वास्तु के अनुसार घर का फ्लोर लेबल कैसा हो??
"वास्तु में सही ढाल और ऊंचा नैऋत्य—यही है स्थायी सफलता का असली वास्तु रहस्य"
अगर आपके घर का नैऋत्य ऊँचा नहीं है और फ्लोर का ढाल सही दिशा में नहीं है, तो समझिए आप खूब मेहनत कर रहे हैं… लेकिन स्थिरता कभी टिकती नहीं, और सफलता बार-बार फिसल जाती है।”
वास्तु मे ऊंची नैऋत्य दिशा
मित्रों वास्तु शास्त्र में दिशाओं का संतुलन केवल भौतिक संरचना का विषय नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा प्रवाह, स्थिरता और जीवन के विभिन्न आयामों पर गहरा प्रभाव डालता है। विशेष रूप से नैऋत्य दिशा (South-West) को स्थायित्व, नियंत्रण और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। किसी भी भवन या प्लॉट में इस दिशा का ऊँचा होना और फ्लोर का ढाल सही दिशा में होना अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे एक वास्तु कंसल्टेंट के रूप में निरंतर कार्य कर के समझा है।नैऋत्य दिशा को पंचतत्वों में पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधि माना गया है। पृथ्वी का स्वभाव स्थिर और भारी होता है, इसलिए इस दिशा का ऊँचा और भारयुक्त होना आवश्यक माना गया है। जब घर या प्लॉट का नैऋत्य भाग अन्य दिशाओं की तुलना में ऊँचा होता है, तो यह जीवन में स्थायित्व, आर्थिक मजबूती, बेहतर रिश्ते और निर्णय क्षमता को बढ़ाता है। परिवार के मुखिया का नियंत्रण मजबूत रहता है और घर में अनुशासन तथा संतुलन बना रहता है।
इसके विपरीत यदि यह दिशा नीची हो जाए, तो जीवन में अस्थिरता, आर्थिक नुकसान और मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भले ही घर किसी भी दिशा का क्यों न हो, उसे इस प्रकार डिजाइन करवाएं कि पूरा मकान ही दक्षिण और पश्चिम दिशा में ऊंचा रहे और उत्तर और पूर्व में नीचा हो। आप के घर का पचास पर्सेंट वास्तु तो सिर्फ इस व्यवस्था से अच्छा हो जाएगा।
South/West नैऋत्य ऊंचा होने का लाभ
नैऋत्य दिशा के ऊँचे होने का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि यह नकारात्मक ऊर्जा को रोकने का कार्य करती है। यह दिशा एक तरह से सुरक्षा कवच का काम करती है, जो बाहरी बाधाओं और अनचाही ऊर्जा को घर में प्रवेश करने से रोकती है। यही कारण है कि वास्तु शास्त्र में इस दिशा में भारी निर्माण जैसे मास्टर बेडरूम, तिजोरी कक्ष या स्टोर रूम रखने की सलाह दी जाती है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचय होता है और घर में दीर्घकालिक सुख-समृद्धि बनी रहती है।अब यदि हम फ्लोर के ढाल (slope) की बात करें, तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण विषय है। वास्तु के अनुसार, घर का ढाल हमेशा नैऋत्य से ईशान (North-East) की ओर होना चाहिए। अर्थात दक्षिण-पश्चिम हिस्सा सबसे ऊँचा और उत्तर-पूर्व हिस्सा सबसे नीचा होना चाहिए। यह ढाल ऊर्जा के प्राकृतिक प्रवाह को सुनिश्चित करता है। ईशान दिशा को देव स्थान माना गया है, जहां से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। जब ढाल इस दिशा में होता है, तो ऊर्जा का प्रवाह सहज और संतुलित बना रहता है।
वास्तु मे फर्श का ढाल गलत होने पर
यदि घर का ढाल इसके विपरीत हो, यानी ईशान से नैऋत्य की ओर, तो यह अत्यंत दोषपूर्ण स्थिति मानी जाती है। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचय होने लगता है, जिससे स्वास्थ्य, संबंध और वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसलिए निर्माण के समय ही इस सिद्धांत का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।
फ्लोर ढाल का प्रभाव केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल निकास (drainage) और साफ-सफाई से भी जुड़ा हुआ है। सही ढाल होने से पानी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ईशान दिशा की ओर होता है, जिससे घर में नमी और गंदगी का जमाव नहीं होता। यह स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी अत्यंत लाभकारी है और भवन की दीर्घायु को बढ़ाता है।
मित्रों मै आप का अपना वास्तु कंसल्टेंट आचार्य उदय प्रकाश शर्मा अबतक के अपने निरंतर कार्य अनुभव से यही जान पाया हूं कि एक वास्तुशास्त्री के लिए केवल दिशा का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि हर तत्व के पीछे छिपे ऊर्जा सिद्धांत और उनके व्यावहारिक प्रभाव को भी स्पष्ट रूप से समझना बहुत आवश्यक है। नैऋत्य दिशा का ऊँचा होना और फ्लोर का सही ढाल न केवल वास्तु के मूल सिद्धांत हैं, बल्कि यह जीवन में संतुलन, सुरक्षा और समृद्धि के आधार स्तंभ भी हैं।
अंततः वास्तु शास्त्र और वास्तुशास्त्री का उद्देश्य केवल भवन निर्माण नहीं, बल्कि भवन निर्माण की दिशा में एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां ऊर्जा संतुलित हो, जीवन सुचारु रूप से चले और व्यक्ति मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक रूप से समृद्ध हो। हम यदि वास्तु के इन सरल और प्रभावशाली सिद्धांतों को सही ढंग से अपनायें तो कोई भी घर केवल एक निर्माण हुआ घर नहीं रहता, बल्कि एक सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। जिसमें हम अपने प्रियजनों के साथ खुशहाल जीवन बिता सकते हैं।
इस पोस्ट में संलग्न चित्र एक प्रतीकात्मक रूप है, जो सिर्फ यह दिखाता है कि किस तरफ से किस तरफ का फ्लोर लेबल का ढाल/स्लोप होना चाहिए, इसे सिर्फ सरल रूप से समझने के लिए प्रयोग करें।
नोट :- किसी भी घर का फ्लोर लेबल उपरोक्त चित्र की भांति/सीढ़ीनुमा नहीं होता
मित्रों यह निरंतर कार्य अनुभव के आधार पर लिखा आलेख है, वास्तु को लेकर बहुत मत-मतांतर हैं अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, कुतर्क और बिना मतलब की बहस ना करें। मेरा यह प्रयास, समाज को वास्तु विषय कि सरल जानकारी साझा करना है, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर से बाहर आकर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ें,
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