायोचित व्यवस्था करते हैं। 

paschim disha vastu shastra ।  पश्चिम दिशा वास्तु शास्त्र



क्यों की आज कलयुग में बुरे कर्मों का बोलबाला है, सो अधिकांश लोग शनि देव को लेकर भय एवं भ्रम की स्थिति में रहते हैं। वास्तु में इस दिशा को कारोबार, गौरव, स्थायित्व, यश और सौभाग्य के लीये जाना जाता है।

इस दिशा में सूर्यास्त होता है, वहीँ आम जनमानस में डूबते हुए सूर्य को देखना शुभ नहीं माना जाता क्यों की सूर्य की ढलती हुई किरणे हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं इसलिए आवश्यक है कि हम भवन में पश्चिम दिशा में भारी और ऊँचा निर्माण करें। 

वास्तु अनुसार इस दिशा में डाइनिग रूम बनवाना शुभ होता है। यहाँ शयनकक्ष भी बनाना शुभ होता है।  वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा के अनुभव के अनुसार इस दिशा में बच्चों के लिए उनके पढ़ने का कमरा बनवाना उत्तम होता है क्यों की शनि ग्रह किसी भी विषय की गहराई में जाने की शक्ति प्रदान करते हैं सो यहाँ बच्चों में गंभीरता आती हैं और वह बुद्धिजीवी होते हैं। 

यह दिशा जल के देवता वरुण की है इसलिए यहाँ रसोईघर अच्छा नहीं माना गया है। रसोई में अग्नि की प्रधानता होती है और अग्नि एवं जल आपस में शत्रु होते हैं। वैसे इसके अलावां इस दिशा में लगभग सभी निर्माण किये जा सकते हैं।

।। इति शुभम् ।।


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गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen

 वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें ?


फैक्ट्री निर्माण में वास्तु सिद्धांतों व उनके सूत्रों का पालन करना चाहिए जिससे उस स्थान पे पंच तत्वों का ठीक से समन्वय हो और उस फैक्ट्री में जिस भी किसी चीज का निर्माण हो रहा है वह सही तथा फिट हो और जब वह वहां से निर्मित होकर बाजार में पहुंचे तो अपनी गुणवत्ता से उपभोक्ताओं का दिल जीत सके जिससे मालिक को उसका अच्छा मूल्य प्राप्त हो और वह लाभवन्तित हो सके।

वास्तु अनुसार फैक्ट्री में तैयार माल कहाँ रखें । taiyar mal factory me kahn rakhen


पाठकों मै वास्तु आचार्य उदय प्रकाश शर्मा अपने अनेकों फैक्ट्री के वास्तु विजिट में पाया है की उस फैक्ट्री में अच्छी गुणवत्ता वाले तैयार सामान के आर्डर बिलकुल न के बराबर होते हैं, जिसका मुख्य कारण होता है वहां तैयार माल का गलत जोंन में रखा होना। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर फैक्ट्री ही सभी व्यवसाय का आधार होती है, जिनसे मालिक के साथ-साथ मैनेजमेंट टीम, तकनीशियन, लेबर, ट्रांसपोर्ट आदि सीधे जुड़े होते हैं और कंपनी में निर्माण होने वाली वस्तु और उसके लाभ से प्रभावित होते हैं। अब अगर फैक्ट्री में तैयार माल मार्किट में जायेगा ही नहीं अर्थात उस माल का आर्डर ही नहीं आयेगा तो फैक्ट्री मालिक के साथ-साथ फैक्ट्री से जुडा हर व्यक्ति इससे प्रभावित होगा, तो आइये जानते हैं कि इसके लिए फैक्ट्री का कौन सा जोंन वास्तु अनुसार अच्छा माना गया है।


चाहे किसी भी चीज का फैक्ट्री में निर्माण होता हो वहां तैयार सामान (finished goods) को हमेसा वायव्य कोण ( north weast) में रखना चाहिए। यह दिशा वायु प्रधान होने से वहां रखे तैयार सामान को जल्दी से जल्दी बिकने में सहायता करेगी अर्थात उस सामान का आर्डर डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से जल्दी आयेगा। वायव्य कोण चन्द्रमा की दिशा है और चंद्रमा का स्वभाव चंचलता भरा होता है उसकी इसी चंचलता के फल स्वरूप तैयार माल वहां टिककर रहता नहीं बल्कि वायु के वेग से अपने सही स्थान (मार्किट और ग्राहक) तक पहुंच जाता है, और नए आर्डर का श्रोत निरंतर खुला रहता है। अगर गलती से भी तैयार माल नैरित्य कोण अर्थात पृथ्वी दिशा में रखा गया है तो वह स्टेबल जोंन में आ जायेगा जिससे उसका आर्डर बिलकुल न के बराबर ही रहेगा, तथा मिला हुआ आर्डर भी बार-बार कैंसिल होने की सम्भावना बनेगी अतः फैक्ट्री मालिक को फैक्ट्री का निर्माण करते समय अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

अगर पहले से ही फैक्ट्री  स्थापित है जिसमे इस तरह की अथवा अन्य अनचाही अड़चने आ रही हैं तो मित्रों मैं आप का अपना /वास्तु सलाहकार/ पं. उदयप्रकाश शर्मा आप से इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने किस्मत को कोसने के बजाय हमे यह समझना चाहिए कि इस युग में मृत्यु को छोड़कर हर समस्या का समाधान होता है, बात है जागरूकता की। मैंने अपने वर्षों के अनुभव में छोटे बड़े कई उद्योगों का सफलता पूर्वक उपचार किया है जिससे बड़े अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं। 

आज विज्ञान का युग हैं। आज आधुनिक रूप से आधुनिक यंत्रो द्वारा सटीक रूप से Positive - Negative ऊर्जाओं का सोधन कर पाना संभव हुआ है अगर संबंधित स्थान पे नकारात्मक ऊर्जा है अथवा ऊर्जा का अभाव है अर्थात वहां शून्य ऊर्जा है तो वहां प्राण ऊर्जा का सामंजस्य स्थापित करने हेतु धरती के चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरी ध्रुव- दक्षिणी ध्रुव व अंतरिक्ष की शुभ ऊर्जाओं को आकर्षित करना पड़ता है जिसके लिए आवस्यकता अनुसार वैज्ञानिक यंत्र, पिरामिड, ऊर्जा प्लेट, क्रिस्टल एवं रत्न-उपरत्नों के कोणीय प्रभाव, तथा धातुवों से बनी विभिन्न कोणीय आकृतियों का प्रयोग करना होता है। कोई नकारात्मक दोष वहां पर है तो पूजा-हवन भी करवाना पड़ता है I अतः आप के औद्योगिक परिसर में फैक्ट्री-कारखाने में कोई वास्तु दोष हो तो निःसंकोच आप को किसी कुशल वास्तुशास्त्री से संपर्क कर उनसे परामर्श लेना चाहिए और संबंधित स्थान का पूरे वैज्ञानिक विधि से जांच करवानी चाहिए मित्रों अगर वहां ऐसा कुछ भी हो जिससे अनचाही पीड़ा और उद्योग में असफलता मिल रही हो तो अपने इष्टदेव को प्रणाम कर उनसे आज्ञा ले उस समस्या का उचित उपाय करवाना चाहिए। और अपने औद्योगिक विकाश को गति देनी चाहिए।

।। इति शुभम् ।।

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शनिवार, 19 दिसंबर 2020

disha shool। दिशा शूल

 disha shool। दिशा शूल

आईये जानते हैं यात्रा में दिशा शूल का विचार कितना महत्वपूर्ण होता है?


हम सभी लोग आये दिन कहीं न कहीं की यात्रा करते हैं। कभी काम- धंधे व व्यापार से संबंधित यात्रा तो कभी अपनी एजुकेशन से संबंधित यात्रा तो कभी किसी विवाह, रिश्ते जैसे मांगलिक कार्य हेतु यात्रा, कभी तीर्थ अथवा धार्मिक प्रयोजन से यात्रा। इस तरह के अनेकों ऐसे प्रयोजन होते है जिसके लिए हमें यात्रा करनी ही पड़ती है। हमारा यही मनोरथ होता है कि हम जिस भी कार्य हेतु यात्रा कर रहें हैं उसमे हमें सफलता जरुर प्राप्त हो। 

दिशा के बारे में तो हम सभी जानते हैं और शूल का अर्थ होता है चुभन अर्थात पीड़ा देने वाला इससे स्पष्ट होता है की कोई विशेष दिन किसी विशेष दिशा में यात्रा प्रारंभ करने पर पीड़ा अथवा चुभन (विघ्न) देता है। हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा जब दिशाशुल को समझने की कोशिश की गयी तो उन्होंने पाया कि दिशाशुल पूर्ण रूप से दिशा और पंच तत्व की एनर्जी पर कार्य करता है। आज विज्ञान की अनेक ऐसी शाखायें है जहाँ इन प्राचीन काल से चली आ रही प्रथाओं का विश्लेषण किया जा रह है और आश्चर्यजनक बात तो ये है कि परा – मनोविज्ञान और मेटाफिजिक्स ने तो इन प्रथाओं को स्वीकार भी कर लिया है।

पर आजकल की ज्यादातर जवान पीढ़ी बुजुर्गो की इन बातों को अन्धविसवास मानती है। लेकिन सत्य यही है कि बड़े हमेशा बड़े ही रहते हैं। इसलिए हमे उनका आदर करना चाहिए. साथ ही उनकी बातों का भी आदर करना चाहिए। भले ही आज की परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं पहले आज के जैसे तेज रफ़्तार वाहन नहीं होते थे 100 किलोमीटर की भी यात्रा लम्बी होती थी जहाँ पहुँचने में बहुत समय और उर्जा व्यय होती थी, उन्हें जाकर बिना कार्य हुए खाली वापस आने की पीड़ा न झेलनी पड़े इसके लिए वह यात्रा से पहले दिशा शूल का बहोत ध्यान रखते थे। भले ही आज हम अपने तेज रफ़्तार वाहन से अपने गन्यव्य पर जाकर लौट भी सकते हैं पर कार्य न हुआ अथवा उसमे कोई विघ्न आया तो अपना मूड ऑफ़ ही करेंगे, हाँ यह भी सत्य है की आज की भागम-भाग भरी तेज रफ़्तार जिंदगी में नित्य दिशा शूल का पालन कर पाना भी तो संभव नहीं है ऐसे में इसका जो भी सामान्य उपाय है उसको अपनाकर अपनी यात्रा सुखद तो की ही जा सकती है तो आइये पाठकों वास्तुविद एवं ज्योतिष आचार्य पं. उदय प्रकाश शर्मा द्वारा जानते हैं की दिशा शूल कैसे देखते हैं और अपनी यात्रा को कैसे शुभ एवं लाभप्रद बना सकते हैं।

रविवार को पश्चिम West दिशा तथा नैरित्य South West दिशा में दिशा शूल होता है

सोमवार को पूर्व East दिशा तथा आग्नेय South East दिशा में दिशा शूल होता है

मंगलवार को उत्तर North दिशा तथा वायव्य North West दिशा में दिशा शूल होता है

बुधवार को उत्तर North दिशा तथा ईशान North East दिशा में दिशा शूल होता है

गुरुवार को दक्षिण South दिशा तथा आग्नेय South East दिशा में दिशा शूल होता है

शुक्रवार को पश्चिम West दिशा तथा नैरित्य South West दिशा में दिशा शूल होता है

शनिवार को पूर्व East दिशा तथा ईशान्य North East दिशा में दिशा शूल होता है



दिशा शूल में महत्वपूर्ण नियम


यदि घर से अपनी यात्रा सुरु कर उसी दिन गंतव्य स्थान पर पहुंचं जाना हो तथा अपने नित्य के कार्य जैसे अपने ऑफिस, कारखाने, ड्यूटी, फिल्ड-मार्केटिंग आदि के लिए निकलना हो तो ऐसी यात्रा में दिशा शूल का कोई प्रभाव नहीं होता अतः इसका विचार नहीं करना चाहिए

अगर दिशा शूल में यात्रा करना अनिवार्य हो तो..


इसके लिए हमारे प्राचीन ऋषि-आचार्यों ने कुछ नियम प्रतिपादित किये हैं जिनका पालन करने से यात्रा सुखद होती है

रविवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्राम्भ करनी हो तो घर से दलिया अथवा घी खाकर निकले और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिससे दिशा शूल का दोष न्यून हो जाता है।

सोमवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो दर्पण मे अपना चेहरा देख कर घर से निकलें और हाँ अपनी यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिससे दिशा शूल का दोष न्यून हो जाता है। 

मंगलवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो   गुड़ खाकर घर से निकले। और अपनी यात्रा सुरु करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिसके प्रभाव से दिशा शूल का प्रभाव न के बराबर रहता है।

बुधवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो धनिया या तिल खाकर घर से निकले। और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलें जिसके प्रभाव से दिशा शूल का प्रभाव न्यून हो जाता है।

गुरुवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो दही या जीरा खाकर घर से निकलना चाहिए। तथा यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना चाहिए  ऐसा करने से दिशा शूल का प्रभाव कम हो जाता है।

शुक्रवार को दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो घर से  जौ या राइ खाकर निकलना शुभ होता है। और हाँ यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना अच्छा होता है इससे दिशा शूल का प्रभाव कट जाता है।

शनिवार को अगर दिशा शूल की दिशा में यात्रा प्रारंभ करनी हो तो घर से अदरक, उड़द या तिल खाकर निकलना चाहिए यह शुभ होता है। यहाँ भी यात्रा शुरू करने से पहले पांच कदम पीछे की ओर चलना दिशा शूल के प्रभाव को कम करता है।

।। इति शुभम् ।।

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